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एक छोटा सा लड़का था सत्य प्रकाश श्रीवास्तव। उसे अपने शहर कानपुर में उदास आदमी की तलाश रहती थी, जिसे हंसाया जा सके। कुछ दिनों के बाद उस लड़के ने अपना नाम बदल लिया। फिर पूरे ब्रह्मांड को एक छोटी-सी हंसी की डिबिया में भरने का साहस लेकर, अपने बदले हुए नाम के साथ उस लड़के ने अपना शहर भी बदल लिया।
सत्य प्रकाश श्रीवास्तव अपने नए नाम राजू श्रीवास्तव के साथ मुंबई पहुंच गया था। फिर प्याज की छौंक की तरह खींचते हुए, उस नाम ने हम सब को, एक ही समय अपने-अपने घरों में टीवी के आगे बैठने की लत लगा दी। जो हंसी पहले सिर्फ सुनाई पड़ती थी, राजू श्रीवास्तव की वजह से हम सब को दिखाई देने लगी।
खबरिया चैनल भी अचानक हंसने-हंसाने पर उतारू हो गए। हर चैनल के पास थी हंसी की खुराक। कहीं हंसी के शहंशाह, तो कहीं बादशाह। कहीं हंसी के अवतार, तो कहीं भगवान। कोई हंसा कर एहसान कर रहा था, तो कोई कह रहा था राज मैं ही करूंगा। राजू श्रीवास्तव ने सचमुच राज किया। मंच पर भी और लोगों के दिलों पर भी।
हंसी के अलग-अलग चेहरे से कराया परिचय
इंसान पहली बार कब हंसा होगा? हंसी खुद पर आई होगी या दूसरों पर, यह सदियों से बहस का विषय है, आगे भी रहेगा, लेकिन हंसी के गोलगप्पे, हंसी के छींटे, हंसी की बौछार, हंसी की फुहार, हंसी की मार, हंसी की दहाड़, हंसी के आर-पार, होश उड़ा देने वाली हंसी और कई बार रूलाने वाली हंसी लेकर राजू श्रीवास्तव हमारे सामने होते थे, बात तो उस पर भी होगी।
वे कहते थे-फुदकती रहती हैं इच्छाएं
कॉमेडी स्क्रिप्ट के सिलसिले में ढेर सारी मुलाकातों की स्मृतियां हैं। अक्सर कहते थे-‘शहर में कितनी इच्छाएं रहती हैं ? मुंबई में तो चप्पे-चप्पे पर बिखरी पड़ी हैं इच्छाएं। तेज-तेज कदमों की शामों और चेहरे पर उड़ते से भावों की रातों में भी फुदकती रहती हैं इच्छाएं।’
टिफिन बॉक्स और साइकिल में ढूंढ लेते थे हंसी
‘ऑब्जर्वेशनल कॉमेडी’ उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। वर्षों पुराने आपके पंखे में हंसी है, टायर पंक्चर हो चुके साइकिल में हंसी है या आपके टिफिन बॉक्स में हंसी है, यह सब हमने राजू श्रीवास्तव को देखकर जाना।
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