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आक्रोश बढ़ता देख पुलिस ने लाठीचार्ज किया। इससे भड़के युवाओं ने पुलिसकर्मियों पर पथराव कर उन्हें दौड़ा दिया। पीएसी की मदद से लाठीचार्ज कर युवाओं को तितर-बितर किया गया। इसके बाद भी वे नहीं माने तो करीब 300 युवाओं को गिरफ्तार कर सुद्धोवाला जेल भेजा गया।
वहीं, बेरोजगारों के इस आंदोलन को हल्के में लेना पुलिस को बेहद भारी पड़ गया। शुरुआत में ही स्थिति को भांप लिया जाता तो शायद पत्थरबाजी की नौबत नहीं आती। पुलिस वहां केवल समझाने और कानून व्यवस्था संभालने के इरादे से पहुंची थी। लेकिन, देखते ही देखते स्थिति इतनी बिगड़ गई कि कई दौर में पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा। बाद में तो पीएसी और आंसू गैस के गोलों की व्यवस्था भी पुलिस ने कर ली।
पहले यही माना जा रहा था कि सभी परीक्षाओं की तैयारियां करने वाले युवा हैं। यदि उन्हें चेतावनी देकर समझाया जाएगा तो शायद मान जाएंगे। कुछ देर बाद जाम भी खुल जाएगा। लिहाजा, पुलिस ने तैयारियां भी इसी हिसाब से की थीं।
पुलिस ने वहां पर एक फायर ब्रिगेड की गाड़ी तैनात की थी। जबकि, पुलिस बल के पास न हेलमेट थे और न ही बॉडी प्रोटेक्टर। कुछ पुलिसकर्मी तो बिना डंडों के भी तैनात थे। नतीजा, पहले बल प्रयोग के बाद ही युवाओं ने जब पत्थरबाजी शुरू की तो पुलिस को पीछे हटना पड़ा।
कई पुलिसकर्मियों ने दुकानों में छुपकर शरण ली। ज्यादा टूट-फूट न हो, इसके चलते गाड़ियां भी वहां से हटानी पड़ गईं। पुलिसकर्मी कुछ देर तक तो दोबारा मोर्चा संभालने के मूड में नहीं लग रहे थे। इसके बाद कुछेक ने दोपहिया वाहनों वाले हेलमेट पहने और मैदान में उतरे। थोड़ी देर बाद जब पुलिस कप्तान मौके पर आए तो उन्होंने पुलिस को आगे बढ़ने के लिए कहा।
तब तक डंडों और बॉडी प्रोटेक्टर के साथ पीएसी भी पहुंच गई। पीएसी को देखते ही पुलिस की जान में जान आई और वह भी आगे बढ़ गई। बॉडी प्रोटेक्टर और हेलमेट पहने जवानों ने लाठियां बरसाईं तो युवाओं के पत्थर भी काम न आए। मजबूरन उन्हें भागना ही पड़ा। यदि पुलिस इस तरह का एहतियात पहले बरतती तो मामला शायद इतना न बिगड़ पाता।
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