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UN: समुद्र में जैव विविधता की रक्षा के लिए यूएन सदस्यों में सहमति, जानें किन प्रजातियों पर है खतरा?

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UN: समुद्र में जैव विविधता की रक्षा के लिए यूएन सदस्यों में सहमति, जानें किन प्रजातियों पर है खतरा?

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जैव विविधता

जैव विविधता
– फोटो : अमर उजाला

विस्तार

संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों ने समुद्र में जैव विविधता की रक्षा के लिए संधि पर सहमति बना ली है। दो हफ्ते तक चली बातचीत के बाद सदस्य देशों के बीच शनिवार को संधि को लेकर सहमति बन गई है। इस संधि के लिए कई वर्षों से चर्चाएं चल रहीं थी, लेकिन सदस्य देशों के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी। यूनाइटेड नेशन न्यूज के अनुसार, 190 से ज्यादा देशों ने इसपर अपनी मंजूरी दे दी है। 

संयुक्त राष्ट्र उच्च समुद्र संधि दुनिया के 30% महासागरों को संरक्षित क्षेत्रों में रखती है, समुद्री संरक्षण में ज्यादा पैसा लगाती है और समुद्र में खनन के लिए नए नियमों को बनाती है। पर्यावरण समूहों का कहना है कि यह जैव विविधता के नुकसान को दूर करने और सतत विकास सुनिश्चित करने में मदद करेगा। 

यूएन चीफ एंटोनियो गुटेरेस के प्रवक्ता की ओर से इस बाबत बयान जारी किया गया। इसमें गुटेरेस ने कहा कि ये जैव विविधता के संरक्षण को लेकर बड़ी जीत है। हमारे आने वाली पीढ़ी के लिए इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे। समुद्री जीवविज्ञानी रेबेका हेल्म ने कहा, ‘पृथ्वी की सतह के इस आधे हिस्से की रक्षा करना बेहद जरूरी है। महासागर विशेषज्ञ निकोला क्लार्क ने कहा, ‘इस संधि लेकर बनी सहमति महासागरों की रक्षा करने का अवसर है। यह जैव विविधता के लिए बड़ी जीत है।

उच्च समुद्र क्या है?

दुनिया के दो-तिहाई महासागरों को वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय जल माना जाता है। यानी सभी देशों को वहां मछली पकड़ने, जहाज चलाने और रिसर्च करने का अधिकार है। लेकिन अब तक इनमें से करीब 1% पानी – जिसे उच्च समुद्र के रूप में जाना जाता है – संरक्षित किया गया है। यह उच्च समुद्रों के विशाल बहुमत में रहने वाले समुद्री जीवन को जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक मछली पकड़ने और शिपिंग यातायात सहित खतरों से शोषण के जोखिम में छोड़ देता है। 

कौन सी समुद्री प्रजातियां खतरे में हैं?

इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) के मुताबिक, समुद्री प्रजातियों के नए आंकलन में, करीब 10% के विलुप्त होने का खतरा पाया गया है। नाइजीरियन इंस्टीट्यूट फॉर ओशनोग्राफी एंड मरीन रिसर्च के मुख्य शोध अधिकारी डॉ. न्गोजी ओगुगुआ ने कहा, ‘विलुप्त होने के दो सबसे बड़े कारण अत्यधिक मछली पकड़ना और प्रदूषण हैं। अगर हमारे पास समुद्री संरक्षित अभयारण्य हैं, तो अधिकांश समुद्री संसाधनों को ठीक होने का समय मिलेगा।’ 

अबालोन प्रजातियां – शेलफिश का एक प्रकार – शार्क और व्हेल समुद्री भोजन और दवाओं के रूप में उनके उच्च मूल्य के कारण विशेष दबाव में आ गई हैं। एक साइंस मैग्जीन में प्रकाशित स्टडी के मुताबिक, जलवायु परिवर्तन ने समुद्री गर्मी की लहरों को भी 20 गुना बढ़ा दिया है – जो चक्रवात जैसी चरम घटनाओं के साथ-साथ बड़े पैमाने पर मृत्यु दर की घटनाओं को भी ला सकता है। समुद्र में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे से निपटने के लिए पेरिस समझौते जैसे अन्य वैश्विक समझौतों को लागू करना शामिल है। 

संधि के तहत क्या-क्या होगा? 

इस संधि के तहत समुद्र संरक्षण का प्रबंधन करने और खुले समुद्र में समुद्री संरक्षित क्षेत्रों के लिए नए निकाय का गठन किया जाएगा। महासागरों में वाणिज्यिक गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभाव आकलन करने के लिए नियम भी बनाया जाएगा। गौरतलब है कि इससे पहले समुद्री कानून पर संयुक्त राष्ट्र संधि वर्ष 1994 में लागू हुई थी। समुद्र के संसाधनों को आंतरिक जल, प्रादेशिक सागर और अनन्य आर्थिक क्षेत्र और खुले समुद्र में वर्गीकृत किया जाता है।

तटीय देशों को सभी प्राकृतिक संसाधनों की खोज

आंतरिक जल किसी देश की भूमि के किनारे पर होता है। इसके बाद प्रादेशिक सागर 12 समुद्री मील की दूरी तक होता है। प्रादेशिक सागर किसी देश का संप्रभु क्षेत्र है। विदेशी असैन्य एवं सैन्य जलयानों को कुछ शर्तों के तहत प्रवेश की अनुमति होती है। अनन्य आर्थिक क्षेत्र ( ईईजेड) 200 नाटिकल मील तक फैला होता है। इसमें तटीय देशों को सभी प्राकृतिक संसाधनों की खोज, दोहन, संरक्षण और प्रबंधन का संप्रभु अधिकार होता है।

इसके बाद का समुद्री क्षेत्र खुला समुद्र होता है। इसमें राष्ट्रीय क्षेत्राधिकार से परे जल क्षेत्रों में महासागरों का 95 प्रतिशत हिस्सा आता है। ये क्षेत्र बहुमूल्य पारिस्थितिकी, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, विज्ञानी और खाद्य सुरक्षा से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

 

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