Home Breaking News आज का शब्द: क्षिति और मैथिलीशरण गुप्त की कविता- जितने गुण सागर नागर हैं

आज का शब्द: क्षिति और मैथिलीशरण गुप्त की कविता- जितने गुण सागर नागर हैं

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आज का शब्द: क्षिति और मैथिलीशरण गुप्त की कविता- जितने गुण सागर नागर हैं

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                            'हिंदी हैं हम' शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- क्षिति, जिसका अर्थ है- पृथ्वी, वास स्थान, जगह। प्रस्तुत है मैथिलीशरण गुप्त की कविता- जितने गुण सागर नागर हैं
                                                                                                
                                                     
                            

जितने गुण सागर नागर हैं,
कहते यह बात उजागर हैं।
अब यद्यपि दुर्बल, आरत है,
पर भारत के सम भारत है॥

बसते वसुधा पर देश कई,
जिनकी सुषमा सविशेष नई।
पर है किसमें गुरुता इतनी,
भरपूर भरी इसमें जितनी॥

गुण-गुंफित हैं इसमें इतने,
पृथिवी पर हैं न कहीं जितने।
किसकी इतनी महिमा वर है?
इस पै सब विश्व निछावर है॥

जन तीस करोड़ यहाँ गिनके—
कर साठ करोड़ हुए जिनके।
जग में वह कार्य मिला किसको,
यह देश न साध सके जिसको।

उपजे सब अन्न सदा जिसमें,
अचला अति विस्तृत है इसमें।
जग में जितने प्रिय द्रव्य जहाँ,
समझो सबकी भवभूमि यहाँ॥

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8 hours ago

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