[ad_1]
'हिंदी हैं हम' शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- फुलवारी, जिसका अर्थ है- फूलों के पौधों का छोटा बाग, पुष्पवाटिका। प्रस्तुत है भारत भूषण की रचना- सूरज आया कुछ जला गया, चंदा आया कुछ रुला गया
मैं हूँ बनफूल भला मेरा कैसा खिलना, क्या मुरझाना
मैं भी उनमें ही हूँ जिनका, जैसा आना वैसा जाना
सिर पर अंबर की छत नीली, जिसकी सीमा का अंत नहीं
मैं जहाँ उगा हूँ वहाँ कभी भूले से खिला वसंत नहीं
ऐसा लगता है जैसे मैं ही बस एक अकेला आया हूँ
मेरी कोई कामिनी नहीं, मेरा कोई भी कंत नहीं
बस आस-पास की गर्म धूल उड़ मुझे गोद में लेती है
है घेर रहा मुझको केवल सुनसान भयावह वीराना
सूरज आया कुछ जला गया, चंदा आया कुछ रुला गया
आँधी का झोंका मरने की सीमा तक झूला झुला गया
छह ऋतुओं में कोई भी तो मेरी न कभी होकर आई
जब रात हुई सो गया यहीं, जब भोर हुई कुलमुला गया
मोती लेने वाले सब हैं, आँसू का गाहक नहीं मिला
जिनका कोई भी नहीं उन्हें सीखा न किसी ने अपनाना
सुनता हूँ दूर कहीं मंदिर, हैं पत्थर के भगवान जहाँ
सब फूल गर्व अनुभव करते, बन एक रात मेहमान वहाँ
मेरा भी मन अकुलाता है, उस मंदिर का आँगन देखूँ
बिन माँगे जिसकी धूल परस मिल जाते हैं वरदान जहाँ
लेकिन जाऊँ भी तो कैसे, कितनी मेरी मजबूरी है
उड़ने को पंख नहीं मेरे, सारा पथ दुर्गम अनजाना
आगे पढ़ें
9 घंटे पहले
[ad_2]
Source link