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DNA Analysis on Israel-Hamas War: इजरायल और फिलिस्तीन के बीच जो जंग चल रही है, वो दरअसल ऐतिहासिक रूप से अस्तित्व की लड़ाई है. जिस जमीन के लिए, ये लड़ रहे हैं, उस पर अलग-अलग समयकाल में यहूदी, ईसाई और इस्लाम का अस्तित्व रहा है. ये अलग बात है कि समय के साथ इन सभी में द्वेष की भावना बढ़ती गई. और आज स्थिति ये है कि फिलिस्तीन, अपने पड़ोस में इजरायल नहीं चाहता है. जमीन की लड़ाई अब धर्म की लड़ाई बन गई है जिसमें एक तरह इस्लामिक आतंकवादी हैं, और दूसरी तरफ इजरायल के सैनिक.
इजरायल पर हमास के बर्बर हमले के खिलाफ चुप रहने वाले लोग, इजरायल के भीषण पलटवार के बाद सड़कों पर उतर आए हैं. दुनियाभर में फिलिस्तीनी नागरिक फैले हुए हैं, जो शरणार्थी बनकर या अलग-अलग देशों की नागरिकता हासिल करके रह रहे हैं. लंडन में इजरायल के विरोध और फिलिस्तीन के समर्थन में सैकड़ों लोगों की भीड़ जुट गई. इनमें से ज्यादातर फिलिस्तीन के शरणार्थियी या प्रवासी हैं. विडंबना ये है कि हमास के हमले में अब तक ब्रिटेन के 17 नागरिक पर असर पड़ा है, इनमें से कुछ की हत्या कर दी गई और कुछ अभी तक लापता हैं. बावजूद इसके, फिलिस्तीन के आतंकी संगठन हमास के समर्थन में London के अंदर इतना बड़ा प्रदर्शन किया जा रहा है.
फिलिस्तीन के प्रवासी और शरणार्थियों ने जर्मनी की कानून व्यवस्था को हाशिए पर ला दिया. यहां भी इन लोगों ने फिलिस्तीन और हमास के समर्थन में प्रदर्शन किया. ये लोग जानकर भी अंजान बन रहे हैं, दरअसल आतंकी संगठन हमास के हमले में एक जर्मन लड़की के साथ हुई बर्बरता, पूरी दुनिया ने देखी. बावजूद इसके चरमपंथी समर्थकों का दल जर्मनी में ही प्रदर्शन कर रहा है.
ये जितने भी लोग,हमास के आतंकी हमले के निंदा ना करते हुए, उनके और फिलिस्तीन के समर्थन में नारेबाजी कर रहे हैं. ये लोग अपनी जमीन के लिए लड़ने, अपने देश नहीं जाना चाहते हैं. ये वही लोग हैं, जो दूसरे देशों में रहकर आतंकवादियों का समर्थन कर रहे हैं, हमास जैसे आतंकी संगठनों को ‘आजादी के लड़ाके’ बता रहे हैं, लेकिन फिलिस्तीन के खराब हालातों में उसके देश के ही नागरिक मदद के लिए, वापस नहीं जाना चाहते हैं.
एक तरफ ये फिलिस्तीनी प्रवासी, शरणार्थी और समर्थक हैं, जो ब्रिटेन और यूरोपीय देशों के सुरक्षित माहौल में रहकर, विरोध का नाटक कर रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ इजरायल के नागरिक पूरी दुनिया से, अपने देश लौट रहे हैं. जंग के इस माहौल में वो अपने देश की तरफ से लड़ने के लिए सबकुछ छोड़कर, लौट रहे हैं.
इजरायल-हमास युद्ध को लेकर, खासतौर से इजरायल के गाजा पट्टी पर जवाबी हमले को लेकर, अरब देशों में खलबली मची हुई है. ये सभी इजरायल के विरोध में आवाज़ उठा रहे हैं. लेबनान, सीरिया जैसे देश तो इजरायल पर एक और युद्ध थोपने के लिए हमले भी कर रहे हैं. बावजूद इसके, कोई भी देश, फिलिस्तीनी नागरिकों को अपने यहां शरण नहीं लेने देना चाहता है.
इजरायल ने गाज़ा के उत्तरी हिस्से को खाली करने की धमकी दी है. आपको बता दें कि गाजा के इसी उत्तरी हिस्से में मौजूद Erez Crossing से ही हमास के आतंकी, इजरायल में दाखिल हुए थे. फिर यहीं से गाड़ियों और मोटरसाइकिलों के जरिए, इजरायल के किबुत्ज यानी रिहायशी इलाकों में जाकर, नागरिकों को गोली मारनी शुरू की थी. हमास के आतंकियों ने यहीं से आकर इजरायली नागरिकों का अपहरण भी किया था.
इसी वजह से इजरायल ने अपने हमले में सबसे पहले गाजा के इसी उत्तरी हिस्से को टारगेट किया. इस उत्तरी हिस्से में ही गाजा सिटी पड़ता है. इजरायल ने जमीन हमले करने से पहले, गाजा पट्टी के नागरिकों से यही हिस्सा खाली करने की धमकी दी थी. इसकी में जो हिस्सा आप एक लकीर के तौर पर देख रहे हैं. उसको आप एक रोड समझिए, जिससे होकर, गाजा पट्टी के उत्तरी हिस्से से निकलने की अनुमति दी गई है.
गाजा पट्टी के दक्षिण हिस्सी में मिस्र की सीमा लगती है. जिसमें दो सीमा ही खोली जाती है. इसमें एक Kerem Shalom Goods Crossing है, जिससे गाजी पट्टी में सामान का लेनदेन होता है. दूसरी है Rafa Crossing, इस Border Crossing से हाल फिलहाल में गाजा के लोग, मिस्र जाने की कोशिश में लगे हुए हैं.
इजरायल की चेतावनी के बाद गाजा पट्टी के करीब 23 लाख लोग यहां से निकलना चाहते हैं. हालांकि इजरायल ने अभी फिलहाल गाजा पट्टी के उत्तरी इलाके से लोगों को चले जाने की चेतावनी दी है. लेकिन पूरे गाजा पट्टी के लोग,यहां से जाना चाहते हैं. हालांकि हमास के आंतकी, गाजा की मस्जिदों से गाजा पट्टी के लोगों को शहर ना छोड़ने की धमकियां दे रहे हैं. दरअसल गाजा पट्टी के नागरिकों को Human Sheild बनाकर, हमास के आंतकी, इजरायल से जंग लड़ रहे हैं. वो नहीं चाहते हैं कि फिलिस्तीनी नागरिक चले जाएं, और हमास के आतंकी इजरायल के सैनिकों का शिकार बनें.
गाजा पट्टी एक ऐसा इलाका है, जिसके पश्चिमी छोर पर विशाल भूमध्य सागर है.इसके उत्तर और पूर्व में इजरायल है. दक्षिणी छोर पर मिस्र है, जहां से उन्हें कुछ उम्मीद है. गाजा पट्टी से मिस्र की करीब 10 से 12 किलोमीटर लंबी सीमा जुड़ती है. लेकिन मिस्र में दाखिल होने के लिए केवल एक ही सीमा है, जिसे Rafa Border Crossing कहा जाता है. देखा जाए तो गाजा पट्टी के लोगों के लिए इजरायल की धमकी के बाद, दूसरे देश भागने का एकमात्र रास्ता Rafa Border Crossing ही है. लेकिन गाजा पट्टी के फिलिस्तीनी नागरिकों के लिए किसी दूसरे देश जाना, आसान नहीं है. भले ही अरब देश फिलिस्तीनी के नाम पर बवाल खड़ा कर दें, लेकिन वो किसी भी हाल में एक भी फिलिस्तीनी नागरिक को अपने देश में नहीं लेना चाहते हैं.
मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतह अल सीसी ने साफ शब्दों में कह दिया है, कि Rafa Border Crossing केवल गाजा के लोगों तक मदद पहुंचाने के लिए खोली गई है, ना कि, मिस्र में आने के लिए. मिस्र ने गाजा पट्टी के लोगों को अपने यहां शरणार्थी की तरह लेने से साफ इनकार कर दिया है. मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतह अल सीसी ने फिलिस्तीन के लोगों को यहां तक कहा है, कि युद्ध की इस घड़ी में उन्हें अपने ही देश फिलिस्तीन में रहना चाहिए.
कुछ यही संदेश JORDAN के किंग अब्दुल्ला ने भी दिया है. उन्होंने कहा कि फिलिस्तीन के लोगों को किसी भी कीमत पर अपनी जमीन नहीं छोड़नी चाहिए. अभी कुछ दिन पहले किंग अब्दुला ने इजरायल-फिलिस्तीन जंग पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक से भी मुलाकात की थी. अब यहां एक सवाल ये उठता है कि, जो अरब देश, दुनियाभर में इजरायल के हमलों की निंदा करते हुए, प्रदर्शन कर रहे हैं. वो अरब देश, जो फिलिस्तीन के नागरिकों के हक की आवाज़ उठाने की बात कर रहे हैं. वो अपने देश में फिलिस्तीन के शरणार्थियों को पनाह क्यों नहीं देना चाहते हैं. तो इसके पीछे कई वजह हैं.
सबसे पहले हम बात करेंगे मिस्र की, जिसने राहत सामग्री भेजने के लिए सीमाएं खोली हैं, लेकिन फिलिस्तीनी शरणार्थियों को नहीं आने दे रहा है. बहुत कम लोग जानते हैं कि वर्ष 2005 में गाजा पट्टी पर हमास के नियंत्रण के बाद से ही, इजरायल ने गाजा पट्टी की सीमाओं को सील किया हुआ है. गाजा बॉर्डर को सील किए जाने में मिस्र ने इजरायल का पूरा साथ दिया है. वर्ष 2007 से ही मिस्र इस काम में इजरायल की मदद कर रहा है.
अरब देश गाजा पट्टी को दुनिया की सबसे बड़ी खुली जेल कहते हैं. लेकिन वो ये किसी को नहीं बताते हैं कि खुद एक अरब देश मिस्र, इस काम में इजरायल का साथी है. ऐसा करने के पीछे मिस्र की मजबूरी है. दरअसल मिस्र ने आज से करीब 4 दशक पहले, इजरायल के साथ एक शांति समझौता कर लिया था. इस शांति समझौते के तहत इजरायल ने मिस्र के शिनाई रेगिस्तान को खाली कर दिया था. इसके बदले में मिस्र ने इजरायल को भरोसा दिलाया था, कि उनकी सीमा से इजरायल पर कभी कोई आतंकी हमला नहीं होगा. वर्ष 2012 में मिस्र में तख्तापलट हो गया था. जिसके बाद मिस्र समेत कई देशों में प्रतिबंधित आतंकी संगठन MUSLIM BrotherHood के नेता मोहम्मद मोरसी को हटाकर, अब्दुल फतह अल सीसी राष्ट्रपति बन गए थे.
वर्ष 2012 से 2020 तक शिनाई रेगिस्तान में MUSLIM BrotherHood और फिलिस्तीन समर्थक आतंकी संगठनों ने अल सीसी और मिस्र की सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध शुरू कर दिया. अब्दुल फतह अल सीसी इस बात से परेशान हैं, कि अगर गाजा पट्टी से और ज्यादा फिलिस्तीनी आए, तो शिनाई रेगिस्तान से मिस्र का नियंत्रण लगभग खत्म हो जाएगा. उन्हें डर है कि फिलिस्तीनी नागरिकों के आने से शिनाई में आतंकी संगठन और ज्यादा मजबूत होंगे. ऐसे होने पर इजरायल के साथ मिस्र के संबंधों पर भी असर पड़ेगा. केवल मिस्र ही नहीं, फिलिस्तीनी शरणार्थियों को लेकर जॉर्डन भी परेशान हैं.
वर्ष 1948 में इजरायल और अरब देशों के बीच हुए युद्ध में लगभग 7 लाख फिलिस्तीनी नागरिक, अलग-अलग देशों में शरणार्थी बन गए थे. फिलिस्तीनी लोग इस युद्ध को ‘नकबा’ कहते हैं. ये शरणार्थी आजतक अपने देश फिलिस्तीन नहीं लौटे हैं. यही नहीं वर्ष 1967 के युद्ध में भी कई फिलीस्तीनी नागरिकों ने पड़ोसी देशों में शरण ले ली थी. .
आज के समय में Jordan, Lebnon, Syria, और Egypt (मिस्र) में कुल मिलाकर 57 लाख फिलिस्तीनी शरणार्थी रहते हैं. 57 लाख में से 40 प्रतिशत शरणार्थी तो अकेले Jordan में ही रहते हैं.
एक आंकलन ये भी है हैं कि Jordan की करीब 1 करोड़ की आबादी में आधी संख्या फिलिस्तीनी शरणार्थियों की है. Jordan ने लाखों फिलिस्तीनियों को शरण दी, और इसके बदले में Jordan को एक लंबा गृह युद्ध मिला. वर्ष 1970 के दशक में Jordan में मौजूद फिलिस्तीनी शरणार्थियों का संगठन Palestine Liberation Organization काफी मजबूत हो गया था. PLO के आतंकियों ने इजरायल समेत Jordan में भी आतंकी हमले किए और एयरप्लेन हाइजैक शुरू कर दिया. PLO के आतंकियों ने 2 बार Jordan के किंग को भी मारने का प्रयास किया था.
इन लोगों का मानना था कि Jordan का किंग, इजरायल के खिलाफ उनका समर्थन नहीं कर रहा है. वर्ष 1970 में Jordan के किंग हुसैन ने अपनी सेना को PLO पर हमले का आदेश दे दिया था. इस हमले में हजारों फिलिस्तीनी शरणार्थी और आतंकी मारे गए थे. इन हमलों को फिलिस्तीनी नागरिक Black September कहते हैं. इसी Black September के नाम पर एक आतंकी संगठन बनाया गया. Black September Group ने आगे चलकर कई बड़े आतंकी हमले किए, जिसमें Munich olympic में इजरायल के खिलाड़ियों पर हमला भी शामिल है.
यही नहीं Black September Group के आतंकियों ने वर्ष उन्नीस सौ बहत्तर में सबीना एयरलाइंस के एक प्लेन को हाइजैक कर लिया था. इजरायली कमांडो फोर्स ने सभी यात्रियों को बचा लिया था. लेकिन इस ऑपरेशन में इजरायल के एक कमांडो को गोली लगी थी. वो कमांडो कोई और नहीं इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजमिन नेतन्याहू ही थे. फिलिस्तीन पर इजरायल के हमलों को लेकर पाकिस्तानी भी काफी विरोध में है. हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि पाकिस्तानी सेना ने वर्ष उन्नीस सौ सत्तर में Jordan जाकर हजारों फिलिस्तीनी शरणार्थियों को मारा था. पाकिस्तानी सेना के इस हमले में PLO के कई नेता और समर्थक मारे गए थे. हमला करने वाली पाकिस्तानी सेना की टुकड़ी को जिया-उल-हक लीड कर रहे थे, जिया-उल-हक ही आगे चलकर पाकिस्तान के सैन्य शासक भी बने थे.
वर्ष 1970 से 1975 के बीच JORDAN से PLO के आतंकियों को लगभग खत्म कर दिया गया था. लेकिन इनमें से कुछ आतंकी जान बचाकर, LEBNON चले गए थे. इन आतंकियों ने LEBNON को भी गृह युद्ध में धकेल दिया. LEBNON में वर्ष 1975 से लेकर 1990 तक यानी करीब 15 वर्षों तक गृह युद्ध चला. जिसमें हजारों लोग मारे गए.
अब आप सोचिए, जो अरब देश, फिलिस्तीन के समर्थन में खड़े हैं, वो किसी भी हाल में नहीं चाहते हैं कि, फिलिस्तीन के लोग, उनके देश में शरण लें. वो जानते हैं कि फिलिस्तीनी नागरिकों को अपने यहां शरण देने का मतलब है देश को गृहयुद्ध में धकेल देना. इसीलिए वो फिलिस्तीनी नागरिकों को गाजा पट्टी में ही रहने की सलाह भी दे रहे हैं. यही नहीं वो हमास जैसे आतंकी संगठन को मदद करने का भरोसा भी दिला रहे हैं. वो जानते हैं कि हमास, गाजा पट्टी में रहेगा तो फिलिस्तीनी नागरिकों को Human Sheild बनाने के चक्कर में रोककर रखेगा, जिससे शरणार्थी संकट पैदा नहीं होगा.
इस तरह से वो एक तीर से दो शिकार कर लेंगे. लेकिन अरब देशों की ये चालबाजी बहुत ज्यादा दिनों तक छिपने वाली नहीं है. देखा जाए तो फिलिस्तीन के पड़ोस में जितने भी अरब देश हैं चाहे वो मिस्र हो, लेबनान हो, सीरिया हो या फिर जॉर्डन. कोई भी फिलिस्तीन के शरणार्थियों को अपने यहां शरण नहीं देना चाहता है. उन्होंने अपने इतिहास से सीखा है कि अगर फिलिस्तीन के शरणार्थियों को पनाह दी, तो उनके देश में आतंकवाद, चरमपंथी विचारधारा,अस्थिरता और आशांति का कारण बनेंगे.
हमास की बर्बरता पर जो लोग चुप रहे, वो इजरायल के हमलों पर मुखरता से मानवता की दुहाई दे रहे हैं. लेकिन इजरायल एक ऐसा देश है, जो अपने चारों तरफ से कुछ ऐसे देशों से घिरा हुआ है, जहां इस्लामिक आतंकवाद चरम पर है. फिलिस्तीन के पास आतंकी संगठन हमास है. मिस्र में आतंकी संगठन मुस्लिम ब्रदरहुड है. सीरिया में आतंकी संगठन ISIS, अल नुसरा फ्रंट,अलकायदा. लेबनान में आतंकी संगठन हिजबुल्ला और फिलिस्तीनी आतंकी संगठन इस्लामिक जिहाद हैं.
देखा जाए तो इजरायल को अपने पड़ोसी देशों से ज्यादा, वहां के आतंकी संगठनों से खतरा है. हमास के आतंकी तो खुले तौर पर इजरायल में बर्बर हमला करके चले गए, अब उसका समर्थन करने के लिए लेबनान सीमा पर हिजबुल्ला भी एक्टिव हो गया है. आज सुबह हिजबुल्ला की तरफ से इजरायल पर एंटी टैंक गाइडेड मिसाइलें दागी गई थीं. हमास की तरह ही ईरान, हिजबुल्लाह का भी समर्थन करता है. हिजबुल्लाह, एक ऐसा आंतकी संगठन है, जो आधुनिक हथियारों से भी लैस है. एक दावे के मुताबिक हिजबुल्लाह के पास 40 हजार से ज्यादा आतंकी हैं. यानी इजरायल को केवल हमास से खतरा नहीं है, बल्कि उसे हिजबुल्लाह समेत पड़ोसी देशों के आतंकी संगठनों से भी खतरा है.
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— Zee News (@ZeeNews) October 16, 2023
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