Home World Taiwan Presidential Election: पड़ोसी मुल्क में चुनाव, नजर चीन की; DPP से इतना खार क्यों खाते हैं जिनपिंग?

Taiwan Presidential Election: पड़ोसी मुल्क में चुनाव, नजर चीन की; DPP से इतना खार क्यों खाते हैं जिनपिंग?

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Taiwan Presidential Election: पड़ोसी मुल्क में चुनाव, नजर चीन की; DPP से इतना खार क्यों खाते हैं जिनपिंग?

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China- Taiwan Relations:  चीन के 13 पड़ोसी मुल्क लेकिन रिश्ते किसी से भी ठीक नहीं. रिश्ते बनते और बनाए जाते हैं. हालांकि उसके लिए एक दूसरे के प्रति सम्मान का भाव हो. ऊंच-नीच का भाव नहीं हो. लेकिन चीन अपने विस्तारवादी सोच की वजह से रिश्तों में गुणा गणित का माहिर है. जमीन कब्जा करने की नीयत, कमजोर और गरीब मुल्कों को कर्ज के जाल में फंसा कर दबदबा कायम करने की कोशिश चीन की नीति का अहम हिस्सा है. श्रीलंका और जिबूती उसके जीते जागते सबूत है. इन सबके बीच हम बात करेंगे ताइवान की. करीब 36 हजार वर्ग किमी में फैले ताइवान में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव हो रहा है. यह चुनाव ताइवान के लिए जितना अहम है उससे कहीं अधिक मायने चीन के लिए रखता है. अब इसके पीछे की वजह भी समझिए. तीन दल डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी, द कुओमिनटैंग और ताइवान पीपल्स पार्टी आमने सामने हैं.

‘D’ अक्षर से डरता है चीन

डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी पिछले तीन टर्म से सत्ता है. ताइवान की जनता इस दल को लोकतंत्र का सबसे हिमायती मानती है. वहीं द कुयोमिनटैंग को चीन का समर्थक तो ताइवान पीपल्स पार्टी घरेलू मुद्दों को उठाने के लिए जानी जाती है. चीन को डेमोक्रेटिक नाम से परहेज है. उसके पीछे वजह भी है क्योंकि चीन का मानना है कि ताइवान में लोकतंत्र की मजबूती का मतलब ये है कि उसकी सत्ता को चुनौती मिलती रहेगी. अगर पिछले कुछ मामलों को देखें तो डीपीपी की सरकार खुले तौर पर चीन की घुड़क नीति का विरोध करती रही है. ताइवान के एयर स्पेस को तो चीन अपना प्ले ग्राउंड मानता है, जब मन करता है वो ताइवान के एयर स्पेस में घुस जाता है. लेकिन आप अब देखते होंगे की ताइवान के फाइटर प्लेन भी अब पीछा करने का मौका नहीं छोड़ते. अब आप चीन की गुस्ताखी को ऐसे भी समझ सकते हैं,राष्ट्रपति चुनाव से ठीक पहले चीन ने अपने 6 लड़ाकू विमान भेजे थे. इसकी पुष्टि ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने भी की है.

डर की ये है खास वजह

सवाल यह है कि डीपीपी से चीन को परेशानी क्यों है. दरअसल सत्ता में डीपीपी के आने का मतलब यह है कि अमेरिका का प्रभाव बढ़ेगा. अमेरिकी प्रभाव का मतलब यह है कि दक्षिण चीन सागर में चीन को चुनौती मिलेगी. इससे भी बड़ी बात यह है कि सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में ताइवान का दबदबा है. दुनिया के अलग अलग देशों को करीब 90 फीसद सेमीकंडक्टर का निर्यात ताइवान करता है. मौजूदा और आने वाला समय चिप इंडस्ट्री का है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का है. चीन को यह पता है कि ऑर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में अमेरिका उसे चुनौती दे सकता है, ऐसे में यदि अमेरिका को आसानी से सेमीकंडक्टर तक पहुंच होगी तो उसका असर चीन पर होगा. लिहाजा जिनपिंग की सरकार डीपीपी को अपने सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर देखती है.

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