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खबरों के खिलाड़ी।
– फोटो : Amar Ujala
विस्तार
बीते हफ्ते लोकसभा चुनाव की घोषणा हो गई। पहले चरण के मतदान के लिए नामांकन की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। नजरें उत्तर प्रदेश पर हैं। भाजपा-कांग्रेस की अगली सूची का इंतजार है। यह भी चर्चा चल रही है कि क्या कांग्रेस रायबरेली या अमेठी से प्रियंका गांधी को उम्मीदवार बना सकती है? इस बार खबरों के खिलाड़ी’ में इसी विषय पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, जयशंकर गुप्त, प्रेम कुमार और अवधेश कुमार मौजूद रहे।
वरुण गांधी को लेकर अटकलें चल रही हैं। इस पर क्या कहेंगे?
रामकृपाल सिंह: वरुण गांधी को लेकर तमाम तरह के कयास लगाए जाते रहे हैं। भाजपा की विचारधारा और वरुण के विचारों में विरोधाभास नजर आता है। हालांकि, चुनावों में विचारधारा का कोई काम नहीं होता। जीतने की योग्यता ही मायने रखते हैं। वरुण गांधी को अगर भाजपा टिकट देगी, तो मजबूरी में ही देगी। गांधी परिवार की आप कितनी भी आलोचना कर लें, वो परिवार देश की राजनीति में महत्वपूर्ण रहेगा। इंदिरा गांधी जिन्हें अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाना चाहती थीं, उन्हीं संजय गांधी के पुत्र वरुण गांधी हैं। ऐसे में उनका नाम महत्वपूर्ण हो जाता है।
क्या भाजपा वरुण गांधी पर दांव लगाएगी?
अवधेश कुमार: इस समय पर भारत की राजनीति बदल गई है। कभी भाजपा को अस्पृश्य माना जाता था। अब ऐसा नहीं है। अब नेता पाला बदल लेते हैं और कहते हैं कि हम तो राम मंदिर के कभी विरोधी थे ही नहीं। वरुण गांधी सराकर की कुछ नीतियों को लेकर लिखते रहते हैं। उन्होंने भाजपा या आरएसएस का विरोध नहीं किया है। भाजपा उनके बारे में गंभीरता से विचार कर रही है। कार्यकर्ताओं को लग सकता है कि वरुण ऐसा क्यों लिख रहे हैं, लेकिन भाजपा के लिए वे अवांछनीय नहीं हैं। मेनका गांधी और सोनिया गांधी के बीच जिस तरह दूरी रही है, ऐसे में वरुण गांधी के लिए कांग्रेस में जाना आसान नहीं होगा। हालांकि, इंडी गठबंधन तो यही चाहता है कि भाजपा का कोई बड़ा नाम उनके खेमे में आ जाए।
क्या प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश से चुनाव लड़ेंगी?
प्रेम कुमार: अमेठी और रायबरेली सीट को गांधी परिवार नहीं छोड़ेगा। अमेठी से राहुल गांधी और रायबरेली से प्रियंका गांधी चुनाव लड़ सकती हैं। जहां तक वरुण गांधी की बात है तो राहुल गांधी कह चुके हैं कि अगर मैं कुछ कहूंगा तो वरुण को दिक्कत हो जाएगी, ऐसे में फैसला उन्हें लेना है। वरुण ने अभी भाजपा नहीं छोड़ी, न ही भाजपा ने उन्हें कोई महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है। ऐसे में आगे क्या करना है, यह वरुण को ही तय करना है। अगर प्रियंका गांधी को चुनावी राजनीति में नहीं आना होता तो वे राज्यसभा चली गईं होतीं। इसके ये मायने हैं कि चुनावी राजनीति में कांग्रेस उन्हें आजमाएगी। अब ये किस रूप में होगा, इसका खुलासा होना बाकी है। उधर, पल्लवी पटेल और स्वामी प्रसाद मौर्य के अलग होने से अखिलेश यादव को नुकसान हो सकता है।
जयशंकर गुप्त: भाजपा इस मामले में निर्मम है। वो जानती है कि किसकी राजनीतिक उपयोगिता कब तक है। तभी तक वो उनका इस्तेमाल करती है। भाजपा की नजरों में वरुण गांधी और मेनका गांधी की उपयोगिता अब उतनी नहीं रही गई है। भाजपा राजनीतिक उपयोगिता देख रही है। ओमप्रकाश राजभर कभी कहते थे कि भाजपा में दलितों और पिछड़ों की कोई हैसियत नहीं है। अब वे राज्य सरकार में मंत्री हैं। इंडी गठबंधन यहीं पर चूक कर रहा है। वह चंद्रशेखर आजाद, पल्लवी पटेल को साथ नहीं रख पाया।
अवधेश कुमार: कांग्रेस को पहले ही कह देना था कि प्रियंका गांधी चुनाव लड़ेंगी। अब देर हो चुकी है। वे चुनावी राजनीति में आना चाहती थीं, लेकिन उनका परिवार ही उन्हें नहीं आने दे रहा। राहुल गांधी एक बार अमेठी से हार चुके हैं, तो कांग्रेस नहीं चाहेगी कि पहली बार चुनाव लड़कर प्रियंका गांधी कहीं से हार जाएं। प्रियंका यूपी में लगातार सक्रिय रहती हैं, लेकिन उसका कांग्रेस को आज तक क्या फायदा मिला? देश में अब गांधी परिवार के सदस्यों का आकर्षण नहीं है।
रामकृपाल सिंह: राहुल गांधी संभवत: चाहते हैं कि परिवार में तीन प्रमुख लोग हैं और तीनों को सांसद नहीं बनना चाहिए। सोनिया गांधी राज्यसभा जा चुकी हैं, राहुल गांधी वायनाड से लड़ेंगे। ऐसे में प्रियंका गांधी के इस बार चुनाव लड़ने की संभावना कम नजर आती है। जहां तक बाकी उम्मीदवारों की बात है तो आजकल राजनीतिक दल ऐन वक्त पर ही उम्मीदवार तय करते हैं ताकि कोई छिटककर दूसरे दल में न जाए। हर चुनाव से पहले 19 राजनीतिक दल मिलते हैं और तस्वीरें खिंचवाते हैं। 2014, 2019 में यही हुआ। इस बार भी यही हुआ। क्षेत्रीय राजनीतिक दल पहले क्षेत्रीय हैं। उन्हें दिल्ली नहीं जाना है। लोकसभा से ज्यादा उनके लिए विधानसभा चुनाव महत्वपूर्ण हैं। यही वजह है कि कोई भी क्षेत्रीय दल कांग्रेस से एक हद से ज्यादा आगे जाकर समझौता नहीं करना चाहता।
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