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Ground Report Saharanpur : चुनावी पिच पर गुगली में उलझे महारथी, बदली फिजां में मतदाता भी जुटे गुणा-भाग में

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Ground Report Saharanpur: candidates entangled in googly on the election pitch

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– फोटो : अमर उजाला

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अपनी काष्ठ कला के लिए मशहूर सहारनपुर में आजकल चुनावी नक्काशी चल रही है। मोदी लहर के बावजूद पिछले चुनाव में सहारनपुर में कमल मुरझा गया था और यहां हाथी चिंघाड़ा था। मतदाता धीरे-धीरे ही सही, पर अपने मन की गांठ खोल रहा है। फिलहाल यहां इस बार मुकाबला कड़ा है। बदले समीकरणों के हिसाब से मतदाता भी उम्मीदवारों को अपनी कसौटी पर परख रहे हैं। 

सहारनपुर का जिक्र हो और भला उसमें देवबंद शामिल न हो, ऐसा कैसे हो सकता है। दोपहर का वक्त है और नमाज के बाद लोग वापस लौट रहे हैं। यहीं मिले बुजुर्ग अख्तर हुसैन से चुनावी माहौल को लेकर सवाल किए, तो वह बोल पड़े-रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा…। अब आप ही बताइए इसके आगे हम क्या कहें।

अख्तर के मुंह से भगवान राम का नाम भले ही चौंकाने वाला हो, पर वह पूरे आत्मविश्वास से कहते हैं- सही बात तो सही ही है। उससे कैसे इन्कार करें। पास में खड़े उन्हीं के हमउम्र मोहम्मद यासीन खान भी तपाक से कहते हैं- सब अच्छा चल रहा है। हम तो मोदी के ही साथ हैं। सच बताऊं, मोदी की जब कोई काट करता है, तो दिल पर सांप-सा लोट जाता है। फरीद भी उन्हीं की हां में हां मिलाते हैं। 

देवबंद का मिजाज सब जानते हैं, पर यह बदलाव है या राजनीतिक पैंतरेबाजी, इसे समझने में प्रत्याशियों के पसीने छूट रहे हैं। हालांकि सभी मतदाता गोल-गोल जवाब दे रहे हों, ऐसा नहीं है। सलमान और राशिद साफ-साफ कहते हैं, सपा-कांग्रेस का गठबंधन सहारनपुर में इस बार नया रंग दिखाएगा। इमरान मसूद की पुरानी हवा लौट रही है।

समीकरण बदले, माहौल भी बदल रहा 

हम बड़गांव में ग्राम सचिवालय भवन पहुंचे तो वहां भी चुनावी मुद्दों पर चर्चा हो रही थी। चंद्रपाल कहते हैं, महंगाई बहुत बढ़ रही है। काम मिल नहीं रहा है। चंद्रपाल की बातों को काटते हुए विनोद तपाक से कहते हैं, पेंशन का भी तो जिक्र करो। मुफ्त में राशन की बात क्यों नहीं उठाते?

  • इस पर पूर्व प्रधान नाथीराम हस्तक्षेप करते हैं। वह कहते हैं, माहौल बदल रहा है। सहारनपुर में इस बार समीकरण बदला है। राघव लखनपाल पहले लोगों से कम मिलते थे, पर अब वह बदल गए हैं। गिले-शिकवे दूर हुए हैं। इस बार कमल खिलेगा। 
  • चंद्रपाल फिर बीच में कूदते हुए कहते हैं, इस बार चुनाव आसान नहीं है। देश में केवल किसान ही रहते हैं क्या, जो उनका ही बिजली बिल माफ किए। हम गरीबों के भी तो करते। विनोद प्रजापति, अशोक रुहेला कहते हैं, इस बार सहारनपुर में कमल खिलने में कोई दिक्कत नहीं है।

मतदाता भी जुटे हैं गुणा-भाग में

नांगल का बाजार भी चुनावी रंग से गुलजार है। यहां मिले प्रमोद त्यागी कहते हैं, इस बार मुकाबला कड़ा है। कैसे? इस सवाल पर वह कहते हैं, त्रिकोणीय पेच है। किसी की भी राह आसान नहीं है। पिछले चुनाव में भाजपा प्रत्याशी राघव लखनपाल इसलिए हार गए थे, क्योंकि दलित-मुस्लिमों का काफी वोट फजलुर्रहमान को मिला था। चूंकि, पिछली बार की तरह का गठबंधन नहीं है, इसलिए इस बार कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद और बसपा के माजिद अली के बीच मुस्लिम बंटता दिख रहा है। अब आप ही बताइए, सपा का मुस्लिम वोटर भला बसपा को वोट क्यों करेगा? 

मुद्दे तो हैं, पर गोलबंदी हावी 

लाखनौर पहुंचे तो वहां ताश खेलने वाले जमे हुए थे। ताश के पत्तों के साथ-साथ चुनावी शह-मात का भी खेल चल रहा था। बातों-बातों में ही किसी को हराया, तो किसी को जिताया जा रहा था। चुनावी चर्चा छिड़ते ही बात रोजगार पर पहुंच गई। एक ने कहा, रोजगार होता तो क्या यहां बैठकर ताश पीटते। एक ने तेजी से अपना पत्ता चलते हुए जवाब दिया- पहले कौन सा किसी फैक्टरी में अधिकारी थे, जो अब नहीं हो। इन्हीं में से एक महाराम कहते हैं, सरकार क्या करे, जनसंख्या ही इस कदर बढ़ रही है। सरकार तो खूब सुविधाएं दे रही है। इसका असर चुनाव में भी होगा। 

  • विनोद कुमार कहते हैं, कानून-व्यवस्था बेहतर है, पर इस समय काम कम मिल रहा है। गोध्यान कहते हैं, सब सही है। बहनजी खुलकर नहीं खेल पा रही हैं। यदि वो खुलकर खेलतीं, तो दूसरे दलों के छक्के छूट जाते। फिर भी काफी वोट बसपा के माजिद को जाएगा और बसपा यह सीट बचा लेगी। हां, यह भी सही है कि काफी दलित वर्ग भाजपा को भी वोट कर रहा है।
  • सहारनपुर शहर में भी चुनावी रंग पक्का हो चुका है। गौरव सुखीजा, मोंटू कालड़ा कहते हैं, यहां के काष्ठ पर काम हुआ। अब यह सरकार की प्राथमिकताओंे में है। हालांकि अभी और सुविधाओं की दरकार है। इस बार इस सीट पर भी बदलाव होगा। शक्ति, दीपक, विजय, भूपेंद्र का भी मानना है कि यहां बदलाव होगा, पर वे यह भी जोड़ते हैं कि लड़ाई कड़ी होगी। 

बड़ा सवाल- मुस्लिम किस ओर 

सहारनपुर सीट पर मुस्लिम मतदाताओं की संख्या अधिक होने से सभी की नजर उनपर है। बड़ा सवाल है कि मुसलमान किसे वोट देंगे। बसपा के माजिद और कांग्रेस के इमरान मसूद दोनों ही के अपने-अपने दावे हैं। उधर, भाजपा को इसका लाभ तो दिख रहा है, पर पिछले चुनाव के समीकरणों पर भी गौर करना होगा। पिछले चुनाव में इसी तरह से दो मुस्लिम प्रत्याशी थे और बसपा के हाजी फजलुर्रहमान जीत गए थे। हालांकि उस समय समय सपा, बसपा और रालोद का गठबंधन भी था। 

हर बार बदल रही हाथी की सवारी

बसपा उम्मीदवार हर साल बदल रहे हैं। वर्ष 2014 के चुनाव में जगदीश राणा, 2019 में हाजी फजलुर्रहमान और अब माजिद अली मैदान में हैं। माजिद भी पुराने धुरंधर हैं, लेकिन लोकसभा चुनाव में पहली बार मैदान में उतरे हैं। देखना यह है कि इस बार हाथी की सवारी का कितना लाभ उन्हें मिलता है। (इनपुट विनीत तोमर)

कानून-व्यवस्था अहम

सवाल तो बहुत हैं, पर एक मुद्दा ऐसा है जिसकी चर्चा सब जगह मिली। वह है-कानून-व्यवस्था। हकीकतनगर चौक में मिलीं महिलाओं से हमने इसपर चर्चा की। सुनीता रानी बोलीं, यह सबसे बड़ा मुद्दा था। इसमें काफी सुधार हुआ है। नीना, दीपिका आशा, विनिता, सिमी भी उनकी हां में हां मिलाती हैं। वे कहती हैं, सुरक्षा हर किसी के लिए जरूरी है। इसका लाभ भाजपा को मिल रहा है।

ज्यादातर चेहरे पुराने, दांव नए

सहारनपुर लोकसभा सीट पर चुनावी दंगल में उतरे दिग्गजों में अधिकतर पुराने ही हैं। भाजपा प्रत्याशी राघव लखनपाल और कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद पहले भी दो बार आमने-सामने हो चुके हैं। वहीं बसपा के माजिद अली पहली बार मैदान में हैं।

  • 2014 के चुनाव में भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी। भाजपा की तरफ से राघव लखनपाल और कांग्रेस की तरफ से इमरान मसूद मैदान में थे। भाजपा के राघव लखनपाल ने 4,72,999 वोट हासिल कर जीत का परचम फहराया था। दूसरे स्थान पर रहे इमरान मसूद को 4,07,909 वोट और तीसरे स्थान पर रहे बसपा के जगदीश राणा को 2,35,033 वोट मिले थे।
  • 2019 के चुनाव में पहिया एक बार फिर घूमा और इन्हीं दलों से दोनों फिर से मैदान   में आ गए। हालांकि गठबंधन में बसपा की तरफ से चुनाव लड़ रहे हाजी फजलुर्रहमान ने 5,14,139 वोटों के साथ जीत दर्ज की। वहीं 4,91,722 वोटों के साथ भाजपा के राघव लखनपाल दूसरे स्थान पर और 2,07,068 वोटों के साथ इमरान मसूद तीसरे स्थान पर रहे थे।

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