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'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- अरि, जिसका अर्थ है- शत्रु, वैरी, चक्र, चक्कर, काम, क्रोध। प्रस्तुत है माखनलाल चतुर्वेदी की कविता- रक्त-तर्पण भर का अभिमान
गिनो न मेरी श्वास,
छुए क्यों मुझे विपुल सम्मान?
भूलो ऐ इतिहास,
ख़रीदे हुए विश्व-ईमान!!
अरि-मुंडों का दान,
रक्त-तर्पण भर का अभिमान,
लड़ने तक महमान,
एक पूँजी है तीर-कमान!
मुझे भूलने में सुख पाती,
जग की काली स्याही,
दासो दूर, कठिन सौदा है
मैं हूँ एक सिपाही!
क्या वीणा की स्वर-लहरी का
सुनें मधुरतर नाद?
छिः! मेरी प्रत्यंचा भूले
अपना यह उन्माद!
झंकारों का कभी सुना है
भीषण वाद विवाद?
क्या तुमको है कुरु-क्षेत्र
हलदी घाटी की याद!
सिर पर प्रलय, नेत्र में मस्ती,
मुट्ठी में मनचाही,
लक्ष्य मात्र मेरा प्रियतम है,
मैं हूँ एक सिपाही।
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3 hours ago
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