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'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- उद्भ्रांत, जिसका अर्थ है- घूमता या चक्कर खाता हुआ, भूला-भटका हुआ, उन्मत्त, पागल। प्रस्तुत है अज्ञेय की कविता- आज थका हिय-हारिल मेरा!
इस सूखी दुनिया में प्रियतम मुझको और कहाँ रस होगा?
शुभे! तुम्हारी स्मृति के सुख से प्लावित मेरा मानस होगा!
दृढ़ डैनों के मार थपेड़े अखिल व्योम को वश में करता,
तुझे देखने की आशा से अपने प्राणों में बल भरता,
उषा से ही उड़ता आया, पर न मिल सकी तेरी झाँकी
साँझ समय थक चला विकल मेरे प्राणों का हारिल-पाखी :
तृषित, श्रांत, तम-भ्रांत और निर्मम झंझा-झोंकों से ताड़ित—
दरस प्यास है असह, वही पर किए हुए उसको अनुप्राणित!
गा उठते हैं, ‘आओ आओ!’ केकी प्रिय धन को पुकार कर
स्वागत की उत्कंठा में वे हो उठते उद्भ्रांत नृत्य पर!
चातक-तापस तरु पर बैठा स्वाति-बूँद में ध्यान रमाए,
स्वप्न तृप्ति का देखा करता ‘पी! पी! पी!’ की टेर लगाए;
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12 घंटे पहले
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