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Himachal Exit Poll: चुनावी पिच पर रिवाज ने खिलाया कांग्रेस का चेहरा, पार्टी को सरकारी कर्मियों ने दिया सहारा!

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Himachal Exit Poll: चुनावी पिच पर रिवाज ने खिलाया कांग्रेस का चेहरा, पार्टी को सरकारी कर्मियों ने दिया सहारा!

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हिमाचल प्रदेश का एग्जिट पोल

हिमाचल प्रदेश का एग्जिट पोल
– फोटो : अमर उजाला

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एक्सिस माय इंडिया, एग्जिट पोल के नतीजे, हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में ‘रिवाज’ नहीं बदलने की संभावना जता रहे हैं। यानी हर पांच साल में सरकार बदलने वाला रिवाज, इस पहाड़ी राज्य में जारी रह सकता है। यह रिवाज, पिछले 32 साल से चला आ रहा है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से लेकर राज्य स्तर के नेताओं ने लोगों के बीच खूब जोरशोर से कहा था कि इस बार रिवाज बदलेगा। भाजपा को उम्मीद थी कि उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड की तर्ज पर लगातार दूसरी बार हिमाचल प्रदेश में कमल खिलेगा। कांग्रेस पार्टी अपने चुनाव प्रचार में इस बात को लेकर निश्चिंत रही कि पांच साल वाला रिवाज जारी रहेगा। चुनावी पिच पर ‘रिवाज’ के चक्कर में धीमा खेल रही ‘कांग्रेस’ पार्टी को सरकारी कर्मियों ने अंतिम ओवर में लड़खड़ाने से बचा लिया। हर विधानसभा क्षेत्र में सरकारी कर्मचारी, 15-20 हजार से ज्यादा वोटों की ताकत रखते हैं। सरकारी कर्मियों की यह संख्या, चुनाव के संभावित नतीजों में बदलाव कराने के लिए काफी है।
 
कांग्रेस ने ‘रिवाज’ को सबसे बड़ा फैक्टर माना
कांग्रेस ने चुनावों की घोषणा के तुरंत बाद अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से यह बात कह दी थी कि वे मैदान पर उतर जाएं। ये चुनाव मोदी बनाम राहुल नहीं होगा। राहुल गांधी, चुनाव प्रचार में नहीं आएंगे। पार्टी ने अपने पक्ष में ‘रिवाज’ को सबसे बड़ा फैक्टर माना। दूसरे नंबर पर ‘पुरानी पेंशन’ का मुद्दा उठाया। हिमाचल प्रदेश को ‘कर्मचारी राज्य’ भी कहा जाता है। यहां हर चौथा व्यक्ति सरकारी नौकरी, निगम व दूसरे संस्थान में काम करता है। चुनाव में सरकारी कर्मियों की अहम भूमिका रहती है। कांग्रेस पार्टी ने इसका भरपूर फायदा उठाया। कांग्रेस ने सरकारी कर्मियों के लिए पुरानी पेंशन लागू करने का ऐलान कर दिया। 18 से 60 वर्ष की आयु की महिलाओं को हर माह 15 सौ रुपये देने और 300 यूनिट मुफ्त बिजली देने की घोषणा कर दी। चुनाव में सरकारी कर्मियों की नाराजगी और भाजपा के बागियों का फायदा उठाने में कांग्रेस सफल होती दिखाई दी। कांग्रेस पार्टी ने विकास के अलावा ‘कमीशन और क्रप्शन’ के मुद्दे को भी खूब भुनाया। 

राजस्थान और छत्तीसगढ़ का दिया उदाहरण
हिमाचल प्रदेश के शहरी इलाके, जैसे बिलासपुर, शिमला, सोलन, मंडी और धर्मशाला में सरकारी कर्मियों ने चुप्पी साध रखी थी। भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही दलों के नेताओं की रैलियां भीड़ के हिसाब से अच्छी जा रही थी। हालांकि जब सरकारी कर्मियों से बात की जाती तो वे बहुत कम शब्दों में, मगर ओपीएस की बात करते थे। इससे पता चलता है कि प्रदेश में यह बड़ा मुद्दा रहा है। सीएम जयराम ठाकुर, खुद को इस मुद्दे पर असहाय मानकर चल रहे थे। आंदोलन के बाद उन्होंने नाराज कर्मियों से मुलाकात की। उन्हें समझा बुझाकर, आंदोलन को बड़ा होने से रोक दिया। चुनाव में सरकारी कर्मियों का मुद्दा, एक गंभीर मसला था। एक अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने माना था कि ये बड़ा मुद्दा है और इसमें वे कुछ नहीं कर सकते। केंद्र के अनुसार ही उन्हें चलना होगा। वे कर्मियों से इतना जरुर कहते थे कि जब कभी इस पर विचार होगा, तो वह डबल इंजन की सरकार में ज्यादा प्रभावी तरीके से हो सकेगा। दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी ने हिमाचल के सरकारी कर्मियों को बता दिया कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी पुरानी पेंशन लागू की गई है। हिमाचल में कांग्रेस सत्ता में आई तो यहां भी ओपीएस लागू होगा। 

ओपीएस बाबत मुख्यमंत्री कुछ नहीं कर सकते
चुनाव प्रचार के दौरान लोगों से जब जयराम ठाकुर के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि सीएम से उन्हें कोई नाराजगी नहीं है। लोगों ने उनकी छवि को अच्छा बताया था। उन्हें जमीन से जुड़ा नेता बताया। सरकारी कर्मियों को यह मालूम था कि ओपीएस बाबत मुख्यमंत्री कुछ नहीं कर सकते। सेब उत्पादकों की नाराजगी दूर करने के लिए जयराम ठाकुर ने पैकेजिंग पर बढ़ा छह प्रतिशत जीएसटी सरकार द्वारा वहन करने की बात कही। भले ही एग्जिट पोल में बेरोजगारी को बड़ा मुद्दा नहीं बताया गया है, लेकिन प्रदेश में  लगभग 9 लाख पंजीकृत बेरोजगार और 12 लाख गैर पंजीकृत बेरोजगार, एक मुद्दा रहा है। जयराम ठाकुर ने कहा था, कांग्रेस ने 2012 में हर परिवार एक सरकारी नौकरी देने की गारंटी दी थी। वह वादा कभी पूरा नहीं हुआ। भाजपा ने चुनाव से पहले गरीबों को 125 यूनिट मुफ्त बिजली देने की योजना शुरु की। कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में 300 यूनिट मुफ्त बिजली देने की बात कही है। 

केंद्रीय नेताओं को निराश नहीं किया 
बागवान का मुद्दा अहम रहा है। हिमाचल में करीब दो दर्जन विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पर अधिकांश परिवारों के लिए सेब की खेती ही मुख्य रोजगार है। बागवानों ने जीएसटी को लेकर सचिवालय का घेराव, गिरफ्तारियां दी और धरना प्रदर्शन किया था। हिमाचल प्रदेश में एक बड़ी बात यह रही कि वहां पर बड़े नेताओं के दौरों से लोगों का मूड नहीं बदला। पीएम मोदी की रैलियों में भी खूब भीड़ जुटी तो वहीं प्रियंका गांधी को भी लोगों ने निराश नहीं किया। शिमला, मंडी और बिलासपुर में वोटरों का कहना था कि प्रदेश में किसी भी पार्टी के टॉप नेताओं से उन्हें ज्यारा सरोकार नहीं है। बात केवल मुद्दों की है, हिमाचल के लोग राजनीतिक रूप से जागरूक हैं। यहां नेताओं की रैलियों से चुनाव नहीं पलटता। सेब उत्पादक हों या सरकारी कर्मचारी, वे खुश नहीं हैं।

टॉप नेता के करियर पर दाग
भाजपा ने डबल इंजन की सरकार को लेकर, वोटरों को यह भरोसा दिलाया था कि इस बार रिवाज टूटता है तो प्रदेश को कई बड़ी सौगात मिलेंगी। प्रदेश में जेपी नड्डा को लेकर, खासतौर से बिलासपुर जैसे क्षेत्र में लोगों का यह कहना था कि वे जानते हैं कि हिमाचल में भाजपा की हार, इस पहाड़ी इलाके के टॉप नेता के करियर पर दाग लगा सकती है। वे ऐसा नहीं चाहते थे, लेकिन वे अपने कई मुद्दों पर समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे। ओपीएस भी इन्हीं मुद्दों में शामिल रहा है।

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एक्सिस माय इंडिया, एग्जिट पोल के नतीजे, हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव में ‘रिवाज’ नहीं बदलने की संभावना जता रहे हैं। यानी हर पांच साल में सरकार बदलने वाला रिवाज, इस पहाड़ी राज्य में जारी रह सकता है। यह रिवाज, पिछले 32 साल से चला आ रहा है। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से लेकर राज्य स्तर के नेताओं ने लोगों के बीच खूब जोरशोर से कहा था कि इस बार रिवाज बदलेगा। भाजपा को उम्मीद थी कि उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड की तर्ज पर लगातार दूसरी बार हिमाचल प्रदेश में कमल खिलेगा। कांग्रेस पार्टी अपने चुनाव प्रचार में इस बात को लेकर निश्चिंत रही कि पांच साल वाला रिवाज जारी रहेगा। चुनावी पिच पर ‘रिवाज’ के चक्कर में धीमा खेल रही ‘कांग्रेस’ पार्टी को सरकारी कर्मियों ने अंतिम ओवर में लड़खड़ाने से बचा लिया। हर विधानसभा क्षेत्र में सरकारी कर्मचारी, 15-20 हजार से ज्यादा वोटों की ताकत रखते हैं। सरकारी कर्मियों की यह संख्या, चुनाव के संभावित नतीजों में बदलाव कराने के लिए काफी है।

 

कांग्रेस ने ‘रिवाज’ को सबसे बड़ा फैक्टर माना

कांग्रेस ने चुनावों की घोषणा के तुरंत बाद अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से यह बात कह दी थी कि वे मैदान पर उतर जाएं। ये चुनाव मोदी बनाम राहुल नहीं होगा। राहुल गांधी, चुनाव प्रचार में नहीं आएंगे। पार्टी ने अपने पक्ष में ‘रिवाज’ को सबसे बड़ा फैक्टर माना। दूसरे नंबर पर ‘पुरानी पेंशन’ का मुद्दा उठाया। हिमाचल प्रदेश को ‘कर्मचारी राज्य’ भी कहा जाता है। यहां हर चौथा व्यक्ति सरकारी नौकरी, निगम व दूसरे संस्थान में काम करता है। चुनाव में सरकारी कर्मियों की अहम भूमिका रहती है। कांग्रेस पार्टी ने इसका भरपूर फायदा उठाया। कांग्रेस ने सरकारी कर्मियों के लिए पुरानी पेंशन लागू करने का ऐलान कर दिया। 18 से 60 वर्ष की आयु की महिलाओं को हर माह 15 सौ रुपये देने और 300 यूनिट मुफ्त बिजली देने की घोषणा कर दी। चुनाव में सरकारी कर्मियों की नाराजगी और भाजपा के बागियों का फायदा उठाने में कांग्रेस सफल होती दिखाई दी। कांग्रेस पार्टी ने विकास के अलावा ‘कमीशन और क्रप्शन’ के मुद्दे को भी खूब भुनाया। 

राजस्थान और छत्तीसगढ़ का दिया उदाहरण

हिमाचल प्रदेश के शहरी इलाके, जैसे बिलासपुर, शिमला, सोलन, मंडी और धर्मशाला में सरकारी कर्मियों ने चुप्पी साध रखी थी। भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही दलों के नेताओं की रैलियां भीड़ के हिसाब से अच्छी जा रही थी। हालांकि जब सरकारी कर्मियों से बात की जाती तो वे बहुत कम शब्दों में, मगर ओपीएस की बात करते थे। इससे पता चलता है कि प्रदेश में यह बड़ा मुद्दा रहा है। सीएम जयराम ठाकुर, खुद को इस मुद्दे पर असहाय मानकर चल रहे थे। आंदोलन के बाद उन्होंने नाराज कर्मियों से मुलाकात की। उन्हें समझा बुझाकर, आंदोलन को बड़ा होने से रोक दिया। चुनाव में सरकारी कर्मियों का मुद्दा, एक गंभीर मसला था। एक अनौपचारिक बातचीत में उन्होंने माना था कि ये बड़ा मुद्दा है और इसमें वे कुछ नहीं कर सकते। केंद्र के अनुसार ही उन्हें चलना होगा। वे कर्मियों से इतना जरुर कहते थे कि जब कभी इस पर विचार होगा, तो वह डबल इंजन की सरकार में ज्यादा प्रभावी तरीके से हो सकेगा। दूसरी ओर, कांग्रेस पार्टी ने हिमाचल के सरकारी कर्मियों को बता दिया कि राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी पुरानी पेंशन लागू की गई है। हिमाचल में कांग्रेस सत्ता में आई तो यहां भी ओपीएस लागू होगा। 

ओपीएस बाबत मुख्यमंत्री कुछ नहीं कर सकते

चुनाव प्रचार के दौरान लोगों से जब जयराम ठाकुर के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि सीएम से उन्हें कोई नाराजगी नहीं है। लोगों ने उनकी छवि को अच्छा बताया था। उन्हें जमीन से जुड़ा नेता बताया। सरकारी कर्मियों को यह मालूम था कि ओपीएस बाबत मुख्यमंत्री कुछ नहीं कर सकते। सेब उत्पादकों की नाराजगी दूर करने के लिए जयराम ठाकुर ने पैकेजिंग पर बढ़ा छह प्रतिशत जीएसटी सरकार द्वारा वहन करने की बात कही। भले ही एग्जिट पोल में बेरोजगारी को बड़ा मुद्दा नहीं बताया गया है, लेकिन प्रदेश में  लगभग 9 लाख पंजीकृत बेरोजगार और 12 लाख गैर पंजीकृत बेरोजगार, एक मुद्दा रहा है। जयराम ठाकुर ने कहा था, कांग्रेस ने 2012 में हर परिवार एक सरकारी नौकरी देने की गारंटी दी थी। वह वादा कभी पूरा नहीं हुआ। भाजपा ने चुनाव से पहले गरीबों को 125 यूनिट मुफ्त बिजली देने की योजना शुरु की। कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में 300 यूनिट मुफ्त बिजली देने की बात कही है। 

केंद्रीय नेताओं को निराश नहीं किया 

बागवान का मुद्दा अहम रहा है। हिमाचल में करीब दो दर्जन विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां पर अधिकांश परिवारों के लिए सेब की खेती ही मुख्य रोजगार है। बागवानों ने जीएसटी को लेकर सचिवालय का घेराव, गिरफ्तारियां दी और धरना प्रदर्शन किया था। हिमाचल प्रदेश में एक बड़ी बात यह रही कि वहां पर बड़े नेताओं के दौरों से लोगों का मूड नहीं बदला। पीएम मोदी की रैलियों में भी खूब भीड़ जुटी तो वहीं प्रियंका गांधी को भी लोगों ने निराश नहीं किया। शिमला, मंडी और बिलासपुर में वोटरों का कहना था कि प्रदेश में किसी भी पार्टी के टॉप नेताओं से उन्हें ज्यारा सरोकार नहीं है। बात केवल मुद्दों की है, हिमाचल के लोग राजनीतिक रूप से जागरूक हैं। यहां नेताओं की रैलियों से चुनाव नहीं पलटता। सेब उत्पादक हों या सरकारी कर्मचारी, वे खुश नहीं हैं।

टॉप नेता के करियर पर दाग

भाजपा ने डबल इंजन की सरकार को लेकर, वोटरों को यह भरोसा दिलाया था कि इस बार रिवाज टूटता है तो प्रदेश को कई बड़ी सौगात मिलेंगी। प्रदेश में जेपी नड्डा को लेकर, खासतौर से बिलासपुर जैसे क्षेत्र में लोगों का यह कहना था कि वे जानते हैं कि हिमाचल में भाजपा की हार, इस पहाड़ी इलाके के टॉप नेता के करियर पर दाग लगा सकती है। वे ऐसा नहीं चाहते थे, लेकिन वे अपने कई मुद्दों पर समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे। ओपीएस भी इन्हीं मुद्दों में शामिल रहा है।



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