[ad_1]
ख़बर सुनें
विस्तार
भारत में शिक्षा हर किसी का मौलिक अधिकार है। शिक्षा आयु, जात-पात, धर्म, लिंग या अमीरी-गरीबी से परे है। लेकिन उसके बाद भी शिक्षा हर किसी को मिलना मुश्किल होता है। आजादी से पहले भले ही कुछ भारतीय विदेश तक पढ़ने गए लेकिन रूढ़िवादिता, कट्टरपंथी विचारधारा के लोग उस दौर में महिलाओं के लिए शिक्षा को फिजूल मानते थे। खासकर मुस्लिम महिलाओं को शिक्षा का अधिकार नहीं था। लेकिन उस दौर में उन्हीं में से एक महिला ने मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा का सपना देखा और इसे पूरा करने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया। आज हर जाति-धर्म से ताल्लुक रखने वाली बेटी शिक्षा का अधिकार रखती है लेकिन मुस्लिम महिलाओं के लिए शिक्षा का मार्ग खोलने में रुकैया सखावत हुसैन का विशेष योगदान रहा। चलिए जानते हैं रुकैया सखावत हुसैन के बारे में।
कौन थीं रुकैया सखावत हुसैन
रुकैया सखावत नारीवादी विचारक, कथाकार, उपन्यासकार और कवि थीं। उन्होंने बंगाल में मुसलमान लड़कियों की पढ़ाई के लिए मुहिम चलाई थी। इसके अलावा मुसलमान महिलाओं का संगठन गठित किया था। लड़कियों के लिए स्कूल खोले और अपने प्रयासों से मुस्लिम लड़कियों की जिंदगी में बदलाव लाया। महज मुस्लिम महिलाएं ही नहीं, रुकैया सखावत ने नारी जाति के सम्मान और हक के लिए काम किया।
रुकैया सखावत हुसैन का जीवन परिचय
नारीवादी विचारक रुकैया सखावत का जन्म गुलाम भारत में सन 1880 में हुआ था। विभाजन से पहले रंगपुर जिले के पैराबंद इलाके में रुकैया हुसैन का जन्म हुआ, जो वर्तमान में बांग्लादेश का इलाका है। जमींदार खानदान से ताल्लुक रखने वाली रुकैया के परिवार के लड़के यानी रुकैया के भाई स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई करते थे। लेकिन परिवार की लड़कियों को तालीम लेने का अधिकार नहीं था। हालांकि रुकैया पढ़ना चाहती थीं। उनके बड़े भाई रुकैया को चुपके चुपके पढ़ाया करते थे। जब रात में घर के सब लोग सो जाते तो बड़े भाई बहन को पढ़ाया करते।
रुकैया सखावत की शादी
बाद में रुकैया की शादी बिहार के भागलपुर के रहने वाले एक बड़ी उम्र के शख्स से हुई, जिनका नाम सखावत हुसैन था। उनके पति काफी पढ़े लिखे और पेशे से अफसर थे। इसलिए उन्होंने रुकैया को अपने विचार प्रकट करने, सोचने समझने का मौका दिया। हालांकि 1909 में पति की मौत के बाद रुकैया अकेली हो गईं।
रुकैया सखावत ऐसे बनी लेखक
[ad_2]
Source link