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Teachers Day 2022: मुसलमान लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूल शुरू करने वाली रुकैया सखावत के बारे में जानें

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Teachers Day 2022: मुसलमान लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूल शुरू करने वाली रुकैया सखावत के बारे में जानें

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भारत में शिक्षा हर किसी का मौलिक अधिकार है। शिक्षा आयु, जात-पात, धर्म, लिंग या अमीरी-गरीबी से परे है। लेकिन उसके बाद भी शिक्षा हर किसी को मिलना मुश्किल होता है। आजादी से पहले भले ही कुछ भारतीय विदेश तक पढ़ने गए लेकिन रूढ़िवादिता, कट्टरपंथी विचारधारा के लोग उस दौर में महिलाओं के लिए शिक्षा को फिजूल मानते थे। खासकर मुस्लिम महिलाओं को शिक्षा का अधिकार नहीं था। लेकिन उस दौर में उन्हीं में से एक महिला ने मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा का सपना देखा और इसे पूरा करने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया। आज हर जाति-धर्म से ताल्लुक रखने वाली बेटी शिक्षा का अधिकार रखती है लेकिन मुस्लिम महिलाओं के लिए शिक्षा का मार्ग खोलने में रुकैया सखावत हुसैन का विशेष योगदान रहा। चलिए जानते हैं रुकैया सखावत हुसैन के बारे में।

कौन थीं रुकैया सखावत हुसैन

रुकैया सखावत नारीवादी विचारक, कथाकार, उपन्यासकार और कवि थीं। उन्होंने बंगाल में मुसलमान लड़कियों की पढ़ाई के लिए मुहिम चलाई थी। इसके अलावा मुसलमान महिलाओं का संगठन गठित किया था। लड़कियों के लिए स्कूल खोले और अपने प्रयासों से मुस्लिम लड़कियों की जिंदगी में बदलाव लाया। महज मुस्लिम महिलाएं ही नहीं, रुकैया सखावत ने नारी जाति के सम्मान और हक के लिए काम किया।

रुकैया सखावत हुसैन का जीवन परिचय

नारीवादी विचारक रुकैया सखावत का जन्म गुलाम भारत में सन 1880 में हुआ था। विभाजन से पहले रंगपुर जिले के पैराबंद इलाके में रुकैया हुसैन का जन्म हुआ, जो वर्तमान में बांग्लादेश का इलाका है। जमींदार खानदान से ताल्लुक रखने वाली रुकैया के परिवार के लड़के यानी रुकैया के भाई स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई करते थे। लेकिन परिवार की लड़कियों को तालीम लेने का अधिकार नहीं था। हालांकि रुकैया पढ़ना चाहती थीं। उनके बड़े भाई रुकैया को चुपके चुपके पढ़ाया करते थे। जब रात में घर के सब लोग सो जाते तो बड़े भाई बहन को पढ़ाया करते।

रुकैया सखावत की शादी 

बाद में रुकैया की शादी बिहार के भागलपुर के रहने वाले एक बड़ी उम्र के शख्स से हुई, जिनका नाम सखावत हुसैन था। उनके पति काफी पढ़े लिखे और पेशे से अफसर थे। इसलिए उन्होंने रुकैया को अपने विचार प्रकट करने, सोचने समझने का मौका दिया। हालांकि 1909 में पति की मौत के बाद रुकैया अकेली हो गईं।

रुकैया सखावत ऐसे बनी लेखक

पति सखावत के होते हुए रुकैया को बंगला साहित्य में नाम कमाने का मौका मिल गया था। वह एक लेखक के तौर अपनी रचनाओं के जरिए महिलाएं की बदतर स्थिति पर लिखने लगी थीं। रुकैया का महज 22-23 साल की उम्र में एक लेख प्रकाशित हुआ, ‘स्त्री जातिर अबोनति’, जिस पर बहुत हंगामा हुआ। इस लेख में महिलाओं की गिरी हुई स्थिति के बारे में लिखा गया था। इसके बाद अंग्रेजी में उनका लघु उपन्यास, ‘सुल्तानाज ड्रीम्स’ (सुल्ताना के ख्वाब) प्रकाशित हुई। ये उपन्यास मद्रास की एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी पत्रिका ‘इंडियन लेडीज मैगजीन’ में 1905 में छपा था।

लड़कियों के लिए रुकैया ने खोले स्कूल

महिलाओं की स्थिति को सुधारने के लिए उन्होंने लड़कियों की शिक्षा का सपना देखा था। 1910 में रुकैया सखावत ने भागलपुर में लड़कियों स्कूल खोला और 1911 में कोलकाता में स्कूल की शुरुआत की। बंगाल में मुसलमान लड़कियों की शिक्षा के लिए ये दोनों स्कूल वरदान साबित हुए। रुकैया द्वारा स्थापित सखावत मेमोरियल गवर्नमेंट गर्ल्स हाई स्कूल आज भी कोलकाता में चलता है। हालांकि उस दौर में इस स्कूल को चलाने के लिए रुकैया को काफी विरोध का सामना करना पड़ा। 52 साल की उम्र में 9 दिसंबर 1932 को कोलकाता में रुकैया सखावत का निधन हो गया।

विस्तार

भारत में शिक्षा हर किसी का मौलिक अधिकार है। शिक्षा आयु, जात-पात, धर्म, लिंग या अमीरी-गरीबी से परे है। लेकिन उसके बाद भी शिक्षा हर किसी को मिलना मुश्किल होता है। आजादी से पहले भले ही कुछ भारतीय विदेश तक पढ़ने गए लेकिन रूढ़िवादिता, कट्टरपंथी विचारधारा के लोग उस दौर में महिलाओं के लिए शिक्षा को फिजूल मानते थे। खासकर मुस्लिम महिलाओं को शिक्षा का अधिकार नहीं था। लेकिन उस दौर में उन्हीं में से एक महिला ने मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा का सपना देखा और इसे पूरा करने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया। आज हर जाति-धर्म से ताल्लुक रखने वाली बेटी शिक्षा का अधिकार रखती है लेकिन मुस्लिम महिलाओं के लिए शिक्षा का मार्ग खोलने में रुकैया सखावत हुसैन का विशेष योगदान रहा। चलिए जानते हैं रुकैया सखावत हुसैन के बारे में।

कौन थीं रुकैया सखावत हुसैन

रुकैया सखावत नारीवादी विचारक, कथाकार, उपन्यासकार और कवि थीं। उन्होंने बंगाल में मुसलमान लड़कियों की पढ़ाई के लिए मुहिम चलाई थी। इसके अलावा मुसलमान महिलाओं का संगठन गठित किया था। लड़कियों के लिए स्कूल खोले और अपने प्रयासों से मुस्लिम लड़कियों की जिंदगी में बदलाव लाया। महज मुस्लिम महिलाएं ही नहीं, रुकैया सखावत ने नारी जाति के सम्मान और हक के लिए काम किया।

रुकैया सखावत हुसैन का जीवन परिचय

नारीवादी विचारक रुकैया सखावत का जन्म गुलाम भारत में सन 1880 में हुआ था। विभाजन से पहले रंगपुर जिले के पैराबंद इलाके में रुकैया हुसैन का जन्म हुआ, जो वर्तमान में बांग्लादेश का इलाका है। जमींदार खानदान से ताल्लुक रखने वाली रुकैया के परिवार के लड़के यानी रुकैया के भाई स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई करते थे। लेकिन परिवार की लड़कियों को तालीम लेने का अधिकार नहीं था। हालांकि रुकैया पढ़ना चाहती थीं। उनके बड़े भाई रुकैया को चुपके चुपके पढ़ाया करते थे। जब रात में घर के सब लोग सो जाते तो बड़े भाई बहन को पढ़ाया करते।

रुकैया सखावत की शादी 

बाद में रुकैया की शादी बिहार के भागलपुर के रहने वाले एक बड़ी उम्र के शख्स से हुई, जिनका नाम सखावत हुसैन था। उनके पति काफी पढ़े लिखे और पेशे से अफसर थे। इसलिए उन्होंने रुकैया को अपने विचार प्रकट करने, सोचने समझने का मौका दिया। हालांकि 1909 में पति की मौत के बाद रुकैया अकेली हो गईं।

रुकैया सखावत ऐसे बनी लेखक

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