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SCO Summit 2022: एससीओ के जरिए क्या अमेरिकी प्रभाव का मुकाबला कर पाएंगे रूस और चीन?

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SCO Summit 2022: एससीओ के जरिए क्या अमेरिकी प्रभाव का मुकाबला कर पाएंगे रूस और चीन?

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उज्बेकिस्तान के समरकंद में हुए शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में चीन और रूस ने एक ऐसे ढांचा तैयार करने पर विचार किया है जिससे अमेरिका के वैश्विक प्रभाव का मुकाबला किया जा सके। शिखर सम्मेलन के बाद जारी घोषणापत्र में इस मंशा को ‘बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था’ का नाम दिया गया है। उज्बेकिस्तान के शहर समरकंद में हुए दो दिन के शिखर सम्मेलन के बाद जारी घोषणापत्र में एससीओ के सदस्य और सहयोगी देशों का राजनीति, अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और संस्कृति के क्षेत्रों में अधिक निकट सहयोग करने का आह्वान किया गया है।

घोषणापत्र में कहा गया है- ‘(एससीओ के) आठों सदस्य देश अंतरराष्ट्रीय कानून के दुनिया भर में स्वीकृत सिद्धांतों पर आधारित अधिक प्रातिनिधिक, लोकतांत्रिक, न्यायपूर्ण और बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था’ के निर्माण के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहराते हैँ। समरकंद बैठक में ईरान को नौवें सदस्य देश के रूप में एससीओ में शामिल किया गया।

जिनपिंग और पुतिन की वार्ता पर थी सबकी नजर
समरकंद में इकट्ठा हुए नेताओं की नजर सबसे ज्यादा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन के बीच हुई वार्ता रही। इसमें दोनों देशों ने खुद को ‘उथल-पुथल भरी दुनिया’ में स्थिरता लाने वाली बड़ी ताकत बताया। उधर शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए शी ने कलर रिवोल्यूशन के जरिए देशों में आंतरिक दखल देने वाली विदेशी ताकतों को रोकने के लिए आपसी सहयोग की जरूरत बताई। कलर रिवोल्यूशन से मतलब आम तौर पर पूर्व सोवियत गणराज्यों में सत्ता बदलने की गतिविधियों को कथित पश्चिमी मदद से समझा जाता है।

वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम ने अपने एक विश्लेषण में कहा है कि रूस और चीन की राय में एशिया के उदय और यूक्रेन में युद्ध के कारण दुनिया अभी चौराहे पर पहुंच गई है। ऐसे में वे एससीओ को अपना अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बढ़ाने का एक औजार मान रहे हैं। लेकिन इस संगठन में शामिल देशों के अलग-अलग हित के कारण यह साफ नहीं है कि एससीओ उन दोनों के मकसदों को पूरा करने में सक्षम हो पाएगा।

यूक्रेन -रूस युद्ध के बाद इस समूह में मतभेद की थी आशंका
अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन की वेबसाइट पर छपे एक विश्लेषण में कहा गया है कि चीन और रूस एससीओ शिखर सम्मेलन को बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था के निर्माण का मंच बना सकते थे, लेकिन यूक्रेन पर रूस के हमले ने इस समूह के भीतर मतभेद पैदा कर दिए हैं। इस घटना से पूर्व सोवियत गणराज्यों और मध्य एशियाई देशों में यह अंदेशा पैदा हुआ है कि रूस उनकी भी जमीन हड़प सकता है। खासकर कजाखस्तान ने रूस की इच्छा के मुताबिक चलने से इनकार कर दिया है। वह यूक्रेन को मानवीय मदद भी भेज चुका है। उधर रूस की निंदा करने से चीन के इनकार के कारण मध्य एशियाई देशों में चीन के प्रति बेचैनी बढ़ी है।

वैसे समरकंद में शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए कुल 18 देशों के प्रतिनिधि आए। इनमें एससीओ के सदस्य देश- रूस, चीन, भारत, पाकिस्तान, कजाखस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिजिस्तान, और ताजिकिस्तान शामिल हैँ। ईरान को यहां पूर्ण सदस्यता देने का फैसला हुआ। इन देशों के अलावा बेलारुस, अफगानिस्तान, और मंगोलिया ने पर्यवेक्षक की हैसियत से भाग लिया। जबकि अजरबैजान, अर्मीनिया, कंबोडिया, नेपाल, टर्की और श्रीलंका ने डायलॉग पार्टनर की हैसियत से अपने प्रतिनिधि यहां भेजे। 

विस्तार

उज्बेकिस्तान के समरकंद में हुए शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर सम्मेलन में चीन और रूस ने एक ऐसे ढांचा तैयार करने पर विचार किया है जिससे अमेरिका के वैश्विक प्रभाव का मुकाबला किया जा सके। शिखर सम्मेलन के बाद जारी घोषणापत्र में इस मंशा को ‘बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था’ का नाम दिया गया है। उज्बेकिस्तान के शहर समरकंद में हुए दो दिन के शिखर सम्मेलन के बाद जारी घोषणापत्र में एससीओ के सदस्य और सहयोगी देशों का राजनीति, अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा और संस्कृति के क्षेत्रों में अधिक निकट सहयोग करने का आह्वान किया गया है।

घोषणापत्र में कहा गया है- ‘(एससीओ के) आठों सदस्य देश अंतरराष्ट्रीय कानून के दुनिया भर में स्वीकृत सिद्धांतों पर आधारित अधिक प्रातिनिधिक, लोकतांत्रिक, न्यायपूर्ण और बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था’ के निर्माण के प्रति अपनी वचनबद्धता दोहराते हैँ। समरकंद बैठक में ईरान को नौवें सदस्य देश के रूप में एससीओ में शामिल किया गया।

जिनपिंग और पुतिन की वार्ता पर थी सबकी नजर

समरकंद में इकट्ठा हुए नेताओं की नजर सबसे ज्यादा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन के बीच हुई वार्ता रही। इसमें दोनों देशों ने खुद को ‘उथल-पुथल भरी दुनिया’ में स्थिरता लाने वाली बड़ी ताकत बताया। उधर शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए शी ने कलर रिवोल्यूशन के जरिए देशों में आंतरिक दखल देने वाली विदेशी ताकतों को रोकने के लिए आपसी सहयोग की जरूरत बताई। कलर रिवोल्यूशन से मतलब आम तौर पर पूर्व सोवियत गणराज्यों में सत्ता बदलने की गतिविधियों को कथित पश्चिमी मदद से समझा जाता है।

वेबसाइट निक्कईएशिया.कॉम ने अपने एक विश्लेषण में कहा है कि रूस और चीन की राय में एशिया के उदय और यूक्रेन में युद्ध के कारण दुनिया अभी चौराहे पर पहुंच गई है। ऐसे में वे एससीओ को अपना अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बढ़ाने का एक औजार मान रहे हैं। लेकिन इस संगठन में शामिल देशों के अलग-अलग हित के कारण यह साफ नहीं है कि एससीओ उन दोनों के मकसदों को पूरा करने में सक्षम हो पाएगा।

यूक्रेन -रूस युद्ध के बाद इस समूह में मतभेद की थी आशंका

अमेरिकी टीवी चैनल सीएनएन की वेबसाइट पर छपे एक विश्लेषण में कहा गया है कि चीन और रूस एससीओ शिखर सम्मेलन को बहुपक्षीय विश्व व्यवस्था के निर्माण का मंच बना सकते थे, लेकिन यूक्रेन पर रूस के हमले ने इस समूह के भीतर मतभेद पैदा कर दिए हैं। इस घटना से पूर्व सोवियत गणराज्यों और मध्य एशियाई देशों में यह अंदेशा पैदा हुआ है कि रूस उनकी भी जमीन हड़प सकता है। खासकर कजाखस्तान ने रूस की इच्छा के मुताबिक चलने से इनकार कर दिया है। वह यूक्रेन को मानवीय मदद भी भेज चुका है। उधर रूस की निंदा करने से चीन के इनकार के कारण मध्य एशियाई देशों में चीन के प्रति बेचैनी बढ़ी है।

वैसे समरकंद में शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए कुल 18 देशों के प्रतिनिधि आए। इनमें एससीओ के सदस्य देश- रूस, चीन, भारत, पाकिस्तान, कजाखस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिजिस्तान, और ताजिकिस्तान शामिल हैँ। ईरान को यहां पूर्ण सदस्यता देने का फैसला हुआ। इन देशों के अलावा बेलारुस, अफगानिस्तान, और मंगोलिया ने पर्यवेक्षक की हैसियत से भाग लिया। जबकि अजरबैजान, अर्मीनिया, कंबोडिया, नेपाल, टर्की और श्रीलंका ने डायलॉग पार्टनर की हैसियत से अपने प्रतिनिधि यहां भेजे। 

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