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रूस से तेल आयात।
– फोटो : Amar Ujala
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रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध को सात महीने से ज्यादा हो चुके हैं। दोनों ही देशों के बीच जंग लगातार बढ़ती जा रही है। खासकर रूस की ओर से यूक्रेन के चार क्षेत्रों के अधिग्रहण के एलान के बाद से। इस बीच रूस ने अपने रिजर्व सैनिकों को भी युद्ध के मैदान में उतारने का फैसला किया है। सेना में अनुभव रखने वाले या सैन्य ट्रेनिंग पाए जिन लोगों की भर्ती की जा रही है, उनमें से अधिकतर इस वक्त आम लोगों की तरह नौकरियां कर रहे हैं। इनमें दुकान चलाने वालों से लेकर बड़ी-बड़ी कंपनियों में काम करने वाले लोग तक शामिल हैं। खास बात यह है कि सेना में जिनकी भर्ती की जा रही है, उनमें देश की अर्थव्यवस्था के लिए सबसे अहम ऑयल-गैस सेक्टर से जुड़े कर्मचारी मुख्य रूप से शामिल हैं।
ऐसे में रूस की रिजर्व सैन्य भर्ती को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। खास तौर पर तेल कंपनियों के कर्मचारियों की भर्ती को लेकर। क्योंकि रूस के राजस्व में एक बड़ा हिस्सा इन्हीं तेल कंपनियों द्वारा किए जा रहे निर्यात की वजह से आ रहा है। इसके अलावा ओपेक देशों की तरफ से कच्चे तेल के दामों में लगातार होती बढ़ोतरी के बीच कई देश तेल सप्लाई के लिए रूस पर जबरदस्त तौर पर निर्भर हैं। इनमें एक नाम भारत का भी है। यानी एक चिंता यह भी है कि रूसी तेल कंपनियों में कर्मचारियों की कमी का दुनियाभर में तेल सप्लाई पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
यूक्रेन से युद्ध के बीच रूस को तेल कंपनियों के कर्मियों को भर्ती करने की जरूरत क्यों पड़ रही है? इससे रूस के राजस्व पर क्या असर पड़ेगा? बाकी दुनिया पर रूस के इस कदम के क्या प्रभाव होंगे? इसके अलावा भारत पर इस फैसले का क्या असर होगा? आइये जानते हैं…
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