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Rajendra Gautam controversy: दलित चिंतक बोले- बुद्ध-बाबा साहेब के बहाने देवी-देवताओं का अपमान स्वीकार नहीं

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Rajendra Gautam controversy: दलित चिंतक बोले- बुद्ध-बाबा साहेब के बहाने देवी-देवताओं का अपमान स्वीकार नहीं

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AAP leader Rajendra Gautam

AAP leader Rajendra Gautam
– फोटो : Agency (File Photo)

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हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने के आरोपों में घिरे अरविंद केजरीवाल के कैबिनेट मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। लेकिन इसके बाद भी केजरीवाल सरकार की मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। भाजपा अब भी गौतम पर कठोर कार्रवाई करने की मांग कर रही है और उन्हें हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने वाला और हिंदू विरोधी बता रही है। वहीं, राजनीति से इतर दलित चिंतकों का मानना है कि भगवान बुद्ध और संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर किसी को हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने की छूट नहीं दी जा सकती। इस मामले में स्वयं भगवान बुद्ध और आंबेडकर के विचार ही रोशनी दिखाते हैं और इसके लिए किसी दूसरे प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।

बाबा साहेब ने दोहराई थीं ये प्रतिज्ञाएं

इतिहासकार बताते हैं कि वैदिक धर्म की सर्वश्रेष्ठ सत्ता के दौर में बौद्ध धर्म का प्रादुर्भाव हुआ और इस दौर में बौद्ध धर्मानुयायियों के साथ भयंकर अत्याचार हुआ। लेकिन यह एक तथ्य यह भी है कि कुछ ही समय के पश्चात वैदिक धर्मावलम्बियों ने बुद्ध को सनातन धर्म के प्रमुख देवता विष्णु के 24 अवतारों में से एक मान लिया और उन्हें भगवान कहकर सम्मान दिया। इससे बौद्ध धर्म आम लोगों के बीच तेजी से प्रचलित हुआ और वह भारत का प्रमुख धर्म बन गया। चूंकि, बौद्ध धर्म भी सनातन धर्म की संस्कृति के बीच ही पनपा था, इसमें दया, करुणा और प्रेम की वही मूल बातें विद्यमान थीं जो सनातन धर्म में थीं, हिन्दुओं को इसे अपनाने में कोई संकोच नहीं हुआ।

केजरीवाल के मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने जिन 22 प्रतिज्ञाओं को दुहराया, ये वही प्रतिज्ञाएं हैं जिन्हें स्वयं आंबेडकर ने बौद्ध धर्म की दीक्षा लेते समय दोहराया था। ऐसे में क्या आंबेडकर की दीक्षाओं को दोहराना गलत हो गया? बड़ा प्रश्न यह भी है कि आंबेडकर को बार-बार अपना आदर्श बताने वाली भाजपा क्या उनकी प्रतिज्ञाओं को ही गलत ठहरा सकती है? पीएम नरेंद्र मोदी सरकार में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री रहे थावरचंद गहलोत ने अपने कार्यकाल के दौरान स्वयं ही आंबेडकर की इन्हीं प्रतिज्ञाओं को लिपिबद्ध कराने का काम किया था। ऐसे में भाजपा आंबेडकर की उन्हीं प्रतिज्ञाओं को दुहराने के आधार पर किसी को गलत कैसे ठहरा सकती है?

आंबेडकर की बात आदर्श

रविदास विश्व महापीठ के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष दुष्यंत कुमार गौतम ने अमर उजाला से कहा कि हमें यह समझना चाहिए कि आंबेडकर किस चीज के खिलाफ थे और किस समस्या से दलितों को छुटकारा दिलाना चाहते थे? उन्होंने कहा कि आंबेडकर हिंदू धर्म के खिलाफ नहीं थे, वे इस धर्म में व्याप्त छुआछूत के खिलाफ थे। आज जब संपूर्ण हिंदू समुदाय आगे बढ़कर दलितों को अपनाना चाहता है, उन्हें आगे बढ़कर गले लगाना चाहता है, उनके साथ उठाना-बैठना, खाना-पीना और सम्मान के साथ सामजिक संबंध स्थापित करना चाहता है तब छुआछुत की पुरानी सोच के आधार पर हिंदू समाज को गाली देने को कैसे सही ठहराया जा सकता है?

दुष्यंत कुमार गौतम ने कहा कि जब आंबेडकर हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्मं अपना रहे थे, तब मुस्लिम और ईसाई धर्म के लोग चाहते थे कि वे उनका धर्म अपना लें। लेकिन उन्होंने इससे स्पष्ट इनकार किया और कहा कि बौद्ध धर्म भारत की भूमि से निकला है और इसमें वह मूल तत्त्व विद्यमान है, जो इस मिटटी के व्यक्ति के मूलस्वभाव से मेल खाती है और इसलिए यही धर्म यहां के लोगों को मुफीद लगता है। उन्होंने मुस्लिम धर्म की कठोर आलोचना की और कहा कि “जब मुसलमान भाईचारे की बात करते हैं तो उनका अर्थ केवल मुसलमानों का मुसलमानों से भाईचारे से है। उनके भाईचारे के बीच दूसरे धर्म के लोगों के लिए कोई जगह नहीं है।”

उन्होंने कहा कि आज जो लोग आंबेडकर की इन प्रतिज्ञाओं के आधार पर हिंदुओं को गाली देना चाहते हैं, उनकी आलोचना करना चाहते हैं, क्या वे उन्हीं अंबेडकर की बातों के आधार पर इस्लाम या मुसलमानों की आलोचना कर सकेंगे? उन्होंने कहा कि यह द्वैध स्वीकार्य नहीं है। बौद्ध धर्म आज दुनिया के 50 से ज्यादा देशों में विद्यमान है, लेकिन कहीं भी इसके आधार पर किसी दूसरे धर्म को मानने वाले लोगों को गाली नहीं दी जा सकती तो इसकी छुट हमारे देश में क्यों होनी चाहिए?

आंबेडकर की कुछ बातें उनके समय की परिस्थितियों के अनुसार कही गई हो सकती हैं, लेकिन हमें उनके इस विचार के मूल को पकड़ना चाहिए कि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कभी देवी-देवताओं का अपमान करने वाली बातें नहीं कहीं और इसलिए उनके कुछ बयानों के आधार पर किसी को देवी-देवताओं का अपमान करने की छुट नहीं दी जा सकती।

धर्म या संविधान, कोई नहीं देता किसी के अपमान की अनुमति

केंद्र सरकार में मंत्री साध्वी निरंजना ज्योति ने अमर उजाला से कहा कि बौद्ध धर्म सनातन परंपरा का ही धर्म है, और दोनों के मूल तत्त्वों में कोई भेद नहीं है। सनातन धर्म भगवान बुद्ध को विष्णु का अवतार स्वीकार करता है। यही कारण है कि दोनों धर्मों को मानने वालों में पारस्परिक कोई विरोध नहीं है और दोनों समुदाय एक दूसरे का सम्मान करते हैं। उन्होंने कहा कि आर्य समाज के लोग उन्हें अवतारी पुरुष भले न मानें, लेकिन वे उन्हें युग पुरुष के रूप में स्वीकार करते हैं। ऐसे में किसी धर्म के नाम पर हिन्दू देवी देवताओं के अपमान करने की छूट नहीं दी जा सकती।   

उन्होंने कहा कि राजेंद्र पाल गौतम ने जिस आंबेडकर के नाम पर हिंदू-देवताओं को अपमानित करने का काम किया, उन्हीं बाबा साहब अंबेडकर के संविधान के आधार पर वे एक संवैधानिक पद पर थे और इस पद की मर्यादा के अनुसार उन्हें किसी धर्म को नीचा दिखाने की छूट नहीं मिल सकती। जिस आंबेडकर की पत्नी ब्राह्मण थीं और उन्हें पढ़ाने वाला और जिंदगी में आगे बढ़ाने वाला एक ब्राह्मण था, वे उसी के विरुद्ध इस प्रकार की बात कैसे कह सकते हैं।  

हिंदुओं-बौद्धों में आपसी मतभेद नहीं

भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के महामंत्री संजय निर्मल ने कहा कि आज हिंदू धर्म के अनुयायी बौद्ध विहारों में और बौद्ध धर्म को मानने वाले हिन्दू देवी-देवताओं के मंदिरों में जाते हैं। हिंदुओं के घरों में भगवान बुद्ध की प्रतिमा सम्मान के साथ रखी जाती है। यह दिखाता है कि सामान्य लोगों की समझ में हिंदू धर्म और भगवान बुद्ध में कोई भेद नहीं है। ऐसे में केवल बौद्ध होने के आधार पर किसी को दूसरे धर्म-समुदाय के लोगों के आराध्यों के प्रति गलत शब्द कहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

उन्होंने कहा कि भारत भूमि में भगवान बुद्ध का कितना सम्मान है, इसे इस ढंग से समझा जाना चाहिए कि संसद भवन से लेकर राष्ट्रपति भवन तक, हर स्थान पर भगवान की प्रतिमाएं-चित्र अंकित किए गए हैं। ऐसे में उन्हीं भगवान बुद्ध के नाम पर इस देश के बहुसंख्यक हिंदुओं के आराध्य देवी-देवताओं के अपमान को सही नहीं ठहराया जा सकता।

विस्तार

हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने के आरोपों में घिरे अरविंद केजरीवाल के कैबिनेट मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। लेकिन इसके बाद भी केजरीवाल सरकार की मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। भाजपा अब भी गौतम पर कठोर कार्रवाई करने की मांग कर रही है और उन्हें हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने वाला और हिंदू विरोधी बता रही है। वहीं, राजनीति से इतर दलित चिंतकों का मानना है कि भगवान बुद्ध और संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर के नाम पर किसी को हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने की छूट नहीं दी जा सकती। इस मामले में स्वयं भगवान बुद्ध और आंबेडकर के विचार ही रोशनी दिखाते हैं और इसके लिए किसी दूसरे प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।

बाबा साहेब ने दोहराई थीं ये प्रतिज्ञाएं

इतिहासकार बताते हैं कि वैदिक धर्म की सर्वश्रेष्ठ सत्ता के दौर में बौद्ध धर्म का प्रादुर्भाव हुआ और इस दौर में बौद्ध धर्मानुयायियों के साथ भयंकर अत्याचार हुआ। लेकिन यह एक तथ्य यह भी है कि कुछ ही समय के पश्चात वैदिक धर्मावलम्बियों ने बुद्ध को सनातन धर्म के प्रमुख देवता विष्णु के 24 अवतारों में से एक मान लिया और उन्हें भगवान कहकर सम्मान दिया। इससे बौद्ध धर्म आम लोगों के बीच तेजी से प्रचलित हुआ और वह भारत का प्रमुख धर्म बन गया। चूंकि, बौद्ध धर्म भी सनातन धर्म की संस्कृति के बीच ही पनपा था, इसमें दया, करुणा और प्रेम की वही मूल बातें विद्यमान थीं जो सनातन धर्म में थीं, हिन्दुओं को इसे अपनाने में कोई संकोच नहीं हुआ।

केजरीवाल के मंत्री राजेंद्र पाल गौतम ने जिन 22 प्रतिज्ञाओं को दुहराया, ये वही प्रतिज्ञाएं हैं जिन्हें स्वयं आंबेडकर ने बौद्ध धर्म की दीक्षा लेते समय दोहराया था। ऐसे में क्या आंबेडकर की दीक्षाओं को दोहराना गलत हो गया? बड़ा प्रश्न यह भी है कि आंबेडकर को बार-बार अपना आदर्श बताने वाली भाजपा क्या उनकी प्रतिज्ञाओं को ही गलत ठहरा सकती है? पीएम नरेंद्र मोदी सरकार में सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री रहे थावरचंद गहलोत ने अपने कार्यकाल के दौरान स्वयं ही आंबेडकर की इन्हीं प्रतिज्ञाओं को लिपिबद्ध कराने का काम किया था। ऐसे में भाजपा आंबेडकर की उन्हीं प्रतिज्ञाओं को दुहराने के आधार पर किसी को गलत कैसे ठहरा सकती है?

आंबेडकर की बात आदर्श

रविदास विश्व महापीठ के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष दुष्यंत कुमार गौतम ने अमर उजाला से कहा कि हमें यह समझना चाहिए कि आंबेडकर किस चीज के खिलाफ थे और किस समस्या से दलितों को छुटकारा दिलाना चाहते थे? उन्होंने कहा कि आंबेडकर हिंदू धर्म के खिलाफ नहीं थे, वे इस धर्म में व्याप्त छुआछूत के खिलाफ थे। आज जब संपूर्ण हिंदू समुदाय आगे बढ़कर दलितों को अपनाना चाहता है, उन्हें आगे बढ़कर गले लगाना चाहता है, उनके साथ उठाना-बैठना, खाना-पीना और सम्मान के साथ सामजिक संबंध स्थापित करना चाहता है तब छुआछुत की पुरानी सोच के आधार पर हिंदू समाज को गाली देने को कैसे सही ठहराया जा सकता है?

दुष्यंत कुमार गौतम ने कहा कि जब आंबेडकर हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्मं अपना रहे थे, तब मुस्लिम और ईसाई धर्म के लोग चाहते थे कि वे उनका धर्म अपना लें। लेकिन उन्होंने इससे स्पष्ट इनकार किया और कहा कि बौद्ध धर्म भारत की भूमि से निकला है और इसमें वह मूल तत्त्व विद्यमान है, जो इस मिटटी के व्यक्ति के मूलस्वभाव से मेल खाती है और इसलिए यही धर्म यहां के लोगों को मुफीद लगता है। उन्होंने मुस्लिम धर्म की कठोर आलोचना की और कहा कि “जब मुसलमान भाईचारे की बात करते हैं तो उनका अर्थ केवल मुसलमानों का मुसलमानों से भाईचारे से है। उनके भाईचारे के बीच दूसरे धर्म के लोगों के लिए कोई जगह नहीं है।”

उन्होंने कहा कि आज जो लोग आंबेडकर की इन प्रतिज्ञाओं के आधार पर हिंदुओं को गाली देना चाहते हैं, उनकी आलोचना करना चाहते हैं, क्या वे उन्हीं अंबेडकर की बातों के आधार पर इस्लाम या मुसलमानों की आलोचना कर सकेंगे? उन्होंने कहा कि यह द्वैध स्वीकार्य नहीं है। बौद्ध धर्म आज दुनिया के 50 से ज्यादा देशों में विद्यमान है, लेकिन कहीं भी इसके आधार पर किसी दूसरे धर्म को मानने वाले लोगों को गाली नहीं दी जा सकती तो इसकी छुट हमारे देश में क्यों होनी चाहिए?

आंबेडकर की कुछ बातें उनके समय की परिस्थितियों के अनुसार कही गई हो सकती हैं, लेकिन हमें उनके इस विचार के मूल को पकड़ना चाहिए कि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कभी देवी-देवताओं का अपमान करने वाली बातें नहीं कहीं और इसलिए उनके कुछ बयानों के आधार पर किसी को देवी-देवताओं का अपमान करने की छुट नहीं दी जा सकती।

धर्म या संविधान, कोई नहीं देता किसी के अपमान की अनुमति

केंद्र सरकार में मंत्री साध्वी निरंजना ज्योति ने अमर उजाला से कहा कि बौद्ध धर्म सनातन परंपरा का ही धर्म है, और दोनों के मूल तत्त्वों में कोई भेद नहीं है। सनातन धर्म भगवान बुद्ध को विष्णु का अवतार स्वीकार करता है। यही कारण है कि दोनों धर्मों को मानने वालों में पारस्परिक कोई विरोध नहीं है और दोनों समुदाय एक दूसरे का सम्मान करते हैं। उन्होंने कहा कि आर्य समाज के लोग उन्हें अवतारी पुरुष भले न मानें, लेकिन वे उन्हें युग पुरुष के रूप में स्वीकार करते हैं। ऐसे में किसी धर्म के नाम पर हिन्दू देवी देवताओं के अपमान करने की छूट नहीं दी जा सकती।   

उन्होंने कहा कि राजेंद्र पाल गौतम ने जिस आंबेडकर के नाम पर हिंदू-देवताओं को अपमानित करने का काम किया, उन्हीं बाबा साहब अंबेडकर के संविधान के आधार पर वे एक संवैधानिक पद पर थे और इस पद की मर्यादा के अनुसार उन्हें किसी धर्म को नीचा दिखाने की छूट नहीं मिल सकती। जिस आंबेडकर की पत्नी ब्राह्मण थीं और उन्हें पढ़ाने वाला और जिंदगी में आगे बढ़ाने वाला एक ब्राह्मण था, वे उसी के विरुद्ध इस प्रकार की बात कैसे कह सकते हैं।  

हिंदुओं-बौद्धों में आपसी मतभेद नहीं

भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के महामंत्री संजय निर्मल ने कहा कि आज हिंदू धर्म के अनुयायी बौद्ध विहारों में और बौद्ध धर्म को मानने वाले हिन्दू देवी-देवताओं के मंदिरों में जाते हैं। हिंदुओं के घरों में भगवान बुद्ध की प्रतिमा सम्मान के साथ रखी जाती है। यह दिखाता है कि सामान्य लोगों की समझ में हिंदू धर्म और भगवान बुद्ध में कोई भेद नहीं है। ऐसे में केवल बौद्ध होने के आधार पर किसी को दूसरे धर्म-समुदाय के लोगों के आराध्यों के प्रति गलत शब्द कहने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

उन्होंने कहा कि भारत भूमि में भगवान बुद्ध का कितना सम्मान है, इसे इस ढंग से समझा जाना चाहिए कि संसद भवन से लेकर राष्ट्रपति भवन तक, हर स्थान पर भगवान की प्रतिमाएं-चित्र अंकित किए गए हैं। ऐसे में उन्हीं भगवान बुद्ध के नाम पर इस देश के बहुसंख्यक हिंदुओं के आराध्य देवी-देवताओं के अपमान को सही नहीं ठहराया जा सकता।



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