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फिल्म ‘कुली’ का क्लाइमेक्स चल रहा है। लोग सांस बांधे परदे पर कहानी के खलनायक जफर को मुंबई की हाजी अली की दरगाह में एक हाथ में पिस्तौल और दूसरे हाथ में सलमा को दबोचे घुसने की कोशिश करते देख रहे हैं। इकबाल उसे रोकने की कोशिश करता है। जफर उसे गोली मार देता है। मां दरगाह के सामने हाथ फैलाकर दुआ मांगती है। हवा चलती है। दरगाह की चादर उड़कर इकबाल के बदन से लिपट जाती है। जफऱ को अब भी पिस्तौल में बाकी बची तीन गोलियों का गुमान है। इकबाल की ललकार है, ‘तो फिर चला गोली, तेरे हाथ में मौत का सामान है तो मेरे सीने पर खुदा का नाम है। देखते हैं ये चादर मुझे बचाती है या कफन बनकर मुझे कब्र तक पहुंचा देती है..!’ हर गोली पर वह अल्लाह को याद करता है। आखिरी गोली उसका सीना छलनी करती है तो उसके मुंह से आवाज निकलती है, ‘ला इलाहा इल्लल्लाह, मुहम्मदुर रसूलुल्लाह.. !’ यहां इकबाल हैं भारतीय सिनेमा के सबसे करिश्माई सितारे अमिताभ बच्चन और एक मुस्लिम किरदार में उनकी ये फिल्म हिंदी सिनेमा के इतिहास की ब्लॉकबस्टर फिल्मों में शामिल है। अमिताभ का हिंदी फिल्मों में मुस्लिम किरदारों से अपनी पहली फिल्म से नाता रहा है और ये नाता फिल्म ‘गुलाबो सिताबो’ तक बदस्तूर जारी रहा। एक नजर डालते हैं, अमिताभ के इन्हीं मुस्लिम किरदारों पर…
किरदार: अनवर अली
फिल्म: सात हिंदुस्तानी
अमिताभ बच्चन को अपनी पहली फिल्म में ही जो किरदार मिला था, उसका नाम था, अनवर अली। बिहार का युवा अनवर अली, जो अपनी रचनाओं से इंकलाबी है। देश के अलग अलग सूबों के पांच और युवा मिलकर गोवा पहुंचते हैं और वहां साथ देते हैं मारिया का जिसने गोवा से पुर्तगालियों को खदेड़ने का बीड़ा उठा रखा है। मलयालम फिल्मों की उन दिनों की प्रसिद्ध कलाकार मधु ने फिल्म में सुबोध सान्याल का किरदार किया था। एक इंटरव्यू में मधु ने बताया, ‘अमिताभ बच्चन ने कभी ये महसूस नहीं होने दिया कि ‘सात हिंदुस्तानी’ में वह पहली बार कैमरे का सामना कर रहे हैं। लोगों को उनके भीतर शुरू से एक अजीब आत्मविश्वास नजर आता था। उनकी आवाज लोगों को खूब पसंद आती थी और इसे एक सुर में ढालने के लिए वह अपने पिता हरिवंश राय बच्चन की कविताएं खूब पढ़ा करते थे।’
किरदार: मुतल्लिब
फिल्म: सौदागर
अमिताभ बच्चन की बतौर हीरो जो फिल्म ऑस्कर पुरस्कारों में देश की आधिकारिक प्रविष्टि बनकर पहुंची, उसका नाम था, ‘सौदागर’। इस फिल्म में भी अमिताभ बच्चन ने एक मुस्लिम किरदार किया है। उनके किरदार का फिल्म में नाम है मुतल्लिब उर्फ मोती। और, नूतन उनकी पत्नी मजूबी बनी हैं। फिल्म ‘सौदागर’ को राजश्री पिक्चर्स ने बनाया है और ये साल 1973 में रिलीज हुई। फिल्म ‘सौदागर’ के निर्देशक थे सुधेंदु रॉय और इस फिल्म में उनकी हीरोइन थीं नूतन। अमिताभ बच्चन की ये फिल्म हालांकि बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही लेकिन एक गुड़ बेचने वाले के किरदार में अमिताभ अपनी छाप छोड़ने में सफल जरूर रहे।
किरदार: अहमद रजा
फिल्म: ईमान धरम
और, इसके बाद अमिताभ बच्चन एक मुस्लिम किरदार में नजर आए निर्देशक देश मुखर्जी की फिल्म ‘ईमान धरम’ में। फिल्म में उनका किरदार अहमद रजा का है और अपने दोस्त मोहन सक्सेना के साथ वह अदालतों के आसपास चक्कर लगाता रहता है। दोनों मुकदमों में झूठी गवाही देने के एक्सपर्ट हैं। सलीम जावेद की लिखी इस फिल्म में रेखा भी हैं, संजीव कुमार भी और हेलन से लेकर प्रेम चोपड़ा, ओम शिवपुरी, श्रीराम लागू, सत्येन कप्पू से लेकर मैक मोहन व जगदीश राज जैसे सहायक कलाकारों की भरमार भी है। 1977 में रिलीज हुई इस फिल्म में अहमद रजा के किरदार में अमिताभ बच्चन ने लोगों का खूब मनोरंजन किया।
फिल्म: मुकद्दर का सिकंदर
लेकिन, अमिताभ बच्चन जिस फिल्म से सिनेमा के सिकंदर बने, उसी फिल्म ‘मुकद्दर का सिकंदर’ ने उन्हें एक मुस्लिम किरदार में पहली बार कामयाबी दिलाई। हालांकि 1978 में रिलीज हुई इस फिल्म में उनके किरदार की शुरुआत एक अनाथ बच्चे के रूप में होती है जिसे एक धन्ना सेठ के यहां काम करने वाली फातिमा अपना लेती है और नाम देती है सिकंदर। और, सिकंदर और जोहराबाई की प्रेम कहानी तो हर हिंदी फिल्म प्रेमी को पता ही है। फिल्म में राखी हैं, विनोद खन्ना हैं, अमजद खान हैं और रंजीत, कादर खान और गोगा कपूर जैसे कलाकार भी हैं, लेकिन फिल्म में सिकंदर का मोटरसाइकिल पर आना और गाना, ‘रोते हुए आते हैं सब, हंसता हुआ जो जाएगा..’ हिंदी सिनेमा के शानदार किरदारों की शान बन गया।
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