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सेना में हेलीकॉप्टर उड़ान के चार हजार घंटे से अधिक के अनुभव के साथ ही लेफ्टिनेंट कर्नल अनिल सिंह पिछले कुछ समय से निजी हेली एविएशन से भी जुड़े थे। इस यात्राकाल में वह आर्यन हेली एविएशन के साथ केदारनाथ यात्रा में हेलीकॉप्टर की उड़ान भर रहे थे।
बीते मंगलवार को भी वह हेलीकॉप्टर पर पहुंचे और 13 शटल की लेकिन 14वीं शटल पूरी नहीं हो पाईं और वह छह यात्रियों सहित स्वयं काल का ग्रास बन गए। वर्ष 2005 से 2019 तक केदारनाथ में हेलीकॉप्टर सेवा में अलग-अलग हेली कंपनियों के साथ जुड़े ग्राउंड फेस मैनेजर बृजमोहन बिष्ट ने बताया कि पायलट अनिल सिंह की यह इस सीजन की आर्यन कंपनी के साथ आखिरी उड़ान थी।
उन्हें हेलीकॉप्टर उड़ान से संबंधित एक परीक्षा में शामिल होने के लिए अमेरिका जाना था। मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था और यह उड़ान उनकी आखिरी ही हो गई। उन्होंने बताया कि सेना में विषम से विषम परिस्थितियों में भी वह सकुशल हेलीकॉप्टर उड़ा लेते थे।
हेलीकॉप्टर उड़ान का अंतिम निर्णय पायलट का होता है। इसी निर्णय को लेने में पायलट अनिल सिंह चूक गए। उनसे पहले तीन हेलीकॉप्टर केदारनाथ के गुप्तकाशी, फाटा के लिए उड़ान भर चुके थे। ऐसे में उन्होंने भी समझा की कोहरा आगे भी हल्का होगा और वह आसानी से निकल जाएंगे, लेकिन चूक यह हो गई कि शुरू से ही उन्होंने हेलीकॉप्टर को कम ऊंचाई पर रख दिया।
ऐसे में जैसे ही गरूड़चट्टी तक पहुंचे, वहां कोहरा छा गया। हेलीकॉप्टर सेवा से जुड़े बृजमोहन सिंह बिष्ट बताते हैं ऐसे में एक ही रास्ता था कि वह हेलीकॉप्टर को वापस केदारनाथ ले आते लेकिन यहां भी घना कोहरा छाने से दोनों तरफ के रास्ते बंद हो गए।
इसके बाद हेलीकॉप्टर अचानक पहाड़ी से टकरा गया। कहा कि हेलीकॉप्टर की टेक्निकल जांच के लिए तीन सदस्यीय टीम तैनात रहती है। इसलिए हेलीकॉप्टर में तकनीकी खामी का कोई सवाल नहीं उठता।
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