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आखिर क्या वजह रही कि अपनी ही पार्टी के भीतर बोरिस जॉनसन के बाद नेता चुनी गई लिज ट्रस पर से पार्टी का भरोसा इतनी जल्दी उठ गया?
– फोटो : Social Media
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एक ज़माने में राजशाही की खिलाफत करने वाली और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़कर छात्र राजनीति में सक्रिय रहने वाली लिज ट्रस जब कंजर्वेटिव पार्टी में शामिल हुईं और अपनी राजनीतिक महात्वाकांक्षाओं की बदौलत प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचीं तो लगा था कि शायद ब्रिटेन की तस्वीर कुछ बदलेगी। लेकिन सत्ता संभालने के चंद दिनों बाद से ही जिस तरह उनकी उल्टी गिनती शुरु हो गई थी, उससे ब्रिटेन की सियासत में लगातार हलचल मची रही। महज 44 दिनों में जिस तरह लिज ट्रस ने इस्तीफे की घोषणा की उससे वहां की सबसे मजबूत कंजर्वेटिव पार्टी की भीतरी हालत का भी खुलासा होता है।
आखिर क्या वजह रही कि अपनी ही पार्टी के भीतर बोरिस जॉनसन के बाद नेता चुनी गई लिज ट्रस पर से पार्टी का भरोसा इतनी जल्दी उठ गया? आखिर क्यों 2019 में भारी बहुमत से एक बार फिर सत्ता पर काबिज होने वाली कंजर्वेटिव पार्टी के भीतरी अंतर्विरोध इस हद तक सामने आने लगे कि लिज ट्रस के अपने ही मंत्री उनका साथ छोड़ने लगे? मिनी बजट में लिए गए टैक्स कटौती के फैसले से उठे असंतोष के बाद इसे फटाफट वापस लेना पड़ा और वित्त मंत्री और गृह मंत्री तक को इस्तीफा देना पड़ा?
अब ये सवाल सतह पर तैर रहा है कि क्या भारतीय मूल के ऋषि सुनक लिज ट्रस के बाद ब्रिटेन की बागडोर संभालेंगे? क्या कंजर्वेटिव पार्टी उन्हें इस बार अपना नेता चुन लेगी? बोरिस जॉनसन के इस्तीफे के बाद से सुनक का नाम चर्चा में रहा है और वह सबसे मजबूत दावेदारों में रहे भी थे, लेकिन लिज ने उन्हें करीब 21 हजार वोटों से हराकर बाजी जीत ली थी।
दरअसल, युवावस्था में लिज ट्रस जिस राजशाही का विरोध करती थीं, उन्हीं महारानी ने उन्हें प्रधानमंत्री घोषित किया और इसके चंद ही दिनों बाद ब्रिटिश महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय ने दुनिया को अलविदा कह दिया। अब बेशक वहां प्रिंस चार्ल्स तृतीय ने राजशाही का ताज पहन लिया हो, लेकिन महारानी के बाद अब राजशाही का वह रूतबा ब्रिटेन में नजर नहीं आता। जाहिर है नया प्रधानमंत्री तय करने का फैसला कंजर्वेटिव पार्टी के सदस्यों को ही लेना है और उसपर परंपरागत तरीके से राजशाही की मुहर भर लगनी है।
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