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खैर, खरगे के अध्यक्ष बनने के बाद अब ये चर्चा शुरू हो गई है कि आखिर उनके सामने चुनौतियां कौन-कौन सी हैं? वह कांग्रेस पार्टी को कितना बदल पाएंगे? पार्टी के लिए क्या नया कर सकते हैं? आइए समझते हैं…
खरगे के सामने कौन सी चार चुनौतियां हैं?
इसे समझने के लिए हमने वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह से बात की। उन्होंने कहा, ‘खरगे ऐसे वक्त पार्टी के अध्यक्ष चुने गए हैं, जब कांग्रेस को नई ताकत की जरूरत है। कांग्रेस लगातार देशभर में चुनाव हार रही है। ऐसे में खरगे के सामने चुनौतियों का बड़ा अंबार लगा है।’ प्रमोद ने हमें खरगे के सामने की चार बड़ी चुनौतियों के बारे में बताया…
1. खुद से फैसला लेना : अभी कांग्रेस पर पूरी तरह से गांधी परिवार का राज है। भले ही गांधी परिवार के सदस्य पार्टी में किसी पद पर हों या न हों, लेकिन बगैर उनके कोई फैसला नहीं लिया जा सकता है। ये भी सही है कि कांग्रेस को गांधी परिवार से अलग रखकर बात भी नहीं किया जा सकता है। ऐसे समय में खरगे के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वह स्वतंत्र होकर पार्टी के लिए फैसला ले सकें, जिनमें गांधी परिवार का कोई दबाव न हो।
2. पार्टी में पड़ रही फूट को रोकना : राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत के बीच लड़ाई जारी है। अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर भी थरूर ने एक तरह से मोर्चा खोल रखा है। एक के बाद एक कई कांग्रेस के दिग्गज नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। महाराष्ट्र में भी कांग्रेस विधायकों के बीच नाराजगी है। ऐसी स्थिति में खरगे के सामने दूसरी बड़ी चुनौती पार्टी में लगातार पड़ रही फूट को रोकना है।
3. जनता को विश्वास दिलाना और नए लोगों को जोड़ना : कांग्रेस फिर से तभी चुनाव जीत सकती है, जब वह जनता को ये भरोसा दिला पाए कि उनके लिए यही पार्टी बेहतर है। इसके लिए कांग्रेस को नए लोगों को पार्टी से जोड़ना होगा। खरगे के लिए ये भी एक चुनौती ही है।
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