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श्रिया सरन दक्षिण भारत की उन बेहतरीन अभिनेत्रियों में शामिल हैं, जिनकी सुंदरता के चर्चे दुनिया जहान में होते रहते हैं। हिंदी सिनेमा से उनका रिश्ता लगातार बना रहा है और जब लोगों को पता चलता है कि बचपन के 15 साल उनके हरिद्वार में बीते हैं तो वे चौंक जाते हैं। श्रिया का हिंदी अखबारों से करीब का नाता रहा है। वह बताती हैं, ‘नानाजी मेरे रोज सुबह ‘अमर उजाला’ अखबार ही पढ़ते थे। हमें भी अखबार पढ़ने को कहा जाता था और मैं ये बात गर्व से कह सकती हूं कि मेरी बोलचाल की हिंदी को मजबूत करने में हिंदी अखबारों का बहुत बड़ा योगदान रहा है।’ श्रिया सरन से ‘अमर उजाला’ की एक एक्सक्लूसिव मुलाकात…
हिंदी सिनेमा के लिए हिंदी को कितना जरूरी समझती हैं आप?
हिंदी सिनेमा के लिए हिंदी बोलना बहुत ही जरूरी है। हमें घर में इसीलिए हिंदी अखबार पढ़ने की सलाह दी जाती थी ताकि बोलचाल की भाषा शुद्ध हो जाए। हमें ऊंची आवाज में बोल बोलकर पढ़ने की सलाह दी जाती थी ताकि उच्चारण सही हो। अभी देखकर बड़ा दुख होता है कि लोगों ने पढ़ना ही बंद कर दिया है। पंचतंत्र की कहानियां बचपन में मैंने बहुत पढ़ी हैं लेकिन अब पता नहीं कि वैसी किताबें मिलती भी हैं कि नहीं।
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आप हरिद्वार से हैं तो जाहिर है हिंदी अखबारों से आपका तो नाता रहा ही होगा?
हरिद्वार में हमारे घर में अखबार पढ़ना बहुत ही जरूरी होता था। जब मैं छोटी थी तो मेरा बोलने का तरीका ठीक नहीं था तो मुझे अखबार पढ़ने की सलाह दी जाती थी। हिंदी तो मैं बहुत ही खराब बोलती थी कभी-कभी तो हिंदी में फेल भी हो जाती थी। मेरी टीचर मुझे हिंदी अखबार पढ़ने की सलाह देती थी जिससे मेरा उच्चारण सही हो जाए, मेरे घर में हिंदी में ही बात करने की परंपरा थी। मेरे नाना ‘अमर उजाला’ अखबार ही पढ़ा करते थे और उनका यह मानना था कि अखबार में जो लिखा होता है वह 100 प्रतिशत सही होता है। मेरा मानना है कि हिंदी पढ़ेंगे और हिंदी में सोचेंगे तभी हिंदी सिनेमा को समझ पाएंगे।
मैं हरिद्वार काफी समय से गई नहीं। बचपन से लेकर 15 साल तक मैं हरिद्वार में ही थी और उसके बाद दिल्ली आ गई। हरिद्वार की जिंदगी बहुत ही अच्छी थी, साइकिल से स्कूल और लाइब्रेरी जाती थी। उस समय कुछ खाना-पीना होता था तो पड़ोस वाली आंटी से दोस्ती करके रखते थे ताकि कुछ खाने-पीने को मिल जाए क्योंकि उस समय उतने कैफे वगैरह नहीं थे जहां पर जाकर कुछ खा पी सके। यह उन दिनों की बात है जब हमारे यहां केबल तक नहीं आया था और हम सिर्फ दूरदर्शन देखा करते थे। उस समय ‘देख भाई देख’ सीरियल देखकर बहुत आनंद मिलता था। उन दिनों बहुत ही साधारण जिंदगी थी और जीने का एक अलग ही मजा था। कभी जंगल में घूमने चले गए कभी नदी किनारे घूमने चले गए। यह सब चीजें मुझे बहुत याद आती हैं।
इस फिल्म को लेकर मैं बहुत उत्साहित थी। सात साल से नंदिनी एक सच को दिल में छुपाए किस घुटन से जी रही है यह फिल्म में दिखाया गया है। यह एक ऐसी बात है जिसे आप किसी से कभी साझा नहीं सकते। इस दौरान उसके बच्चों पर क्या गुजरी होगी? सोचकर ही मन सिहर जाता है। मैंने नंदिनी के किरदार को फिर से जिया है। फिल्म की शूटिंग के पहले दिन हम चारों लोग बैठकर सुबह का नाश्ता कर रहे थे तभी मेरे मुंह से ‘दृश्यम’ के निर्देशक स्वर्गीय निशिकांत कामत का नाम निकल गया फिर याद आया अरे इस फिल्म को तो अभिषेक निर्देशित कर रहे हैं।
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