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Akash Educational Services and Byju’s
– फोटो : twitter
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यजूस समूह भले ही छंटनी को लेकर चर्चा में रहा हो, लेकिन समूह की सहयोगी कंपनी आकाश बायजूस मुनाफे में है। कंपनी लगातार नए कर्मचारियों की भर्ती कर रही है। कोविड के बाद समूह ने 125 नए केंद्र ऑफलाइन कोचिंग के लिए खोले हैं। नए साल के अंत तक कुल स्टूडेंट्स की संख्या 5 लाख तक पहुंचाने का लक्ष्य है।
- हिंदी और गुजराती मीडियम में भी तैयारी कराने वाला आकाश बायजूस भविष्य में हर जिले में एक कोचिंग सेंटर खोलना चाहता है।
- 10,500 कर्मचारियों वाली कंपनी के 30 ऑफलाइन कोचिंग सेंटर अकेले उत्तर प्रदेश में हैं।
- नीट पीजी की तैयारी कराने वाली कंपनी हर साल 2,000 बच्चों को निशुल्क कोचिंग देती है।
क्या कोचिंग उद्योग में कोरोना काल वाला पतझड़ खत्म हो चुका है?
बिल्कुल। कोरोना काल से पहले हमसे 1.80 लाख स्टूडेंट्स जुडे़ हुए थे। आज यह संख्या दोगनी हो चुकी है। फिजिकल क्लासरूम केंद्रों की संख्या तब 200 थी, जो बढ़कर 325 हो चुकी है। लेकिन, इस बीच कोचिंग उद्योग से मिलीजुली खबरें आ रही हैं। छंटनी, घाटा, शिक्षकों की किल्लत…जैसी समस्याओं से बड़ी कंपनियां भी अछूती नहीं रहीं? ये स्वाभाविक उतार-चढ़ाव हैं। देखिए, हमने पिछले कुछ वर्षों में एजुटेक उद्योग में जबरदस्त उभार देखा। मैं कहीं पढ़ रहा था कि 2019 के बाद 6,000 से 8,000 तक नई कंपनियां एजुकेशन फील्ड में उतरी हैं। उनमें से 200 से लेकर 300 को बडे़ स्रोतों से फंडिंग भी मिली। दसियों हजार करोड़ रुपये आए। जाहिर है जब किसी उद्योग में इतना बड़ा उभार और इतना बड़ा निवेश आएगा तो देर-सवेर उतार-चढ़ाव का दौर भी आएगा।
अगले साल की वित्तीय योजना क्या है? कितने टर्नओवर और मुनाफे की उम्मीद है?
हम अब एक बड़े समूह का हिस्सा हैं, इसलिए नीति के मुताबिक हम आकाश बायजूस का राजस्व या आमदनी इस तरह सार्वजनिक नहीं कर सकते। लेकिन, इतना कह सकते हैं कि हम मुनाफे में हैं। वास्तव में कोचिंग बुनियादी तौर पर मुनाफे का ही बिजनेस है। वर्तमान में लगभग 3.5 लाख बच्चे ऑफलाइन कक्षाओं के माध्यम से कंपनी से जुडे़ हैं और 60-70 हजार ऑनलाइन क्लास में हैं। इस तरह, 4 लाख से कुछ अधिक बच्चे हैं और साल अंत तक संख्या 5 लाख हो सकती है।
लेकिन, क्या मध्यवर्गीय मां-बाप की जेब के लिए हालात बेहतर हुए हैं? फीस में कुछ राहत की गुंजाइश बनी है?
आकाश आरंभ से ही इस जरूरत को समझता है। इसलिए, उसने हमेशा कुछ-न-कुछ स्कॉलरशिप की गुंजाइश अपने सिस्टम में रखी। गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों से संबंध रखने वाली छात्राओं के लिए हमने एक खास स्कॉलरशिप योजना शुरू की है। विभिन्न एनजीओ से साझेदारी कर हम करीब 2,000 बच्चों को निशुल्क पढ़ा रहे हैं। शुरू से हम देश में नेशनल टैलेंट हंट परीक्षा आयोजित करते रहे हैं। नवंबर में उसमें 17 लाख बच्चों ने हिस्सा लिया। उसमें सफल बच्चों के लिए हम 30-40% स्कॉलरशिप देते हैं। मेधावी छात्र-छात्राओं को हम प्रोत्साहन देते हैं।
तो इस तरह की स्कॉलरशिप के बाद आकाश की औसत फीस का दायरा क्या रहता है?
छोटे स्कूली बच्चों के लिए सालाना फीस औसतन 40 से 50 हजार रुपये रहती है। मतलब, 3,000-4,000 रुपये प्रतिमाह। 11वीं-12वीं जैसे वरिष्ठ क्लास वालों के लिए फीस का दायरा 1.5 से 2 लाख रुपये सालाना हो सकता है। लेकिन, जैसा मैंने कहा कि स्कॉलरशिप मिलने से इसमें और कमी आती है। वैसे अलग-अलग शहरों में हमारी फीस अलग-अलग रहती है। इसकी वजह यह है कि सभी शहरों में हमारी लागत एक जैसी नहीं होती।
सेचुरेशन पाइंट अभी बहुत दूर है। मतलब, अभी इस सेगमेंट में बहुत जूस बचा है। 30 करोड़ बच्चे हैं हमारे मुल्क में। उन सबकी आकांक्षाएं हैं। फिर शिक्षा तो सफलता का आजमाया हुआ रास्ता है। एजुटेक सेगमेंट में मांग की कोई कमी नहीं होने वाली। बड़ी और ठोस कंपनियों के लिए चिंता की कोई बात नहीं होगी।
सरकार ने हिंदी में मेडिकल की पढ़ाई शुरू की है। कंपनी भारतीय भाषाओं को लेकर कितना आगे बढ़ी है?
हिंदी और गुजराती मीडियम के हमारे प्रयोग खासे सफल रहे हैं। देखिए, क्लासरूम में पढ़ाई का माध्यम तो मिलाजुला या दोहरी भाषा वाला ही होता है। चूंकि, एंट्रेस एग्जाम अंग्रेजी में होते हैं इसलिए अंग्रेजी तो रखनी ही होती है। साथ में स्थानीय भाषा के शिक्षक हम राज्य के हिसाब से जोड़ लेते हैं। हर साल गैर-अंग्रेजी माध्यम वाले स्टूडेंट्स का अनुपात बढ़ते देख रहे हैं। हमने गुजराती में पढ़ाई कराना शुरू किया था। प्रयोग सफल रहा। हमारे पास 7,000-8,000 बच्चे गुजराती में ही कोचिंग ले रहे हैं।
मतलब, आकाश बायजूस में छंटनी के कोई आसार नहीं?
बेशक ऐसा ही है। छंटनी तो छोड़िए, हम हर साल 400 से 500 कर्मचारी अपने साथ जोड़ रहे हैं। पिछले तीन साल में हमारी वर्कफोर्स दोगनी से ज्यादा हो चुकी है। 5,000 शिक्षक समेत हमारी कर्मचारी संख्या आज कोई 10,500 होगी। नए साल में इसमें और इजाफा ही होना है।
अच्छी फैकल्टी कैसे सुनिश्चित करते हैं?
हम जानते हैं कि मूलत: हमारे बिजनेस का आधार शिक्षक हैं। इसलिए, अच्छी फैकल्टी हमें हर हाल में चाहिए। इसके लिए हम तीन स्तर पर काम करते हैं। एक तो हमारी शुरू से खास गुणवत्ता वाली मेथडोलॉजी है। एक स्टैंडर्ड सिस्टम है आकाश का। हमारा कोर्स, हमारा सिलेबस सबकुछ वर्षों से आजमाया हुआ है। दूसरी चीज है डिलीवरी। हम अपने स्टैंडर्ड कंटेंट की डिलीवरी भी पूरी गुणवत्ता और अनुभव सिद्ध तरीके से करते हैं। मतलब, क्लास का साइज छोटा रखते हैं 15 से 18 स्टूडेंट का, ताकि शिक्षक अपने छात्र-छात्राओं को प्रेरित कर सकें। उन्हें पर्याप्त समय दे सकें। उनमें अनुशासन और विल पावर भर सकें। तीसरी बात, हम शिक्षकों की भर्ती बहुत कडे़ परीक्षा के बाद करते हैं। इन प्रक्रियाओं से फैकल्टी की गुणवत्ता सुनिश्चित हो जाती है।
क्या कोई नया कोर्स जोड़ने की भी तैयारी है?
नहीं, अब हम एक बडे़ समूह का हिस्सा हैं जो पहले ही कई कोर्स चला रहा है। हां, इधर हम नीट पीजी का कोर्स शुरू करने जा रहे हैं जो एक तरह से मेडिकल से ही जुड़ी परीक्षा है। मेडिकल कॉलेज में स्नातक करने के बाद पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए ऐसे कोचिंग पाठ्यक्रम की मांग रही है। उसके लिए हमें स्पेशियलाइज्ड फैकल्टी की व्यवस्था करनी पड़ी है।
उत्तर प्रदेश जैसे बडे़ राज्यों के लिए आपकी क्या योजनाएं हैं?
सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य यूपी में शिक्षा को लेकर आकांक्षाएं बहुत हैं। हमारे 25 से 30 केंद्र वहां पहले से हैं। लखनऊ में चार केंद्र हैं। कानपुर, आगरा, वाराणसी जैसे शहरों में दो-दो केंद्र हैं। वहां हम एक-एक और खोलने जा रहे हैं। मांग खूब है। लखनऊ में चार केंद्र होने के बावजूद शहर के बाहर से 2,500 से 3,000 छात्र आते हैं। मतलब, लखनऊ के आसपास हमें केंद्र खोलने होंगे। और यही हाल टीयर-2या टीयर-3 यानी छोटे शहरों की है। मसलन, अयोध्या में हमने एक केंद्र खोला है क्योंकि वहां से 250-300 छात्र-छात्राएं लखनऊ के केंद्रों में आते थे। इसी तरह, गोरखपुर में खोला है। याद रहे दो-तीन साल पहले हमारी एक टॉपर छात्रा गोरखपुर की थी। एंट्रेस एग्जाम बडे़ शहर-छोटे शहर या अमीर-गरीब का भेद नहीं करते। आपकी बैकग्राउंड चाहे जैसी हो, किसी भी शहर की हो, अगर आपने एग्जाम क्लियर किया तो जिंदगी बन जाती है।
मेडिकल और इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे अमर उजाला के लाखों नौजवान पाठकों और उनके अभिभावकों के लिए आपका संदेश?
स्टूडेंट्स से यही कहना है कि कॉन्सेप्ट क्लियर रखें। अर्जुन की तरह मछली की आंख पर फोकस रखें। अनुशासन से पढ़ाई करें। मां-बाप से कहूंगा कि बच्चे पास हों या फेल, मायूस न हों। बच्चों का हर हाल में हौसला बढ़ाएं। अच्छी बात है कि बच्चे बार-बार इस परीक्षा में बैठ सकते हैं। कोटा में तीन स्टूडेंट्स ने आत्महत्या की थी। बच्चों के भावनात्मक तनाव को कैसे हैंडल करते हैं। यह बहुत दुखद है। हम जानते हैं कि बच्चे 15-16 साल की उम्र में मानसिक तौर पर अविकसित ही होते हैं और कई बार भावनाओं में बह जाते हैं। तनाव को ध्यान में रखते हुए ही हम कोशिश करते हैं कि बच्चों को कोचिंग के लिए अपना घर न छोड़ना पडे़। घरवाले साथ रहें तो तनाव से जूझने में मदद मिलती है। आकाश का तो मॉडल ही तनाव से बचाव वाला है। इसके अलावा, हम अपने शिक्षकों से क्लास में खुला वार्तालाप करने को कहते हैं।
बच्चे के मन में झांकने का प्रयास हो तो समस्याएं सुलझ जाती हैं। पैरेंट्स-टीचर मीटिंग भी करते हैं। साथ ही, मानसिक सेहत के लिए मनोचिकित्सा विशेषज्ञों को काउंसिलिंग के लिए बुलाते हैं। वे अपने तरीके से स्टूडेंट को समझाते हैं कि उम्मीद हर हाल में कायम रखनी होती है।
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