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हिंदी सिनेमा जिस दौर से इन दिनों गुजर रहा है, उसे समझने का एक और नजरिया सामने आता है उस लम्हे में, जब मुंबई शहर से कोई कलाकार हमेशा के लिए गुजर जाता है। उसके जनाजे में आए लोगों के चेहरों पर रास्ते किनारे जमा लोगों की नजरें टिकी होती हैं। और, उसे याद करने के लिए होने वाली प्रार्थना सभा में इकट्ठा होने वालों की आंखों की नमी उसकी शख्सियत बयां करती है। इस लिहाज से देखें तो लेखक संजय चौहान ने मुंबई शहर में जो कमाया, वह शायद तमाम वे लोग भी अब तक नहीं कमा सके हैं जिनकी इंस्टाग्राम तस्वीरों पर जमाना सुबह, दोपहर, शाम कम से कम तीन बार तो ‘लाइक्स’ बटन दबाता ही रहता है। संजय चौहान को ‘लाइक’ करने वाले सोमवार को ओशिवारा के माहेश्वरी भवन में जुटे। वे अक्सर जुटते ही रहते थे। लेकिन, इस बार संजय साथ नहीं थे, बस कुछ था तो उनकी यादें, जिन्हें लोग बरसों बरस कलेजे से चिपकाए रहेंगे।
निर्देशक अश्विनी चौधरी ने अपने हमपेशा का जो किस्सा सुनाया, वह आंखों में आंसू ला देने वाला था। संजय ने अश्विनी की फिल्म ‘धूप’ में कलम सेंकी थी। वह बताने लगे, ‘मुंबई आने के बाद मैं उनके साथ पांच महीने रहा। उन्होंने ही मेरी फिल्म ‘धूप’ लिखी थी। अक्सर वह कहा करते थे कि संपर्क न रखने से संपर्क टूट जाता है और अंधेरा हो जाता है। अगर जिंदगी में कभी किसी से किसी बात पर मनमुटाव हो जाए तो उसे मिलकर दूर कर लेना चाहिए। नहीं तो मनमुटाव दूर करने का मौका मिलता नहीं है।’
तिग्मांशु धूलिया की फिल्मोग्राफी की सबसे चमकदार फिल्मों में से एक ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ की गोलियां भी संजय की ही कलम से निकलीं। तिग्मांशु ने उन्हें याद करते हुए, कहा, ‘संजय ने कभी अपनी लेखनी से समझौता नहीं किया, अगर विषय पसंद नहीं आता था, तो वह लिखते ही नहीं थे।’ और, निर्देशक सुभाष कपूर ने संजय चौहान की शख्सियत के उस पहलू को याद किया, जिसके संपर्क में आते ही संघर्षों से थका हारा इंसान भी एकदम से चैतन्य हो जाता था। सुभाष ने बताया, ‘एक बार मैं बहुत निराश था। मुंबई नया नया आया था। कुछ काम बन नहीं रहा था। संजय भाई ने तब कहा था, ‘ये मुंबई है क्या पता तुम्हारी बात बन गई हो और तुम्हें पता ही न हो।’
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