Home Sports केएल राहुल का सवाल बना पेचीदा, अब बिल्ली के गले में घंटी बांधे भी तौ कौन?

केएल राहुल का सवाल बना पेचीदा, अब बिल्ली के गले में घंटी बांधे भी तौ कौन?

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केएल राहुल का सवाल बना पेचीदा, अब बिल्ली के गले में घंटी बांधे भी तौ कौन?

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बात अब से कुछ ही महीने पहले ऑस्ट्रेलिया में खेले जा रहे टी20 वर्ल्ड कप की है. टीम इंडिया के बल्लेबाज लोकेश राहुल के लगातार संघर्ष पर मीडिया में सवाल उठ रहे थे और हैरानी इस बात पर जताई जा रही थी कि आखिर ऋषभ पंत जैसे बल्लेबाज को को मौके क्यों नहीं दिए जा रहे हैं. प्रेस कांफ्रेस में कोच राहुल द्रविड़ आने वाले थे और करीब 3 दर्जन से ज़्यादा भारतीय पत्रकारों ने अगले आधे घंटे तक सिर्फ और सिर्फ के एल राहुल पर तीखे प्रहार किए. सवालों के जरिय़े. किसी ने सम्मानपूर्वक पूछा तो किसी ने झुंझलाहट में, किसी ने नाराज़गी में तो किसी ने पक्षपात रवैया की तरफ इशारा करते हुए. लेकिन, उन तमाम सवालों पर द्रविड़ ने उसी सहजता से जवाब दिया जिस अंदाज में वो खौफनाक विरोधी के खिलाफ बेहद मुश्किल पिचों पर सीधे बल्ले से शॉट लगाते हुए आक्रमण को कुंद कर देते थे. ऐसा लग रहा था कि द्रविड़ को बखूबी पता था कि उनके अलावा केएल को इतनी गंभीरता और तर्कों का हवाला देकर कोई भी खिलाड़ी या फिर कप्तान बचाव नहीं कर सकता है. तो द्रविड़ ने एक लाइन में मेरे सवाल पर जो जवाब दिया वो यूं था-

द्रविड़ ने कहा- मुझे लगता है कि राहुल एक शानदार प्लेयर हैं। उनका ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा रहा है। मेरी राय में वो अच्छी बैटिंग कर रहे हैं। यह चीजें टी-20 क्रिकेट में आम हैं। ओपनिंग करना हमेशा से मुश्किल रहा है। यह आसान नहीं। कोच ने आगे कहा- यह टूर्नामेंट किसी के लिए आसान नहीं रहा। हम राहुल की काबिलियत जानते हैं और कई बार देख चुके हैं। वो ऑलराउंड प्लेयर हैं और ऑस्ट्रेलिया के हालात को बहुत बेहतर तरीके से समझते हैं। उम्मीद है वो आने वाले मैचों में अच्छा प्रदर्शन करेंगे. हम अक्सर खिलाड़ियों से बातचीत करते रहते हैं। हमारे रिलेशन बेहतर हुए हैं और राहुल जानते हैं कि टीम उन्हें सपोर्ट करती है। टीम मैनेजमेंट और प्लेयर्स के बीच क्लैरिटी है. उनके करियर में ऐसा कठिन समय पहले भी आया है और उन्होंने हमेशा कमबैक किया है. कप्तान रोहित को भी अपने प्लेयर्स पर पूरा भरोसा है. हम जानते हैं कि राहुल कितनी अटैकिंग बैटिंग कर सकते हैं.

इतिहास गवाह है कि राहुल उस वर्ल्ड कप के हर मैच में खेले और एक अर्धशतक छोड़कर कुछ भी नहीं किया. लेकिन इसके बावजूद उनके खेल पर चयनकर्ताओं ने ऊंगली नहीं उठायी. इसके विपरीत जब कुछ ही महीने बाद टीम इंडिया बांग्लादेश के दौरे पर गयी तो राहुल को कप्तान बना दिया गया. उस टीम का टेस्ट कप्तान जिसमें रविचंद्र्न अस्विन जैसा चैंपियन खिलाड़ी मौजूद था. बांग्लादेश में भी राहुल का संघर्ष बरकार रहा लेकिन उनके टीम में बने रहने पर कोच और चयनकर्ताओं को कोई आपत्ति नहीं थी.

ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ मौजूदा टेस्ट सीरीज़ के पहले मैच में नागपुर में राहुल फिर नाकाम हुए और टीम की जीत के बावजूद सवाल के एल के फॉर्न पर पूछे गये. लेकिन, हमेशा की ही तरह फिर से टीम मैनेजमेंट ने उनका ज़बरदस्त तरीके से बचाव किया. बल्लेबाज़ी कोच विक्रम राठौड़ से प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक रिपोर्टर ने पूछा कि क्या प्लेइंग इलेवन में जगह बनाने के मामले में उप-कप्तान राहुल बहुत लकी साबित हो रहें हैं क्या? जवाब में बैटिंग कोच ने कहा कि वह इस पर कमेंट नहीं करना चाहेंगे. लेकिन, राठौड़ आगे राहुल का बचाव करने से नहीं चूके. उन्होंने उसी प्रेस कांफ्रेस में आगे ये कहा कि- यह केएल के साथ एकदम फेयर है, उन्होंने पिछले 10 टेस्ट मैचों में दो सेंचुरी जमाई है, जिसमें से एक इंग्लैंड और दूसरी साउथ अफ्रीका में आई है. साथ ही उनके बल्ले से कई अर्धशतकीय पारी भी निकली है.

दरअसल, राठौड़ को अपना दौर शायद याद आ गया होगा. 1996 में राहुल द्रविड़ और सौरव गांगुली के साथ राठौड़ को भी तीन मैचों की टेस्ट सीरीज़ के लिए चुना गया था. उस दौर में राठौड़ को भी द्रविड़-गांगुली के स्तर वाली प्रतिभा माना जाता था. सचिन तेंदुलकर जैसे खिलाड़ी राठौड़ के खेल से ऐसे मंत्र-मुग्ध थे कि जैसे कोच द्रविड़ के एल को लेकर हैं. राठौर दौरे के हर अभ्यास मैचों में शतक बनाते लेकिन टेस्ट मैच में गच्चा खाते. आलम ये रहा कि दौरे पर फर्स्ट क्लास मैचों में राठौड़ ने 759 रन बनाये 58.38 की औसत से. इसी दलील के बूते उन्हें पहले दो मैचों में मौका मिला. बर्मिंघम में खेले गये पहले टेस्ट में ना तो गांगुली और ना ही द्रविड़ को मौके दिये गये क्योंकि राठौड़ को उस समय के टीम मैनेजमेंट ने बेहतर विकल्प माना. लेकिन, 2 मैचों की 4 पारियों में सिर्फ 20 का अधिकतम स्कोर चयनकर्ताओं का जगाने के लिए काफी था. उसी दौरे पर गांगुली और द्रविड़ को मौके मिले औऱ ये दोनों आगे जाकर 100 से ज़्यादा टेस्ट भारत के लिए खेले. अब ज़रा सोचिये कि अज़हरुद्न भी अगर राठौर के दौरे के मैचों के आंकड़े की दलील देते हुए उन्हें हर मैच में खिलाते और द्रविड़-गांगुली को मौके नहीं देते तो क्या होता?

आज के दौर में के एल राहुल को ज़रुरत से ज़्यादा मौका देने की बात पर मायूसी से ज़्यादा फैंस में इस बात को लेकर नाराज़गी है कि सरफराज़ ख़ान जैसे बेहद प्रतिभाशाली खिलाड़ी को एक मैच भी खेलने क्यों नहीं दिया जा रहा है? शतक और दोहरे शतक लगाकर आने वाले शुभमन गिल को प्लेइंग इलेवन में जगह क्यों नहीं मिल रही? सूरयकुमार यादव को भी महज एक मैच के बाद बाहर होना पड़ जाता है. लेकिन, के एल राहुल के लिए अलग नियम क्यों हैं? ज़ाहिर सी बात है ये बेहद पेचिदा सवाल है और इसका जवाब मुख्य चयनकर्ता ही दे सकते हैं. लेकिन भारतीय क्रिकेट के लिए मुश्किल ये है कि खुद मुख्य चयनकर्ता चेतन शर्मा ही फिलहाल हिट विकेट से आउट होकर पवेलियन लौट चुके हैं तो ऐसे में बिल्ली के गले में घंटी बांधे भी तौ कौन?

Tags: India vs Australia, Indian Cricket Team, KL Rahul

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