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कांग्रेस का महाधिवेशन: सत्ता संग्राम की कठिन चुनौतियां, कैसा होगा राजनीतिक भविष्य?

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कांग्रेस का महाधिवेशन: सत्ता संग्राम की कठिन चुनौतियां, कैसा होगा राजनीतिक भविष्य?

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कांग्रेस कमेटी का महाधिवेशन

कांग्रेस कमेटी का महाधिवेशन
– फोटो : Agency

विस्तार

देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के रायपुर में सम्पन्न तीन दिन के पूर्ण महाधिवेशन से पार्टी से देश को क्या लाभ होगा, होगा भी या नहीं, इसको लेकर सियासी हल्को में अपने अपने ढंग से आकलन किया जा रहा है।

 

इस महाधिवेशन में जो मुख्य बिंदु उभर कर आए हैं, वो हैं- कांग्रेस ने अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में पूरी ताकत से लड़ने का संकल्प जताया है। दूसरा, पार्टी भाजपा व साम्प्रदायिक ताकतों को परास्त करने के लिए हर संभव कोशिश करेगी। तीसरा, सामाजिक न्याय के मुद्दे को पूरी तवज्जो देगी। चौथा विवादास्पद उद्योगपति गौतम अडानी के बहाने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर सीधा हमला जारी रहेगा। पांचवा, पार्टी में युवाओं को आगे लाने की पूरी कोशिश होगी। छठा, कांग्रेस समान विचारों वाले विपक्षी दलों को एकजुट करेगी तथा सातवां पार्टी का अध्यक्ष कोई भी हो, वास्तविक कमान गांधी परिवार के हाथ में ही रहेगी। 

 

भारतीय कांग्रेस कमेटी का यह 85वां महाधिवेशन

अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का यह 85वां महाधिवेशन था, जिसमें सभी राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों से कांग्रेस नेता व प्रतिनिधि शामिल हुए। आजादी के पहले तक कांग्रेस का महाधिवेशन अमूमन हर साल होता था। लेकिन स्वतंत्रता के बाद इसका उत्साह घटता गया और पार्टी सत्ता केन्द्रित ज्यादा हो गई।

रायपुर में हुआ यह अधिवेशन भी पांच साल बाद हुआ है। इसे यूं भी समझा जा सकता  है कि कांग्रेस आम चुनाव के पहले ही महाधिवेशन करती है। पिछला महाधिवेशन 2018 में नई दिल्ली में हुआ था। महाधिवेशनों में इतना अंतराल निश्चित पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में कसावट पैदा करने में बाधक सिद्ध होता है।  

यह महाधिवेशन भी देश में मौजूदा राजनीतिक चुनौतियों, विद्वेष की राजनीति और आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर ही आयोजित किया गया था। इस महाधिवेशन में कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि पार्टी अब अपने दम पर विचार विमर्श और फैसले करने लगी है, लेकिन तीसरे और अंतिम दिन तक आते-आते यह बात साफ हो गई कि पार्टी में मल्लिकार्जुन खड़गे जैसा निर्वाचित अध्यक्ष भले ही हो, वास्तविक कमान राहुल गांधी के हाथ में ही रहने वाली है।

यह राहुल पर निर्भर है कि सफल ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद वह गुटों में बंटी और ऊपर से नीचे तक अंतर्कलह से जूझ रही कांग्रेस को किस तरह नियंत्रित और संचालित करते हैं। 

 

‘भारत जोड़ो यात्रा’ से पार्टी को लाभ

महाधिवेशन में तकरीबन हर नेता ने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की तारीफ के पुल बांधे। इसमें राहुल भक्ति के साथ-साथ कार्यकर्ताओं में आई निराशा छंटने का शुभ संकेत भी था। माना गया कि राहुल की इस निर्बाध यात्रा से देश में विपक्ष के लिए अनुकूल वातावरण बना है। लिहाजा राहुल अब देश में पूर्व से पश्चिम को जोड़ने के लिए पैदल यात्रा करेंगे। इससे कांग्रेस के पक्ष में माहौल और सघन होगा।

महाधिवेशन में पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के भाषण का यह अर्थ निकाला गया कि वो अब रिटायर होना चाहती हैं। लेकिन कार्यकर्ताओं में इसका गलत संदेश जाने की आशंका के चलते दूसरे ही दिन ऐसी किसी संभावना का खंडन कर दिया गया।

इससे यह बात भी पुष्ट हुई कि कांग्रेस गांधी परिवार के बिना कांग्रेस दो कदम भी नहीं चल सकती। महाधिवेशन में राहुल गांधी ने अपने भाषण में मोदी और भाजपा सरकार पर जमकर हमले बोले और कहा कि मेरा उद्देश्य में देश में नफरत के माहौल को खत्म कर शांति और प्रेम का संदेश देना है। उन्होंने यहां तक कहा कि उनका (गांधी परिवार) का 52 साल से अपना घर नहीं है। 

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