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होल्कर स्टेडियम, इंदौर. ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ तीसरे टेस्ट में भारतीय बल्लेबाजी के सरेंडर के साथ ही तय हो गया कि टीम मैनेजमेंट दोधारी तलवार से खेल रहा है. स्पिन पिच की दोधारी तलवार. यकीनन हर मेजबान टीम अपनी ताकत के मुताबिक ही पिच तैयार कराती है. भारत यदि ऐसा कर रहा है तो कोई गुनाह नहीं है. लेकिन ऑस्ट्रेलिया ने जिस तरह से इंदौर टेस्ट में भारत को पहली पारी में 109 रन पर ऑलआउट किया और दूसरी पारी में मुश्किल में डाला, उससे साफ है यह दोधारी तलवार किसी की सगी नहीं है. गर्दन किसी की आए, उसे कटना ही है.
भारतीय टीम जब पहली पारी में 109 रन पर सिमटी, उसके बाद पिच पर तमाम बातें उड़ने लगीं. कुछ सच और कुछ गलत. जैसे कि मीडिया के एक वर्ग ने लिख दिया कि भारतीय टीम मैनेजमेंट ने ऐसी पिच तैयार करने को कहा था कि पहले ही दिन से गेंद टर्न करने लगे. हालांकि, ऐसी बातों में सच्चाई इसलिए नहीं दिखती क्योंकि यदि ऐसा होता तो भारत दो स्पेशलिस्ट तेज गेंदबाजों के साथ नहीं उतरता. भारत ने जो प्लेइंग इलेवन उतारी है, उससे साफ है कि उसे एक ऐसी भारतीय पिच की उम्मीद थी, जो पहले एक या दो दिन बैटिंग के मुफीद होगी, मैच के पहले सेशन में तेज गेंदबाजों के लिए हल्की मदद होगी. फिर जैसे-जैसे मैच आगे बढ़ेगा, वैसे-वैसे स्पिनरों का रोल बढ़ता जाएगा. अब हर उम्मीद तो खरी उतरती नहीं. भारत के साथ भी ऐसा ही हुआ.
बहरहाल, हम दोधारी पिच यानी दोधारी तलवार की ओर लौटते हैं. एक वक्त था जब भारत घरेलू पिचों पर शहंशाह था. वह तीन स्पिनरों के साथ मैदान पर उतरता और ज्यादातर मैच जीत लेता. ये उन दिनों की बात है जब मोहम्मद अजहरुद्दीन कप्तान हुआ करते थे. उनके तरकश में अनिल कुंबले, राजेश चौहान, वेंकटपति राजू जैसे तीर थे. बाद में भारत का कप्तान भी बदला और तरकश में नए तीर भी जुड़े. सौरव गांगुली की कप्तानी के दिनों में भी भारत ने घर पर ज्यादातर मैच अनिल कुंबले और हरभजन सिंह की बदौलत जीते. कभी-कभी मुरली कार्तिक, साईराज बहुतुले भी स्पिन अटैक का हिस्सा रहे.
लेकिन यह उन दिनों की बात है, जब भारत के पास अच्छे तेज गेंदबाज इक्का-दुक्का ही हुआ करते थे. समय बदला और भारत का पेस अटैक मजबूत हो गया. जवागल श्रीनाथ, जहीर खान, आशीष नेहरा, इरफान पठान, आरपी सिंह, एस श्रीसंथ, मोहम्मद शमी, जसप्रीत बुमराह… तेज गेंदबाज बढ़ते गए और भारत विदेशों में भी मैच जीतने लगा. उसने 2007 में इंग्लैंड को इंग्लैंड में हराया. कुछ बरसों बाद जी का यह सिलसिला ऑस्ट्रेलिया भी पहुंचा और भारत वहां भी सीरीज जीतने लगा.
इस बदलाव के क्रम में सबसे अहम बाद यह हुई कि भारतीय बैटर अब तेज पिचों पर भी रन बनाने लगे. इसके अलावा भारतीय तेज गेंदबाज विरोधी टीमों को उनके घर पर ऑलआउट करने लगी. इस बीच भारत में आईपीएल भी शुरू हो चुका था. अब दुनियाभर के बैटर हर साल दो महीने भारत में ही रहते. भारत की आबोहवा से तालमेल बिठाते और यहां की पिचों को भी पहचानते. अब कई विदेशी खिलाड़ी भारतीय खिलाड़ियों की ही तरह स्पिन को अच्छा खेलने लगे. स्टीव स्मिथ, उस्मान ख्वाजा, जो रूट, केन विलियम्सन जैसे अनेक बल्लेबाज अब स्पिन को उसी नियंत्रण से खेलते हैं, जैसे विराट कोहली, रोहित शर्मा या चेतेश्वर पुजारा.
इंदौर में खेले जा रहे तीसरे टेस्ट की ही बात कर लीजिए, इस मैच में पहले दो दिन तक सिर्फ दो बैटर ही 50 रन का आंकड़ा पार कर पाए. इनमें से एक भारतीय और दूसरा ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज है. भारत की ओर से चेतेश्वर पुजारा ने दूसरी पारी में अर्धशतक लगाया. लेकिन इससे पहले ही उस्मान ख्वाजा ऑस्ट्रेलिया के लिए 60 रन की पारी खेल चुके थे. उन्होंने ऑस्ट्रेलिया की पहली पारी में मार्नस लैबुशेन के साथ 98 रन की साझेदारी कर यह मैच भारत के हाथ से लगभग छीन लिया.
यह सारी गफलत इस उम्मीद से हुई कि भारत स्पिन ट्रैक पर 250 के आसपास का स्कोर बना ले तो बाकी का काम उसके स्पिनर कर देते हैं. लेकिन हर बार ऐसा नहीं होगा. कभी भारत की पारी भी लड़खड़ाएगी. जैसा कि इंदौर टेस्ट में हुआ. भारत के कई पूर्व क्रिकेटरों ने कहा कि पिछले कुछ सालों में ऐसा दिखा है कि भारत स्पिन ट्रैक की दिशा में आगे बढ़ रहा है. यह सही नहीं है क्योंकि इससे हमारी विदेश में जीत की संभावना पर असर पड़ेगा. दूसरी ओर, भारत के बैटिंग कोच विक्रम राठौड़ कहते हैं कि जब से वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप शुरू हुई है, सभी टीमों पर घरेलू सीरीज जीतने का दबाव बढ़ा है. सिर्फ भारत ही नहीं, दूसरी टीमें भी अपनी ताकत के हिसाब से पिचें तैयार करा रही हैं. यह गलत भी नहीं है.
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Tags: BCCI, Cheteshwar Pujara, India vs Australia, Nathan Lyon, Team india
FIRST PUBLISHED : March 02, 2023, 16:35 IST
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