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North-East- Congress Leader Rahul Gandhi
– फोटो : ANI (File Photo)
विस्तार
नॉर्थ-ईस्ट के चुनावी परिणामों से कुछ ऐसा संदेश मिल रहा है कि जैसे कांग्रेस पार्टी ने वहां भाजपा को वॉकओवर दे दिया है। दोनों पार्टियों के नेताओं द्वारा दिए गए बयान भी कुछ इसी ओर इशारा करते हैं। लंबे दौर तक जिस उत्तर पूर्व में कांग्रेस का शासन रहा था, आज उसे चंद सीटें लेने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है। जानकारों का कहना है कि भाजपा, किसी भी चुनाव की तैयारी में छोटा-बड़ा नहीं देखती। पीएम से लेकर निचले स्तर तक का कार्यकर्ता चुनाव जीतने के लिए मैदान में उतरता है। इसका फायदा भी ‘जीत’ के तौर पर भाजपा को मिल रहा है। उत्तर पूर्व के तीन राज्यों के चुनाव में कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का प्रचार, बहुत ही सीमित रहा। कांग्रेस की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ का परिणाम वहां नजर नहीं आया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कांग्रेस पर तंज कसते हुए कहा, उनकी रस्सी जल गई, लेकिन ऐंठन नहीं गई।
चुनाव को छोटा-बड़ा नहीं समझती भाजपा
कांग्रेस पार्टी की राजनीति को करीब से समझने वाले पॉलिटिकल एनालिस्ट रशीद किदवई कहते हैं, ये बात सही है कि भाजपा, किसी भी चुनाव को छोटा-बड़ा नहीं समझती। वह हर चुनाव में जीतने की रणनीति बनाकर मैदान में उतरती है। यह भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की खूबी है। वहां पीएम से लेकर पार्टी अध्यक्ष, वरिष्ठ पदाधिकारी और कार्यकर्ता, सभी चुनाव पर फोकस करते हैं। कांग्रेस, उत्तर पूर्व में छोटे बड़े राज्य के भेद में फंस गई। राहुल गांधी ने केवल मेघालय में ही रैली को संबोधित किया था। बेहतर होता कि ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के बाद वे इस चुनाव को अपनी पहली परीक्षा मानकर मैदान में उतरते। चुनावी नतीजे आने के बाद पार्टी नेताओं के बयानों से लग रहा था कि उनके लिए उत्तर-पूर्व के राज्य अधिक अहमियत नहीं रखते। पार्टी महासचिव और प्रवक्ता जयराम रमेश ने पूर्वोत्तर की हार को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। उन्होंने कहा, ये स्थानीय चुनाव थे, राष्ट्रीय नहीं। इन चुनावों में केंद्रीय नेतृत्व, अकेले अपने दम पर जीत नहीं दिला सकता।
चुनाव में ‘एग्रेसिव’ तरीका और विपक्ष पर प्रहार
जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर, समाजशास्त्री एवं राजनीतिक विश्लेषक डॉ. आनंद कुमार भी यह बात मानते हैं कि पीएम मोदी के कार्यकाल में भाजपा, किसी भी चुनाव में बहुत ‘एग्रेसिव’ तरीके से उतरती है। वहां हर तरह का दांव लगता है। खुद के पक्ष वाली बहुत सी बातों को भुनाया जाता है, तो वहीं विपक्ष पर कड़ा प्रहार भी होता है। यूपीए के दौरान जब डॉ. मनमोहन सिंह पीएम थे, तो वे चुनाव प्रचार के लिए बहुत कम निकलते थे। कांग्रेस में उनसे पहले पीएम रहे नेता भी विधानसभा चुनाव को अहमियत नहीं देते थे। उसे राज्य की कोर टीम पर छोड़ दिया जाता था। राजीव गांधी और पीवी नरसिंह राव के समय में तो ऐसा भी हुआ कि विधानसभा चुनाव के दौरान वे विदेशी दौरों पर रहे। पीएम मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा में चुनाव को लेकर एग्रेसिव रणनीति बनने लगी। कांग्रेस को इस दिशा में सोचना चाहिए था। उत्तर प्रदेश जैसा बड़ा राज्य, जिसने अभी तक देश को सर्वाधिक पीएम दिए हैं, वहां कांग्रेस की स्थिति आज क्या हो गई है। विधानसभा में पार्टी की दो सीट हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को सपा से गठबंधन होने के बावजूद 6.25 फीसदी वोट मिले थे। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी को 2.33 फीसदी मत मिले हैं।
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