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Bihar Electricity Rate: बिजली की दरें नहीं बढ़ेंगी, नियामक के बढ़ा रेट देख सरकार ने सब्सिडी बढ़ाई

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Bihar Electricity Rate: बिजली की दरें नहीं बढ़ेंगी, नियामक के बढ़ा रेट देख सरकार ने सब्सिडी बढ़ाई

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सांकेतिक तस्वीर

सांकेतिक तस्वीर
– फोटो : सोशल मीडिया

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बिहार में ऊर्जा मंत्री बिजेंद्र यादव ने बिजली की दरों को लेकर बड़ी घोषणा की। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कृपा से अनुदान को बढ़ाते हुए पुराने रेट को ही प्रभावी रखा जा रहा है। इसके बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि निर्णय लिया कि लोगों पर आर्थिक बोझ न पड़े, इसलिए यह निर्णय लिया।

बता दें कि 8 हजार 895 करोड़ अनुदान देते थे। कैबिनेट से फैसला लिया 13 हजार 114 करोड़ रुपये अनुदान देंगे। इसके कारण पुराने रेट पर ही उपभोक्ताओं को बिजली मिलेगी। उन्होंने कहा कि भाजपा वालों को केंद्र से कहना चाहिए कि वन नेशन, वन रेट लागू करें। बिहार को 5.82 रुपये प्रति यूनिट बिजली मिलती है, जबकि गुजरात को 3.74 रुपये प्रति यूनिट।

मुख्यमंत्रियों की बैठक में एक ही रेट का मुद्दा उठाते रहते हैं। भाजपा वाले भी केंद्र सरकार को बताएं कि राज करना चाहते हैं तो इन सभी बात की चिंता कीजिए। गरीबी के बावजूद आज हमने एक-एक घर में बिजली पहुंचा दिया है। साल 2018 में टारगेट के दो महीने पहले लक्ष्य पूरा किया गया। रेट हम नहीं बढ़ाए थे। संवैधानिक रूप से नियामक रेट बनाता है। हम लोग उसको थोड़े ही मानते हैं। वह रेट देंगे, हम सब्सिडी देकर उसे आम उपभोक्ताओं के लिए राहत देते हैं।

सीएम ने कहा, मध्यप्रदेश को 3.49 रुपये प्रति यूनिट बिजली देते हैं। बिहार इतना गरीब राज्य है, इसका ख्याल रखना चाहिए। कैबिनेट आज ही कर लिया गया, क्योंकि नियामक के हिसाब से कल से नया रेट लागू हो जाता। विपक्ष के नेता बोले, आप अपने स्तर से थर्मल पावर क्यों नहीं चला रहे कि केंद्र सरकार को दोष दे रहे हैं। फिर अध्यक्ष ने कहा, आप धन्यवाद दीजिए मुख्यमंत्री को। इसके बाद अध्यक्ष के रोकने पर भी विपक्ष के नेता विजय कुमार सिन्हा बोलने लगे, विपक्ष की आवाज दबाकर सत्ता मनमानी करना चाहती है। बताएं कि राज्य का उत्पादन क्या है, केंद्र का उत्पादन क्या है।

ऊर्जा मंत्री बिजेंद्र यादव ने दिया जवाब। कहा, झारखंड बंटवारे के बाद बिहार में 110 मेगावाट उत्पादन वाली दो यूनिट ही बची थी। हालत यह थी कि कोयला भी भारत सरकार क्वॉलिटी वाला नहीं देती थी और रेलवे भी समय पर कोयला नहीं पहुंचाता था। इसी से उत्पादन प्रभावित हो रहा था। इसलिए केंद्र से ही बिजली लेने पर सहमति बनानी पड़ी।

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