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चिकमंगलूर जिले के गांव में चुनाव पर चर्चा करते लोग।
– फोटो : अमर उजाला
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गवर्नमेंट प्री यूनिवर्सिटी कॉलेज की छुट्टी है, गेट बंद है। यह वही स्कूल है, जिसमें उठा हिजाब का विवाद पूरे देश में सुर्खी बन गया था। यहां इंटरमीडिएट तक स्कूल न कह कर प्री यूनिवर्सिटी कहा जाता है।
उडुपी शहर के बस अड्डे से बस थोड़ी दूरी पर इस कॉलेज के ठीक सामने किताबों की दुकान पर बैठे 65 वर्षीय सतीश शिनॉय के दिल में अब भी इस बात का दर्द है कि हिजाब विवाद की काली छाया उनके शहर और स्कूल के साथ एक पहचान की तरह चस्पा कर दी गई है। शिनॉय कहते हैं, मैं पिछले 30 साल से इस कॉलेज के बाहर किताब की दुकान पर बैठ रहा हूं। समझ नहीं आया कि एकदम से यह हिजाब का मामला पूरे देश में क्यों चर्चा का विषय बन गया।
स्कूल में पढ़ने वाली बच्चियों के पीछे कौन हैं, जो मामला सुप्रीम कोर्ट तक चला गया। बर्तन की दुकान लगाने वाले अब्दुल मुबीन भी मानते हैं कि इस मामले में फायदा चाहे जिसका हो, लेकिन सियासतदानों की वजह से विवाद बहुत बढ़ गया। कर्नाटक की राजनीति क्षेत्र के हिसाब से वैसे ही बदलती है, जैसे यहां एक शहर से दूसरे शहर जाने के लिए जंगलों के बीच हर मोड़ पर तेजी से रास्ते बदलते हैं। चिकमंगलूर में वोक्कालिगा व लिंगायत की बहुलता मानी जाती है, तो उडुपी की ओर चलने पर हिंदू क्षत्रिय भी प्रभावी भूमिका में हैं। मैसूर क्षेत्र में जहां जेडीएस प्रमुख पार्टी थी, तो चिकमंगलूर और उडुपी में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच ही नजर आता है। हालांकि, जेडीएस की भी उपस्थिति है। पिछले चुनावों में इन दोनों ही जगहों पर भाजपा काफी मजबूत रही थी।
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