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'हिंदी हैं हम' शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- जय, जिसका अर्थ है- युद्ध, विवाद आदि में विपक्षियों का पराभव, जीत। प्रस्तुत है अज्ञेय की कविता- मैं सेतु हूँ—जो है और जो होगा दोनों को मिलाता हूँ
दूर दूर दूर... मैं वहाँ हूँ!
यह नहीं कि मैं भागता हूँ :
मैं सेतु हूँ—जो है और जो होगा दोनों को मिलाता हूँ—
मैं हूँ, मैं यहाँ हूँ, पर सेतु हूँ इसलिए
दूर दूर दूर... मैं वहाँ हूँ!
यह जो मिट्टी गोड़ता है, कोदई खाता है और गेहूँ खिलाता है
उसकी मैं साधना हूँ।
यह जो मिट्टी फोड़ता है, मड़िया में रहता है और महलों को बनाता है
उसकी मैं आस्था हूँ।
यह जो कज्जल-पुता ख़ानों में उतरता है
पर चमाचम विमानों को आकाश में उड़ाता है,
यह जो नंगे बदन, दम साध, पानी में उतरता है
और बाज़ार के लिए पानीदार मोती निकाल लाता है,
यह जो क़लम घिसता है, चाकरी करता है पर सरकार को चलाता है
उसकी मैं व्यथा हूँ।
यह जो कचरा ढोता है,
यह जो झल्ली लिए फिरता है और बेघरा घूरे पर सोता है,
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8 hours ago
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