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Same Gender Marriage: CJI बोले- कोर्ट समलैंगिकों की इच्छा से नहीं चलती, हम देखते हैं कि संविधान क्या कहता है

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Same Gender Marriage: CJI बोले- कोर्ट समलैंगिकों की इच्छा से नहीं चलती, हम देखते हैं कि संविधान क्या कहता है

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Same Gender Marriage: CJI said Supreme Court operates according to constitution not to wish of homosexuals

समलैंगिक शादी

विस्तार

समलैंगिक विवाह को मंजूरी देने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने बुधवार को सुनवाई की। इस दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि हम समाज में प्रचलित नैतिकता या विभिन्न लोगों की नैतिकता पर नहीं चलते हैं। हम यह देखते है कि संविधान इस पर क्या कहता है। शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी बुधवार को सुनवाई के दौरान उन दलीलों पर आई जिनमें कहा गया था कि अधिकांश समलैंगिक जोड़े केवल शादी करना चाहते हैं।  

‘अधिकांश समलैंगिक जोड़े शादी करना चाह रहे’

 सुनवाई के सातवें दिन पेश की जा रही दलीलों के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल ने तर्क दिया कि उन्होंने विभिन्न सेमिनारों में समलैंगिक लोगों से बात की है। उनमें से 99 प्रतिशत लोगों का केवल यही कहना है कि वे शादी करना चाहते हैं। सौरभ कृपाल के साथ ही वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि उन्होंने भी पाया है कि युवा समलैंगिक जोड़े शादी करना चाहते हैं। उन्होंने पीठ से कहा कि मैं एक कुलीन वकील के रूप में यह नहीं कह रही हूं। मैं यह इसलिए कह रही हूं कि मैनें इन युवाओं से मुलाकात की है। उन्होंने कहा कि वे लोग चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट समलैंगिक शादी को मान्यता दें। उन्हें वह अनुभव न करने दें जो हमने अनुभव किया है। 

हम लोगों की भावनाओं के हिसाब से नहीं चलते- सुप्रीम कोर्ट

मेनका गुरुस्वामी की इस दलील पर सीजेआई ने कहा कि आपके इस तर्क के साथ एक समस्या है। उन्होंने आगे कहा कि हम उन भावनाओं को समझते हैं जिनसे यह तर्क आता है, लेकिन संवैधानिक स्तर पर यह एक गंभीर समस्या है। हमें इस पर विचार कर फैसला नहीं देना कि युवा लोग अदालत से क्या चाहते हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर एक संवैधानिक अदालत के रूप में सुप्रीम कोर्ट युवा समलैंगिक जोड़ों की भावनाओं के अनुसार चलता है, तो यह अन्य लोगों की भावनाओं के बारे में बहुत सारे डेटा के अधीन भी होगा। ऐसे में इसमें हमें बिल्कुल नहीं पड़ना चाहिए। हमें ये विचार कर फैसला देना है कि संविधान की इच्छा क्या है। 



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