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मोदी सरनेम पर टिप्पणी मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सदस्यता जाने के बाद जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 पर खासी चर्चा शुरू हो गई है। इस कानून के आधार पर वर्ष 1988 से अब तक 42 सांसदों की सदस्यता जा चुकी है। इस कानून के तहत सबसे अधिक 19 सदस्यों की सदस्यता 14वीं लोकसभा के दौरान गई। इन सांसदों की सदस्यता पैसे लेकर सवाल पूछने और क्रॉस वोटिंग के कारण गई थी। सांसदों को अयोग्य घोषित करने का आदेश विभिन्न आधारों पर दिया गया है जैसे राजनीतिक निष्ठा बदलना, एक सांसद का आचरण अनुचित व्यवहार करना और दो साल या उससे अधिक की जेल की सजा वाले अपराधों के लिए अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद।
जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत हाल के दिनों में कांग्रेस नेता राहुल गांधी, राकांपा नेता मोहम्मद फैजल पीपी और बसपा नेता अफजाल अंसारी की सदस्यता गई है। इन नेताओं को विभिन्न अदालतों की ओर से दो साल से अधिक की जेल की सजा सुनाए जाने के बाद अपनी सांसदी गंवानी पड़ी है। यह अधिनियम किसी आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने और दो साल या उससे अधिक की सजा पाए जाने पर सांसदों और राज्य के विधायकों को स्वत: अयोग्य ठहराने से संबंधित है। हालांकि लोकसभा में लक्षद्वीप का प्रतिनिधित्व करने वाले फैजल की अयोग्यता को केरल उच्च न्यायालय की ओर से हत्या के प्रयास के मामले में दोषसिद्धि और सजा पर रोक प्राप्त करने के बाद रद्द कर दिया गया है।
गांधी ने ‘मोदी उपनाम’ से जुड़े आपराधिक मानहानि मामले में सूरत की एक अदालत की ओर से दो साल जेल की सजा सुनाए जाने के बाद गुजरात उच्च न्यायालय का रुख किया है। पहली बार किसी लोगसभा सदस्य को साल 1985 में अयोग्य ठहराया गया था। उस समय दलबदल विरोधी कानून लागू होने बाद कांग्रेस के सांसद लालदुहोमा की लोकसभा सदस्यता चली गई थी। कांग्रेस सांसद ने उस समय मिजोरम विधानसभा चुनाव के लिए मिजो नेशनल यूनियन के उम्मीदवार के रूप में अपना नामांकन पत्र दाखिल किया था। इसके बाद उनकी लोकसभा की सदस्यता चली गई थी।
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