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Karnataka Election 2023
– फोटो : Amar Ujala
विस्तार
देश की राजनीति में करीब एक दशक से ‘हिंदुत्व’ कार्ड की जबरदस्त आंधी चली है। राजनीति में क्षेत्रीय विषमता और अस्मिता, दोनों को समेटने के लिए भाजपा ने ‘हिंदुत्व’ का कार्ड खेला। काफी हद तक उसे कामयाबी भी मिल गई। कुछ समय पहले तक यही माना जा रहा था कि भाजपा के सफल होने का एक बड़ा कारण दिशाहीन ‘कांग्रेस’ पार्टी भी है। जहां भी चुनाव होता, वहीं इस दल के कई गुट नजर आने लगते। जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर एवं राजनीतिक विश्लेषक डॉ आनंद कुमार कहते हैं, वोटरों को लगने लगा था कि कांग्रेस पार्टी किसी भी वर्ग के लिए उपयोगी साबित नहीं हो रही। विपक्ष को भी साथ नहीं ले पा रही। इन सबके चलते भाजपा ने तो यह मान लिया था कि ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ मिशन खत्म हो चुका है, अब राज्यों के मजबूत क्षेत्रीय दलों की बारी है। यह सवाल भी उठने लगा कि विपक्षी दलों का नवीनीकरण हो पाएगा या वे इतिहास बन कर जाएंगे। कर्नाटक की जीत ने कम से कम विपक्षी दलों, खासतौर पर कांग्रेस के नवीनीकरण की राह प्रशस्त की है। हालांकि अभी ये शुरुआत भर है।
कई उतार चढ़ावों से गुजरी है कांग्रेस …
बता दें कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद से ही पार्टी में विरोध के स्वर उठने शुरु हो गए थे। राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया, मगर पार्टी में उनकी खिलाफत करने वालों के मुंह बंद नहीं हुए। पार्टी के भीतर जुदा राय रखने वाले नेताओं का ‘जी23’ समूह बन गया। गुलाम नबी आजाद का इस्तीफा, कांग्रेस के लिए बड़ा झटका था। इसके बाद नेताओं के मनमर्जी वाले बयान सामने आने लगे। ये कहा गया कि आगे भी वरिष्ठ नेता पार्टी से किनारा कर सकते हैं। कई मुद्दों पर पार्टी के सांसद मनीष तिवारी ने अपनी अलग राय रखी। आनंद शर्मा को लेकर भी सहमति और असहमति जैसा कुछ सामने आने लगा।
कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ नेता ‘सपा’ की मेहरबानी से राज्यसभा में चले गए। एक बार ये कहा जाने लगा कि कांग्रेस, भटकाव की स्थिति में है। भारत जोड़ो यात्रा से पहले पार्टी में खूब उथल पुथल हुई। ये भी कहा गया कि सोनिया गांधी, दोराहे पर हैं। वे पार्टी को खुश रखने के साथ-साथ राहुल की ढाल बनी हुई हैं। वे किसी भी हाल में ‘राहुल’ को कमजोर नहीं होने देना चाहती।
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