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जामनगर के महाराजा ने सिनेमा के लिए खोली तिजोरी, मूक फिल्मों का सरताज रहा रंजीत स्टूडियो

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जामनगर के महाराजा ने सिनेमा के लिए खोली तिजोरी, मूक फिल्मों का सरताज रहा रंजीत स्टूडियो

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देश में फिल्मों के सबसे बड़े निर्माता केंद्र मुंबई के उन स्टूडियोज की हम इस सीरीज में बात कर रहे हैं जिनकी स्थापना ने इस शहर में सिनेमा के कई गौरवशाली अध्याय रचे। मुंबई जब बंबई हुआ करता था तो यहां फिल्म निर्माण का काम मरीन ड्राइव से लेकर दादर तक खूब हुआ करता था। इसी कड़ी में आज हम बात करेंगे एक ऐसे स्टूडियो की जहां सबसे ज्यादा मूक फिल्में बनाई गईं। इस स्टूडियो का नाम है रंजीत स्टूडियो। एक समय में कहा जाता था कि आसमान से ज्यादा सितारे रंजीत स्टूडियो में देखने को मिलते हैं। इसी स्टूडियो के बुलाने पर पृथ्वीराज कपूर जैसे बड़े कलाकार कोलकाता छोड़ कर मुंबई आए थे। यह वही स्टूडियो है जहां ‘सती सावित्री’, ‘अछूत’ और ‘तानसेन’ जैसी कई अपने दौर की सुपरहिट फिल्में बनीं। लेकिन, अब इस स्टूडियो का क्या हाल है, आइए जानने की कोशिश करते हैं…

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रंजीत स्टूडियो का इतिहास 

साल 1920 में गुजरात के जामनगर के एक व्यवसायी चंदू लाल शाह कपास के कारोबार के सिलसिले में मुंबई आए। वह बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में नौकरी करने लगे। समय बीता और वह फिल्मों की ओर झुकने लगे। 1925 में उन्हें लक्ष्मी फिल्म कंपनी के जरिए ‘विमला’ फिल्म का निर्देशन करने का मौका मिला। ‘विमला’ अच्छी चलने के बाद चंदू लाल ने 1925 में ही ‘पांच दादा’ फिल्म का निर्देशन भी लक्ष्मी फिल्म कंपनी के माध्यम से ही किया। अगले 2-3 साल उन्होंने ‘गुणसुंदरी’, ‘सुमारी ऑफ सिंध’ और ‘सती माद्री’ जैसी कई फिल्में बनाई। अब तक एक निर्देशक के तौर पर अपने उज्ज्वल भविष्य का सपना देखते रहे चंदूलाल ने  साल 1929 में मशहूर अभिनेत्री और गायिका गौहर खय्याम के साथ मिल कर रंजीत स्टूडियो की स्थापना की। गौहर खय्याम से ही चंदूलाल का ब्याह भी हुआ।

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महाराजा रणजीत सिंह ने की आर्थिक मदद

रंजीत स्टूडियो खोलने के लिए चंदूलाल ने जामनगर के मशहूर महाराजा रणजीत सिंह से आर्थिक मदद ली थी और इसी कारण कारण चंदूलाल स्टूडियो का नाम महाराजा रणजीत सिंह के नाम पर रखा था। रणजीत स्टूडियो रखा गया जो आगे चल रंजीत स्टूडियो के नाम से पुकारा जाने लगा।  1929 में अपनी शुरुआत के बाद रंजीत स्टूडियो में जो सबसे पहली फिल्म बनी उसका नाम है ‘भिखारन’। ‘भिखारन’ एक मूक फिल्म थी। 1929 से अगले चार साल तक रंजीत फिल्म कंपनी के बैनर तले 30 से अधिक मूक फिल्मों का निर्माण किया गया।  इन फिल्मों में ‘देशदीपक’, ‘रसीली राधा’, ‘शेखचिल्ली’, ‘लव एंगल’, शामिल रहीं।

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‘देवी देवयानी’ ने दिलाई शोहरत

रंजीत मूवीटोन भी रंजीत स्टूडियो का दूसरा नाम है। साल 1931 में इस फिल्म कंपनी में जो पहली टॉकी फिल्म बनी उसका नाम था ‘देवी देवयानी’। टॉकी फिल्में बनाने में भी रंजीत फिल्म कंपनी अव्वल दर्जे पर रही। कुछ साल में ही इस कंपनी ने ‘सती सावित्री’, ‘भूल भुलैया’ और ‘कृष्णसुदामा’ जैसी कई फिल्मों का निर्माण किया। रंजीत स्टूडियो में हिंदी के अलावा मराठी, पंजाबी और तेलुगू जैसी कई भाषाओं में भी फिल्में बनती थी। चंदूलाल शाह की किस्मत इतनी अच्छी थी कि वह कपास के धंधे से लेकर फिल्मों के धंधे तक जिस चीज में भी हाथ डालते थे वह हर चीज हिट हो जाती है।

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सट्टा बाजार ने लगाई नजर

चंदूलाल शेयर बाजार में कई बार ऐसे दांव भी खेलते थे जिसमें बड़ा नुकसान होने का जोखिम भी होता था। लेकिन उनको इस काम में रिस्क लेने में मजा आने लगा था और यहीं से शुरू हुआ रंजीत स्टूडियो का पतन। 40 के दशक में चंदूलाल कपास के सट्टे में एक ही दिन में एक करोड़ 25 लाख रुपये हार गए। इसके बाद कर्ज में डूबे चंदूलाल को स्टूडियो का ज्यादातर हिस्सा एशियन इंश्योरेंस कंपनी (अब भारतीय जीवन बीमा निगम) के पास गिरवी रखना पड़ा जिसको चंदूलाल कभी छुड़वा नहीं पाए। इतना सब होने के बाद भी रंजीत स्टूडियो में ‘औरत तेरी यही कहानी’, ‘फुटपाथ’, ‘पापी’, ‘बहादुर’ जैसी कई फिल्में बनी लेकिन कुछ खास असर नहीं छोड़ पाई।


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