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स्त्रियों में नृत्य का प्रचलन काफी समय बाद शुरू हुआ पर ओडिसी नृत्य का जन्म स्त्रियों द्वारा ही हुआ,
– फोटो : Amar Ujala Mumbai
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ओडिसी नृत्य की पहचान भारत के उड़ीसा प्रांत से है। यूं तो ठीक से कह पाना कि नृत्य शैली कितनी पुरानी है, संभव नहीं है पर देखा जा सकता है कि तंजौर के पुराने मंदिरों में जो नृत्य कलाकृतियां हैं, उनमें जो भंगिमाएं हैं, वे ओडिसी नृत्य का ही हिस्सा है।
ओडिसी नृत्य का जन्म
शास्त्रीय नृत्यों में पुरुषों का आधिपत्य रहा है। स्त्रियों में नृत्य का प्रचलन काफी समय बाद शुरू हुआ पर ओडिसी नृत्य का जन्म स्त्रियों द्वारा ही हुआ, इसलिए यह नृत्य माहरी के नाम से भी प्रचलन में आया। माहरी मतलब महान नारी। यह नृत्य देवदासियों द्वारा मंदिर प्रांगण में शुद्ध भाव से होता आया। वे प्रभु को नृत्य समर्पित करने के लिए ही इसे करती थीं क्योंकि उनका विवाह देवताओं से हो जाता था। 16वीं शताब्दी के आसपास जब महमूद गजनवी ने उड़ीसा के मंदिरों को तोड़ा तो माहारिओं के दुर्व्यवहार बढ़ा और इसके चलते यह नृत्य एवं माहारियां दोनों ही हाशिये पर होती चली गईं।
कालांतर में चैतन्य महाप्रभु ने नृत्य को पल्लवित किया। चैतन्य महाप्रभु के आगमन के साथ माहरी नृत्य फिर जीवित हो उठा उन्होंने माहारी एवं नृत्य आचार्य के माध्यम से छोटी उम्र के लड़कों को नृत्य सिखाया जिनकी आयु 15 वर्ष से अधिक न हो, उन्हें गोटीपुआ कहा जाने लगा। लड़कियों की वेशभूषा में ये छोटे लड़के मंदिर प्रांगण में नृत्य करते थे जोकि दीयो की रोशनी में होता था जिसमें गीत गोविंद और नाट्य शास्त्रों के अंग समाहित होते थे।
ओडिसी एक उच्च शैली का नृत्य है और नाट्य शास्त्र व अभिनय दर्पण पर आधारित है। इसने जदुनाथ सिन्हा रचित अभिनय दर्पण प्रकाश, राजमणि पात्र रचित अभिनय चंद्रिका और महेश्वर महापात्रा की अभिनय चंद्रिका से बहुत कुछ प्राप्त किया है।
भारत के अन्य भागों की तरह रचनात्मक साहित्य ने ओडिसी नर्तकियों को भी प्रेरित किया और नृत्य के लिए विषय प्रदान किए। यह विशेष रूप से जयदेव रचित 12वीं शताब्दी के गीत गोविंदा से भी प्रेरणा लेता रहा है। नायक नायिका भाव के एक उल्लेखनीय उदाहरण के चलते ये अपनी काव्यात्मक और शैलीगत सामग्री में अन्य कविताओं से आगे है। कृष्ण के लिए कवि की भक्ति कार्य के माध्यम से व्याप्त है। ओडिसी नाट्य शास्त्र द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का बारीकी से पालन इसमें होता है।
ओडिसी में लास्य अंगों के साथ-साथ भाव पक्ष भी अत्यधिक सुंदर होता है जिसका श्रेय गुरु केलुचरण महापात्र को जाता है, जिस तरह से उनकी अद्भुत भाव भंगिमा देखकर साक्षात नटवर का रूप दिखाई देता था और ओडिसी का भाव पक्ष काफी मजबूत होने के कारण और भी शास्त्रीय नृत्य को आकर्षित करता है।
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