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Monsoon: इस साल मॉनसून में आने में होगी देरी, एक की जगह चार जून को केरल में हो सकती है एंट्री

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Monsoon: इस साल मॉनसून में आने में होगी देरी, एक की जगह चार जून को केरल में हो सकती है एंट्री

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Slight delay in onset of monsoon over Kerala; arrival likely on Jun 4: IMD

Monsoon
– फोटो : Istock

विस्तार

वर्ष 2023 के मॉनसून पर मौसम विभाग (IMD) ने नया अपडेट जारी किया है। मौसम विभाग के मुताबिक देश में मॉनसून की शुरुआत में इस साल देरी हो सकती है। आमतौर पर देश में 1 जून तक केरल में मॉनसून की एंट्री होती है। लेकिन, इस बार ये 4 जून तक दस्तक देगा। मौनसून में देरी का असर देश में आम लोगों और खेती-बाड़ी पर पड़ सकता है।

मौसम विभाग (IMD) ने अपने पिछले अनुमान में बताया था कि इस साल देश में मॉनसून सामान्य रह सकता है। इस साल औसतन 96% बारिश होने का अनुमान है। वेदर रिपोर्ट जारी करने वाली प्राइवेट एजेंसी स्काईमेट ने भी कहा है कि इस साल मॉनसून आने में देरी हो सकती है। स्काईमेट के फाउंडर-डायरेक्टर जतिन सिंह के मुताबिक, इस बार मॉनसून केरल में 1 जून के बजाए 7 जून तक दस्तक दे सकता है। स्काईमेट के अनुसार उत्तर भारत में 18 मई को मौसम में बदलाव दिख सकता है और आंधी आ सकती है।

अगले सात दिनों तक पारा चढ़ेगा पर हीटवेव की उम्मीद नहीं

मई के पहले पखवाड़े में पश्चिमी विक्षोभ के कारण लू की स्थिति कम गंभीर थी। इस वक्षोभ ने उत्तर-पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों को प्रभावित किया था। चूंकि अगला पश्चिमी विक्षोभ उत्तर-पश्चिम भारत की ओर बढ़ रहा है, इसलिए अगले 7 दिनों तक इन इलाकों में हीटवेव की स्थिति की उम्मीद नहीं है। हालांकि इस दौरान तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने यह बात कही है। 

एनसीआर में धूल भरी हवाओं का ये है कारण

आईएमडी दिल्ली के कुलदीप श्रीवास्तव ने कहा है कि हरियाणा, दक्षिण हरियाणा, दिल्ली एनसीआर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तर-पूर्वी राजस्थान में धूल भरी हवाएं चल रही हैं। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि एक पश्चिमी विक्षोभ गुजर गया जिससे तेज हवाएं चल रही हैं। इसके अलावा पिछले सप्ताह तापमान काफी अधिक था, ज्यादातर जगहों पर पारा 40 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक हो गया था। इससे  वातावरण शुष्क है और गर्म वातावरण के कारण मिट्टी ढीली हो गई है। यही कारण है कि 40-45 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली हवाएं सतह से धूल उठाकर वातावरण में फैल रही हैं। यह मुख्य रूप से ये 1-2 किमी की ऊंचाई तक फैल रही हैं।

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