Home Breaking News शाहरुख से पहली बार ‘पठान’ के शो पर ही मिली मैं, उनमें जरा सा भी घमंड नहीं है सुपरस्टार होने का

शाहरुख से पहली बार ‘पठान’ के शो पर ही मिली मैं, उनमें जरा सा भी घमंड नहीं है सुपरस्टार होने का

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शाहरुख से पहली बार ‘पठान’ के शो पर ही मिली मैं, उनमें जरा सा भी घमंड नहीं है सुपरस्टार होने का

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‘जावेदा जिंदगी’ से अपने करियर की शुरुआत करने वाली पार्श्वगायिका शिल्पा राव ने अपनी आवाज से संगीत जगत में एक अलग पहचान बनाई है। झारखंड से मुंबई शहर तक अपना नाम बनाने में उन्हें 15 साल लग गए। शिल्पा अपने इस पूरे सफर का श्रेय अपने पिता एसवी राव को देती हैं क्योंकि पहले गुरु के तौर पर उनके पिता ने ही उनकी संगीत शिक्षा की नींव रखी। आइए जानते हैं ‘अमर उजाला’ से एक खास बातचीत में शिल्पा ने अपने अब तक के सफर के बारे में बात की।

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फिल्म अनवर के गाने ‘जावेदा जिंदगी’ से आपने शुरुआत की और आज आपके गाने हर व्यक्ति की जुबान पर है। ये 15 साल आपके लिए कैसे रहे ?

मैं अपने आपको बहुत ही खुशनसीब मानती हूं कि मुझे इतने महान लोगों के साथ काम करने का मौका मिला। मैंने जिन भी लोगों के साथ काम किया है वह ऐसे लोग हैं जिनसे मैंने संगीत से लेकर जीवन के बारे में बहुत सी चीजें सीखी हैं। आज जो देश दुनिया से मुझे प्यार मिल रहा है उसके लिए मैं बहुत ही आभारी हूं। लेकिन मेरा मानना है कि यह जो मैंने इतने साल में किया है उसको मैं अकेले नहीं कर सकती थी। मुझे लगता है कि कोई भी व्यक्ति अकेले आगे नहीं बढ़ सकता है। मेरे साथ कई लोग रहे जिन्होंने मुझे यहां तक पहुंचने में मदद की है।

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वे कौन लोग हैं जिन्होंने आपकी मदद की?

लोगों की लिस्ट तो बहुत ही लंबी है। हरिहरन जी के बारे में तो आप लोग जानते ही होंगे। क्योंकि मैं उनका नाम अक्सर लेती ही रहती हूं। इनके अलावा उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान साहब, मिथुन, शंकर महादेवन सहित कई लोग हैं। अगर और लोगों की बात करूं तो विशाल और शेखर, सिद्धार्थ आनंद, प्रीतम जैसे लोगों ने मुझे शुरुआत में काफी कुछ सिखाया है।

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आपने संगीत की तालीम किससे ली? और आप संगीत में किसको अपना गुरू मानती हैं?

मेरे सबसे पहले गुरु मेरे पिता रहे हैं। उन्होंने मुझे बहुत बचपन से ही शास्त्रीय संगीत की तालीम देना शुरू कर दिया था। आज मैं जो कुछ भी हूं उसमें बहुत बड़ा हिस्सा उनका है। उसके बाद हरिहरन जी, गुलाम मुस्तफा खान जी से भी काफी कुछ सीखा। इन्हीं लोगों से मैं बचपन से संगीत सीखती आ रही हूं। आज भी कुछ पूछना होता है या रियाज करना होता है तो मैं हरिहरन जी के पास जाती हूं।  मुझे लगता है पूरी जिंदगी इन लोगों की शिष्या बनी रहूंगी। क्योंकि हम सभी पूरी जिंदगी किसी न किसी से कुछ ना कुछ सीखते हैं।

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संगीत को पेशा बनाना है यह कब सोचा

दरअसल कभी सोचा नहीं था। यह तो बस हो गया। मैं संगीत में जहां हूं वह बचपन की तालीम की वजह से ही है। अगर मैने तब संगीत नहीं सीखा होता तो मैं संगीत में अपना करियर नही बना पाती। बचपन में ही मुझे शास्त्रीय संगीत और गजल की तालीम मिली है। जिसकी मदद से मैं अच्छा कर पा रही हूं। मुझे लगता है जिन लोगों को भी संगीत में अपना करियर बनाना है उनको अगर हो सके तो बचपन से ही संगीत सीखना चाहिए। और संगीत से प्रेम होना बहुत जरूरी है। मैं इतने साल से काम कर रही हूं लेकिन कभी लगा ही नहीं कि मैं काम कर रही हूं। क्योंकि संगीत तो मेरा प्यार था। और बहुत कम लोगों के साथ ऐसा होता है कि जो उनको पसंद है वो मिल जाए।

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