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लालू प्रसाद के साथ सीएम नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव।
– फोटो : अमर उजाला
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देश की नरेंद्र मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने के दावे के साथ तैयार होने का प्रयास कर रही विपक्षी एकता का नेता कौन होगा? पिछले दिनों जातियों के एक नेता ने यह कह दिया कि 12 जून को पटना में विपक्षी नेताओं की बैठक में तय हो जाएगा कि नीतीश कुमार नेतृत्व करेंगे। लेकिन, जानकारी यह भी आ रही है कि कांग्रेस अब भी इसके लिए फ्रंट पर नहीं है। मतलब, कांग्रेस को छोड़ बाकी विपक्षी दल इस बैठक में आगे-आगे रहेंगे। राहुल गांधी या मल्लिकार्जुन खरगे इस बैठक में नहीं आ रहे और सिर्फ बिहार स्तर के नेता रहे तो कांग्रेस की भागीदारी संशय में रहेगी। ऐसे में एक नई संभावना दिखाई देने लगी है। यह संभावना इसलिए भी मजबूत हो रही क्योंकि विपक्षी एकता के लिए प्रयास कर रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से ज्यादा कांग्रेस में पूर्व रेल मंत्री रहे और राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की स्वीकारता है। 12 जून को होने वाली बैठक से पहले लालू जिस तेजी से एक्टिव हुए हैं और फिट नजर आ रहे हैं, से संभावना बन रही है कि विपक्ष के ध्रुवीकरण में नीतीश की जगह वही कमान संभालेंगे। कमान का मतलब, किंग मेकर का रूप लिए नजर आ सकते हैं लालू प्रसाद। लालू पहले भी ऐसी भूमिका निभा चुके हैं।
1998 में कांग्रेस ने लालू यादव से हाथ मिला लिया
महागठबंधन में तालमेल बनाए रखने के लिए लालू प्रसाद अहम कड़ी हैं, यह बात नीतीश कुमार अच्छी तरह जानते हैं। 30 साल पहले बिहार में कांग्रेस मुख्य विपक्ष दल थी। 1990 में कांग्रेस विधानसभा चुनाव हार गई। 1990 से 1995 में बिहार में सामाजिक परिवर्तन हुए। पहली बार पिछड़ी जातियों की भागीदारी बिहार की सियासत में बढ़ी। इस दौरान लालू प्रसाद यादव मजबूत होते गए और कांग्रेस कमजोर। आलम यह हुआ कि कांग्रेस को बिहार में सियायत के लिए लालू प्रसाद की जरूरत पड़ी। 1998 में कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी ने लालू यादव के साथ हाथ मिला लिया। तब से (2000 का विधानसभा चुनाव छोड़कर) अब तक लालू यानी राजद और राजद गठबंधन में है।
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