Home Breaking News Manipur: पुलिस शस्त्रागार से लूटे 6000 हथियारों में से केवल 868 ही वापस, कौन बांध रहा है सुरक्षा बलों के हाथ?

Manipur: पुलिस शस्त्रागार से लूटे 6000 हथियारों में से केवल 868 ही वापस, कौन बांध रहा है सुरक्षा बलों के हाथ?

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Manipur: पुलिस शस्त्रागार से लूटे 6000 हथियारों में से केवल 868 ही वापस, कौन बांध रहा है सुरक्षा बलों के हाथ?

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केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक जून को मणिपुर में पुलिस शस्त्रागार से लूटे गए हजारों हथियारों और गोली बारूद को वापस जमा कराने की अपील की थी। उनकी अपील के एक ही दिन बाद लगभग 140 हथियार जमा करा दिए गए। हालांकि कुछ जगहों से हथियारों के गायब होने की सूचना भी मिली। मणिपुर में तैनात सुरक्षा बलों के एक अधिकारी के मुताबिक, अभी स्थिति बहुत चिंताजनक है।

मणिपुर में पुलिस शस्त्रागार से लूटे गए 6000 से ज्यादा हथियारों में से अभी तक 868 भी वापस नहीं आ सके हैं। आठ जून से सुरक्षा बलों द्वारा एक बड़ा सर्च ऑपरेशन शुरू होगा। उस दौरान जिस किसी व्यक्ति के पास हथियार मिलेंगे, उसके खिलाफ आईपीएस की धाराओं के तहत कार्रवाई होगी। इंफाल और उसके आसपास के कुछ इलाकों में रोड ब्लॉक होने के कारण, सुरक्षा बलों को आगे बढ़ने में दिक्कतें आ रही हैं। भले ही मीडिया में यह बात प्रमुखता से सामने आई हो कि वहां पर ‘शूट एट साइट’ के आदेश दिए गए थे, लेकिन कई मामलों में सुरक्षा बलों के हाथ बंधे हुए नजर आए।

मणिपुर में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का तीन दिवसीय दौरा एक जून को समाप्त हो गया था। उन्होंने लोगों से अपील की थी कि जिनके पास लूटे गए हथियार हैं, उन्हें पुलिस को सौंप दें। इसके बाद सुरक्षा बलों का कॉम्बिंग ऑपरेशन शुरू होगा। तलाशी अभियान के दौरान लोगों के पास से हथियार बरामद होता है, तो उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। तीन मई को उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह मैती समुदाय को जनजाति का दर्जा देने की मांग पर विचार करे। इस बाबत चार माह में एक प्रस्ताव तैयार कर उसे केंद्र सरकार के पास भेजा जाए। इसके बाद मणिपुर में हिंसा भड़क गई। मणिपुर में मौजूद सुरक्षा बलों के सूत्रों का कहना है कि शुरुआत में ऐसा लग रह था कि वहां पर पर्याप्त संख्या में फोर्स नहीं हैं। पांच मई के बाद मणिपुर में सेना, असम राइफल, सीआरपीएफ, बीएसएफ और लोकल पुलिस कमांडो को तैनात किया गया।

सुरक्षा बलों की तैनाती के बाद हिंसा होती रही

मणिपुर के विभिन्न हिस्सों में सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बावजूद हिंसा होती रही। कई जगहों से हथियार लूटे गए। ऐसे आरोप भी लगे कि पुलिस कमांडो ने हिंसा में शामिल एक समूह का साथ दिया। पुलिस थानों से दिन दहाड़े हथियारों की लूट की गई। हिंसा में शामिल दो प्रमुख समूह ‘कुकी और मैतेई’ की ओर से एक दूसरे पर आरोप लगाया गया। हिंसा होने के तीन दिन के भीतर ही लगभग 40 हजार लोगों को कैंपों में शरण लेनी पड़ी। शुरुआत में बताया गया कि कुकी समुदाय को मैतेई समूहों ने भारी नुकसान पहुंचाया है। हालांकि ऐसे ही कुछ आरोप, मैतेई समूह ने कुकी समुदाय पर लगाए हैं। मणिपुर में पांच मई तक करीब 5200 हथियार लूटे जा चुके थे। अब इन हथियारों की वापसी कराना, सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी चुनौती है। सूत्रों के मुताबिक, इंफाल के आसपास लोगों ने सड़कों पर बाधाएं खड़ी कर दीं। इससे सैन्य बलों को आगे बढ़ने में दिक्कतें आई। गृह मंत्री अमित शाह ने भी लोगों से अपील की थी कि वे रास्तों को ब्लॉक न करें। कुकी समूहों के लोगों का कहना था कि रोड ब्लॉक करने का काम मैतेई समुदाय ने किया है। हिल में करीब डेढ़ सौ गांवों को जला दिया गया। आरोप है कि वहां पर मैतेई समुदाय के लोग कुकी के गांवों पर कब्जा कर रहे हैं। इंफाल वेस्ट में हालात अच्छे नहीं हैं।

राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी

सेंटर फॉर इंडिक स्टडीज की पूर्व सहायक प्रोफेसर और नॉर्थ ईस्ट स्टडी में विशेषज्ञता हासिल करने वाली डॉ. अंकिता दत्ता बताती हैं, मणिपुर में हिंसा रोकने का एक ही हल है। वह है राजनीतिक इच्छा शक्ति का परिचय देना। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार को आगे आना होगा। जांच आयोग गठित होने से कुछ लोगों को सजा मिलेगी, लेकिन उससे भविष्य में हिंसा नहीं होगी, इसकी गारंटी नहीं है। मूल समस्या तो जस की तस रहेगी। अगर राज्य सरकार, हाई कोर्ट के निर्णय पर आगे बढ़ती है, तो दोबारा से हिंसा हो सकती है। ये गंभीर मामला है। इसे हल्के में नहीं ले सकते। सरकार को, कुकी, मैतेई और नगा समुदाय के लोगों को साथ लेकर आगे बढ़ना होगा। हर समय सेना या अर्धसैनिक तैनात नहीं किए जा सकते हैं। सरकार को अभी तक हुए ‘कुकी’ समझौतों की समीक्षा करनी चाहिए। अगर सरकार ने अपनी जमीन पर अवैध तौर से बने चर्च नष्ट किए हैं तो उसके लिए मैतेई यानी हिंदुओं के मंदिरों को क्यों निशाना बनाया गया। मणिपुर में यह देखने की जरूरत है कि वहां पर ‘नेरेटिव’ क्या चल रहा है। असम में बांग्लादेशी आ जाते हैं, क्योंकि वहां पर पोरस बॉर्डर है। ऐसा ही कुछ हाल मणिपुर का भी है। कई तरह के ‘हिडन एजेंडे’ चल रहे हैं। मैतेई के पास जमीन नहीं है, भले ही उनकी संख्या करीब 53 फीसदी है। उन्हें हिल में जमीन खरीदने या बसने का अधिकार नहीं है। कुकी व नगा, जिनकी संख्या कम है, मगर वे राज्य के लगभग 85 फीसदी हिस्से पर काबिज हैं। वे कहते हैं कि पॉलिटिकल पॉवर तो ‘मैतेई’ समुदाय के पास है। ऐसे में उन्हें जनजाति का दर्जा नहीं मिलना चाहिए।

लूटे गए हथियार, कितने किसके पास हैं

यहां भी दोनों समुदायों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाया है। सुरक्षा बलों के पुख्ता सूत्र बताते हैं कि अभी पांच हजार हथियारों का कुछ अता-पता नहीं है। करीब बीस फीसदी हथियार ‘कुकी’ समुदाय के पास तो अस्सी फीसदी हथियार ‘मैतेई’ लोगों के कब्जे में हैं। एक सप्ताह में सरेंडर करने की बात कही गई। सात जून को यह अवधि खत्म हो रही है। कई क्षेत्रों में कर्फ्यू है, मगर वहां पर इसे सख्ती से लागू नहीं किया जा सका। इस मामले में भी ‘कुकी बनाम मैतेई’ सामने आ जाता है। खासतौर पर स्टेट कैपिटल से लगते इलाकों में ‘कर्फ्यू’ प्रभावहीन हो रहा है। यह अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वहां पर सुरक्षा बलों को आगे नहीं बढ़ने दिया जा रहा। कर्फ्यू में कैसे कोई सड़क बाधित कर सकता है। सूत्रों के अनुसार, दरअसल वहां के हिंसाग्रस्त इलाकों में सुरक्षा बलों को पूरी छूट नहीं दी गई है। इसके पीछे कारण कोई भी हो सकता है। कुछ ऐसी खबरें भी सामने आ रही हैं कि पुलिस से जुड़े लोग कथित तौर पर गांव जला देते हैं। वे उग्रवादी के वेश में रहते हैं। इसके बाद जब वहां के लोग किसी कैंप में शरण लेते हैं, तो पीछे से एक समुदाय विशेष, गांव पर कब्जा कर लेता है। उन लोगों के पास हथियार भी होते हैं। यहां की समस्या का निवारण करना है तो उसके लिए राष्ट्रपति शासन बेहतर विकल्प है।

हिल को नगा और कुकी में बांट दिया जाए

सुरक्षा बलों में तैनात एक अधिकारी जो, मणिपुर के निवासी हैं, बताते हैं कि हिंसा से बचाव का एक ही तरीका है, हिल को नगा और कुकी के बीच विभाजित कर दिया जाए। ऐसा करना जरूरी है। यहां पर कुकी और मैतेई, हर बात में एक दूसरे से कट चुके हैं। पुलिस और दूसरे सरकारी महकमों में मैतेई ज्यादा हैं, तो वे कुकी समुदाय के लोगों का काम नहीं करते। यही वजह है कि अभी तक मणिपुर में सुरक्षा बलों का ज्वाइंट ऑपरेशन संभव नहीं हो पा रहा। पहाड़ी क्षेत्र को छठे शेड्यूल में शामिल किया जाए। उत्तर-पूर्व में मणिपुर को छोड़कर बाकी जगह छठा शेड्यूल लागू है। इसके लिए तीनों समुदायों से बातचीत करनी होगी। कुछ समय पहले ‘नगा’ समुदाय के कुछ विधायकों की मुलाकात गृह मंत्री शाह से हुई थी। मणिपुर को पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने से पहले यह प्रपोजल चला था कि पहाड़ को नगा व कुकी में बांटा जाए। हालांकि बाद में वह प्रपोजल ठंडे बस्ते में चला गया।

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हिल डिस्ट्रिक्ट काउंसिल का प्रस्ताव भी लागू नहीं हो सका। स्वायत क्षेत्र की योजना को जानबूझकर आगे नहीं बढ़ाया गया। सूत्रों के मुताबिक, म्यांमार से लगते बॉर्डर पर घुसपैठ को पूरी तरह रोकना होगा। हालांकि कुकी समुदाय के लोग यह बात सही मानते कि अधिकांश लोग घुसपैठ करके यहां आए हैं। ऐसे लोगों की संख्या दो चार फीसदी हो सकती है। घाटी में विकास हो रहा है और हिल पर गांव वालों को कुकी मिलिटेंट बता देना, समस्या का हल नहीं है। कुकी समझौतों को दोबारा से जांचने की जरूरत है। मैतेई समुदाय को भी अगर हिल में थोड़ा बहुत यानी एक सीमित मात्रा में बसने या जमीन खरीदने की इजाजत मिलती है तो उसका विरोध उतना नुकसानदायक नहीं होगा, जितना अब हिंसा से हुआ है।

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