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MHA Chintan Shivir
– फोटो : Amar Ujala/Sonu Kumar
विस्तार
केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (सीएपीएफ) और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) में तैनात भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) के अधिकारियों का चिंतन शिविर सोमवार को नई दिल्ली में आयोजित हुआ। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने चिंतन शिविर की अध्यक्षता की। इस दौरान सीमा सुरक्षा, क्षमता निर्माण, कनिष्ठ अधिकारियों का मार्गदर्शन, मिशन भर्ती, आयुष्मान सीएपीएफ की निगरानी, प्रशिक्षण, सीएपीएफ ई-आवास पोर्टल, अवसंरचना परियोजनाओं की निगरानी, कल्याण और श्रेष्ठ परिपाटियों सहित कई मुद्दों पर चर्चा की गई। सीएपीएफ के पूर्व अफसरों ने इस शिविर की प्रासंगिकता पर कई सवाल खड़े किए हैं। इनका कहना है कि जब सीएपीएफ के जवान से लेकर ग्राउंड कमांडर तक और दूसरे रैंक वाले कैडर अफसरों को इस शिविर में बुलाया ही नहीं जाता, तो फोर्स में मौजूद समस्याओं की सही जानकारी गृह मंत्रालय तक कैसे पहुंचेगी। शिविर में यदि हर रैंक का एक प्रतिनिधि शामिल हो तो ही जमीनी सच्चाई बाहर आ सकती है।
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तभी ‘क्वॉलिटी ऑफ इंटरेस्ट’ में फर्क मालूम पड़ता है
बीएसएफ के पूर्व एडीजी एसके सूद बताते हैं, उन अफसरों को इस शिविर में बुलाया जाना चाहिए, जिन्हें केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की गहराई से जानकारी हो। चाहे कोई भी फोर्स हो, उसमें ऑपरेशनल ट्रूप्स और सिस्टम, बहुत अहम होता है। इसके बारे में ग्राउंड कमांडर को ही ज्यादा मालूम होता है। वजह, ये लोग जवानों के सीधे कॉन्टैक्ट में होते हैं। बॉर्डर या किसी दूसरे क्षेत्र में किसी भी ऑपरेशन के दौरान कौन सी दिक्कतें आ रही हैं, उन्हें ग्राउंड कमांडर बेहतर तरीके से जानते और समझते हैं। जवानों की निजी समस्याएं भी होती हैं। ऐसे में अगर इनके प्रतिनिधियों को भी चिंतन शिविर में बुलाया जाए तो उसके ज्यादा सार्थक नतीजे सामने आ सकते हैं। अगर इन्हें मौका मिलता है तो ‘क्वॉलिटी ऑफ इंटरेस्ट’ में फर्क मालूम पड़ता है। प्रैक्टिकल सॉल्यूशन मिलने की अधिक संभावनाएं रहती हैं। जवानों या कैडर अफसरों की पदोन्नति, छुट्टी, रहन सहन और ऑपरेशनल सिचुएशन को किस तरह से इंप्रूव कर सकते हैं, आदि समस्याओं के हल में मदद मिल सकती है।
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