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फिल्म ‘तानाजी द अनसंग वॉरियर’ के बाद इसके निर्देशक ओम राउत ने जब दक्षिण के सितारे प्रभास के साथ फिल्म ‘आदिपुरुष’ बनाने का एलान किया, तभी से सबके मन में एक ही प्रश्न रहा और वह रहा कि आखिर रामकथा पर बनने वाली फिल्म का नाम भला ऐसा क्यों हैं? सनातन धर्म में आदिपुरुष मनु माने जाते हैं और प्रथम महिला शतरूपा। लेकिन, मर्यादा पुरुषोत्तम को एक नया नाम देने की कोशिश और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं के एक समूह के साथ विचार मंथन ने ओम को ये नाम सुझाया। उद्देश्य रहा कि राम को 140 करोड़ जन मानस के समक्ष एक ऐसे पुरुष के रूप में प्रस्तुत किया जाए जहां से मानव अवतारों की श्रृंखला का प्रारंभ माना जा सके। दूषित विचार बीज से जन्मी ये कल्पना अब सिनेमाघरों में पहुंच चुकी है और इसका खाद पानी ऐसा है कि दर्शकों को इसमें हरियाली तलाश करने पर भी नहीं मिल रही। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर इस फिल्म का तारतम्य दर्शकों से क्यों नहीं बंध पा रहा…
राम के बालरूप का अभाव
फिल्म ‘आदिपुरुष’ वहां से शुरू होती है जहां राम को वनवास मिलता है। फिल्म में राम के बालरूप का गुणगान ही नहीं है जबकि उनका जन्म, माता और पिता का स्नेह, बाल रूप राम की चंचलता, उनको मिला वात्सल्य और उनका ऋषियों के साथ जाकर तपस्थली की रक्षा करना ही राम कथा का मूल आधार रहा है। बालरूप की लीलाओं का विस्तार न होने से फिल्म के साथ जो एक स्वाभाविक जुड़ाव दर्शकों का होना चाहिए, वह यहां लापता है।
राम, सीता, लक्ष्मण के नाम
‘जहां राघव वहां विजय’ का नारा प्रतिस्थापित करने की कोशिश करने वाली फिल्म का कथा विस्तार करते समय इसके पटकथा लेखकों ने जनमानस में व्याप्त लोकाचारों को भी पूरी तरह अनदेखा किया। यहां तक कि फिल्म में प्रमुख चरित्रों के नाम भी राम, सीता, लक्ष्मण के स्थान पर राघव, जानकी और शेष रखे गए हैं। इन कम प्रचलित नामों से चरित्रों का एक दूसरे को संबोधन भी दर्शकों को भाव विह्वल होने के मौके कम ही देता है। हनुमान को भी पूरी फिल्म में बार बार बजरंग कहकर ही संबोधित किया गया है।
कथा के विस्तार में विसंगतियां
एक बात तो तय है कि फिल्म ‘आदिपुरुष’ बनाने वालों ने न तो वाल्मीकि रामायण ढंग से पढ़ी है और न ही रामचरित मानस। फिल्म के नेपथ्य में बजने वाली चौपाइयां समय से पहले ही संदर्भ में आ जाती हैं और जब इनका प्रसंग आता है तो इनका कहीं कोई अता पता नहीं। जैसे, हनुमान जब सीता का पता लगाने समुद्र लांघने के लिए उछलते हैं तो फिल्म में उनकी यात्रा निर्बाध संपन्न होती है। और, प्रचलित कथाओं के अनुसार मैनाक को स्पर्श करते हुए आने वाली दोहे का अंश ‘राम काजु कीन्हें बिना मोहि कहां विश्राम’ फिल्म में किसी दूसरे संदर्भ में बज जाता है।
अजय-अतुल का संगीत ज्ञान
मराठी और हिंदी फिल्मों के संगीतकार अजय-अतुल लोक धुनों के जानकार माने जाते हैं। लेकिन, अवध से शुरू होकर दण्डकारण्य होते हुए दक्षिण में रामेश्वरम तक यात्रा करने वाली रामकथा के मूल संगीत तत्व को पहचानने में अजय-अतुल चूक गए। वह राम और सीता के बीच के प्रेम को दिखाने के लिए जो गाना रचते हैं, उसमें साढ़े सात हजार साल पहले की संगीत ध्वनियां नहीं है। पार्श्वसंगीत में भी जिस तरह के जयघोष या दंभ नाद सुनाई देते हैं, वे पौराणिकता से दूर और पाश्चात्य फिल्मों के संगीत के करीब लगते हैं।
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