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बंगलूरू में विपक्षी दलों की बैठक से पूर्व पहले तो सड़कों पर नीतीश कुमार को परेशान करने वाले पोस्टर लगे और बाद में उन्हें विपक्षी खेमे का राष्ट्रीय संयोजक भी नहीं बनाया गया। भाजपा और उनके समर्थकों के मुताबिक, इससे नाराज नीतीश कुमार पटना लौट आए। विपक्षी एकता को चोट न पहुंचे, इसे देखते हुए विपक्षी दलों के साथ-साथ स्वयं नीतीश कुमार भी अपनी वापसी पर सफाई दे चुके हैं, लेकिन कहा जा रहा है कि बंगलूरू की सड़कों पर लगे नीतीश कुमार विरोधी पोस्टर अनायास नहीं थे। यह पोस्टर किसने लगाए यह पता नहीं चल सका।
भाजपा और कांग्रेस दोनों ने एक दूसरे का हाथ इन पोस्टरों के पीछे बताया। भाजपा नेताओं के मुताबिक, ये कांग्रेस का तरीका था, जिसके माध्यम से नीतीश कुमार को बता दिया गया कि वह उन पर आंख बंद करके विश्वास करने के लिए तैयार नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस नेतृत्व उनकी भाजपाई खेमे से दूसरे चैनल से हो रही बातचीत से पूरी तरह वाकिफ भी है और सतर्क भी।
पटना के बाद बंगलूरू बैठक में भी उन्हें इंडिया के राष्ट्रीय संयोजक के तौर पर जगह न मिलना भी यह बताता है कि इंडिया में उनकी भूमिका सीमित रहने वाली है। इन आशंकाओं में कितना दम है कि नीतीश कुमार एक बार फिर एनडीए खेमे में पलटी मार सकते हैं? कांग्रेस के मुताबिक, यह भाजपाई प्रचार तंत्र की रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य बिहार में अपनी कमजोर रणनीति को मजबूत करना या विपक्ष में फूट डालने की कोशिश है। एनडीए के एक नेता के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अभी भी नीतीश कुमार को लेकर नरम हैं, लेकिन गृह मंत्री और भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह अब नीतीश कुमार की राजनीति को बिहार में परास्त करके खत्म करने पर आमादा हैं।
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