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सामाजिक कार्यकर्ता बिंदेश्वर पाठक और सुलभ इंटरनेशनल
– फोटो : अमर उजाला
विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2014 में लालकिले की प्राचीर से स्वच्छ भारत अभियान का एलान किया था और हर घर शौचालय बनाने का संकल्प लिया था, ताकि खुले में शौच को रोका जा सके। हालांकि, स्वतंत्र भारत में खुले में शौच और शौचालय को लेकर चिंतित होने वाले प्रधानमंत्री मोदी पहले व्यक्ति नहीं थे। सुलभ शौचालय के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने वर्ष 1970 में ही इस बात को महसूस किया था कि शुष्क शौचालयों और सिर पर मैला ढोने की कुप्रथा को समाप्त किया जाए। उन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर सुलभ शौचालय बनाने की शुरुआत की।
बिंदेश्वर पाठक का योगदान
आज देश में हजारों सुलभ शौचालय हैं, जिनमें 2 करोड़ से अधिक लोग प्रतिदिन शौच, स्नान जैसी जरूरतों को पूरा करते हैं। शुष्क शौचालय को समाप्त करने की दिशा में देश में नई क्रांति लाने वाले डॉ. बिंदेश्वर पाठक अब हमारे बीच नहीं हैं। जब देश स्वतंत्रता की 77वीं वर्षगांठ बना रहा था, तब 80 वर्षीय शौचालय क्रांति के अग्रदूत ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
वर्ष 1943 में जन्मे डॉ. बिंदेश्वर पाठक बिहार के वैशाली जिले के गांव रामपुर बघेल के निवासी थे। उनके पिता आयुर्वेदाचार्य और दादा ज्योतिषी थे। डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वो अपनी मां योगमाया देवी के ज्यादा करीब थे। उनकी मां ने ही उन्हें दूसरों की मदद करने की शिक्षा दी। उनकी मां कहा करती थीं कि कोई व्यक्ति यदि मदद के लिए आए तो उसे वापस नहीं भेजना चाहिए। व्यक्ति खुद के लिए नहीं, बल्कि दूसरों की मदद के लिए पैदा होता है। यही बात बालक बिंदेश्वर ने गांठ बांध ली थी और उसे जीवन भर निभाया।
डॉ. बिंदेश्वर पाठक की प्रारंभिक शिक्षा गांव में हुई। फिर वो बिहार की राजधानी पटना चले गए, जहां से उन्होंने बी.एन. कॉलेज से समाजशास्त्र में स्नातक किया। स्नातक की डिग्री लेने के बाद वो शिक्षक बन गए। हालांकि, कुछ ही दिनों में वो पटना में गांधी शताब्दी समारोह समिति के भंगी-मुक्ति प्रकोष्ठ में बतौर स्वयंसेवक जुड़ गए। वैसे, यह उनका लक्ष्य नहीं था।
इधर वे मध्यप्रदेश में सागर यूनिवर्सिटी से क्रिमिनोलॉजी में मास्टर डिग्री करना चाहते थे, लेकिन गांधी शताब्दी समारोह समिति के दो लोगों के कहने पर वो पटना में रुकने के लिए राजी हो गए, क्योंकि यहां उन्हें अच्छे वेतन का आश्वासन दिया गया था। इस बीच, सागर यूनिवर्सिटी में दाखिले की तारीख निकल गई और डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने समिति में बने रहने का निर्णय किया।
समिति के जनरल सेक्रेटरी सरयू प्रसाद ने डॉ. बिंदेश्वर पाठक को मानवाधिकारों और छुआछूत पर काम करने के लिए बिहार के बेतिया जिले में भेजा। एक साक्षात्कार में डॉ. पाठक ने बताया था कि बेतिया में कार्य करने के दौरान एक वाक्या ऐसा हुआ, जिसने उनके मन-मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ी।
एक दिन बाजार में एक सांड ने एक बच्चे पर हमला कर दिया। वहां मौजूद लोग और वो कुछ साथियों के साथ बच्चे को बचाने दौड़े, तभी किसी ने कह दिया कि यह मैला ढोहने वालों का बच्चा है। फिर क्या था, लोग पीछे हट गए। उन्होंने बच्चे को अस्पताल पहुंचाया। महात्मा गांधी से बेहद प्रभावित डॉ. बिंदेश्वर ने छुआछूत और मैला ढोहने की कुप्रथा के खिलाफ कार्य करने की ठानी।
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