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Jawan 2: ‘जवान’ के सीक्वल को लेकर हलचल तेज, जानें शाहरुख-एटली की फिल्म के सेकेंड पार्ट की कहानी
अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे ने अपने करियर की शुरुआत फिल्मों में बाल कलाकार के तौर पर की। फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ में उन पर फिल्माया गीत ‘यशोमती मैया से बोले नंदलाला’ आज भी खूब लोकप्रिय है। लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के संगीत निर्देशन में यह गीत लता मंगेशकर ने मन्ना डे के साथ गाया था। फिल्म ‘प्रेम रोग’ से पहले पद्मिनी कोल्हापुरे और ऋषि कपूर ने ‘जमाने को दिखाना है’ में काम किया था। आर डी बर्मन के संगीत निर्देशन में इस फिल्म के गाने आशा भोसले ने गाए थे।
आशा भोसले कहती हैं, ‘जब पद्मिनी को पता चला कि ‘जमाने को दिखाना है’ का म्यूजिक आर डी बर्मन देने वाले हैं और उसके गीत मैं गाने वाली हूं तो वह मुझसे मिलने आई और बोली कि बुआ, अब मैं जवान हो गई हूं। मेरे लिए आप बच्ची जैसे गाना मत गाना। उसकी यह बात सुनकर खूब जोर से हंसी और बोली कि अभी कहां जवान हुई है, अभी तो तू 17 साल की हुई है। खैर, मैंने जब यह बात बर्मन दा की बताई तो उन्होंने कहा कि कुछ नया करते हैं। और, फिर इस तरह से मैने ‘पूछो ना यार क्या हुआ, दिल का करार क्या हुआ,तुमपे हम मर मिटे हैं अभी से,जाने हमारा आगे क्या होगा’ गाया।’
आशा भोसले अभिनेत्री पद्मिनी कोल्हापुरे की रिश्ते में बुआ लगती हैं। दरअसल, आशा भोसले के पिता दीनानाथ मंगेशकर और पद्मिनी कोल्हापुरे की दादी भाई-बहन थे। ऐसे में पद्मिनी कोल्हापुरे, आशा भोसले और लता मंगेशकर की रिश्ते में भतीजी लगती हैं। आशा भोसले कहती हैं, ‘मैंने अपने 80 साल के गायन करियर में हर तरह के गाने गाए हैं, चाहे दर्द भरे गीत हो, रोमांटिक या फिर नृत्य पर आधरित। जब लोगों से यह कहते सुनती हूं कि दुखी होने पर जब आपके गाने सुनते हैं तो दिल को बहुत सुकून मिलता है। यह सुनकर बहुत खुशी होती है। और, ईश्वर का शुक्रिया अदा करती हूं कि उन्होंने मुझे इस काबिल बनाया।’
आशा भोसले कहती हैं, ‘मैंने 10 साल की उम्र में गाना शुरू किया। जब मुंबई 1945 में आई तभी से गा रही हूं। पुरानी बातें, पुराने लोग, पुराने म्यूजिक डायरेक्टर के बारे में सोचती हूं, तो मुझे लगता है कि मैं कुछ भी नहीं हूं। मैं 90 साल की हो गई हूं ऐसा लोगो को लगता है। लेकिन मुझको लगता ही नहीं कि मैं बड़ी हो गई हूं। मुझे ऐसा भी नहीं लगता कि मैने कुछ अजीब काम किया है। ऊपर वाला बैठा है, वह कराता है और हम करते जाते हैं। नसीब से हम हर चीज करते हैं। मेरा बेटा आनंद मेरी रीढ़ की हड्डी है, उसके सहारे से खड़ी हूं। वह कुछ कहता ही नहीं है, लेकिन मैं उसकी मां हूं बिना उसके कुछ बोले ही समझ जाती हूं कि वह क्या कहना चाहता है।’
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