Home World DNA: आतंकी हमले पर हंसने वाले इजरायली हमले पर चुप! हमास के हमलों की Inside Story जानिए

DNA: आतंकी हमले पर हंसने वाले इजरायली हमले पर चुप! हमास के हमलों की Inside Story जानिए

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DNA: आतंकी हमले पर हंसने वाले इजरायली हमले पर चुप! हमास के हमलों की Inside Story जानिए

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Israel Hamas War DNA Analysis: इज़रायल की लड़ाई फिलिस्तीन के आतंकी संगठन हमास से चल रही है. ये लड़ाई किसी एक खास मुद्दे को लेकर नहीं है. अगर आपको लगता है कि ये युद्ध केवल जमीन पर कब्जे या फिर हक की लड़ाई है, तो आप गलत हैं. दरअसल ये युद्ध, इतिहास के उन पन्नों को दोहराता है, जिसमें एक धर्म, दूसरे धर्म के लोगों को अपने लिए खतरा मानता है. वो उसको और उससे जुड़े लोगों को अपने दुश्मन के तौर पर देखता है. और ये युद्ध सैकड़ों वर्षों से चला आ रहा है.

इस युद्ध का एक अलग पहलू है. हमास के हमले का मकसद केवल इजरायल को चोट पहुंचाना नहीं था, बल्कि वो अपने हमले के जरिए पूरी दुनिया को खास संदेश देना चाहता था. हमास ने केवल हमला नहीं किया, बल्कि उसने मध्यकालीन युग में होने वाली बर्बरता की याद दिला दी. एक ऐसा युद जिसमें युद्ध के नियमों का पालन नहीं किया जाता था. जिसमें सैनिक और आम नागरिकों के बीच कोई फर्क नहीं किया जाता है. बच्चों और बुजुर्गों को भी नहीं छोड़ा जाता. यही नहीं महिलाओं का अपहरण और उनसे ज्यादती करना, युद्ध की रणनीति का हिस्सा माना जाता है. हमास ने अपने हमले से अपना संदेश साफ कह दिया, वो ये कि जब तक हमास की मांगे नहीं मानी जाएंगे, तब तक इजरायल का हर नागरिक, उसके निशाने पर रहेगा, अब चाहे वो बच्चा हो, महिला हो, या बुजुर्ग हों.

एक ऐसी जंग, जिसमें बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओ, सबको मारा गया हो, उसका जश्न मनाना,मानवता पर बदनुमा दाग है. आपके सामने एक और तस्वीर है. ये तस्वीर उन देशों और उन लोगों की है,जो हमास के हमले का और इजरायल के लोगों के मारे जाने का जश्न मना रहे हैं. दुनिया का कोई भी देश, वैसे तो आतंकवादी हमलों को गलत कहता आया है. ये भी कहा जाता रहा है कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता. लेकिन इस्लामिक आतंकी संगठन हमास का हमला, एक यहूदी देश इजरायल पर हुआ था, शायद इसीलिए कई इस्लामिक देश और उनके नागरिकों ने इसका जश्न मनाया. इसमें ईरान, लेबनान का हिजबुल्लाह, अफगानिस्तान का तालिबान, और यही नही, भारत में मौजूद एक विशेष वर्ग भी बहुत खुश है. 

बीते शनिवार को हमास ने एक साथ हजारों रॉकेट, इजरायल पर दागे थे. इजरायल के Defence System IRON DOME की भी एक क्षमता है. इसीलिए इस हमले में इजरायल को काफी नुकसान हुआ. यही नहीं हमास के आतंकियों ने इस बार ज़मीनी हमला भी किया था. उसके आतंकियों ने इजरायल के सैनिकों पर ही नहीं, बल्कि आम लोगों को, अपना बर्बर चेहरा दिखाया. इस हमले में जितने भी लोग मारे गए, उसमें यहूदी, ईसाई और हिंदू धर्म के लोग थे. हम इस युद्ध को धर्म के चश्मे से नहीं देख रहे हैं, बल्कि हम आपको वो बता रहे हैं, जो हुआ है.

हमास के इस हमले में उसने इजरायल के लोगों को ही टारगेट नहीं किया. बल्कि उसने यूके, जर्मनी, नेपाल, अमेरिका और थाईलैंड जैसे देशों के लोगों को भी टारगेट किया. बहुत से लोग ये कह सकते हैं, कि हमास ने इजरायल में मौजूद लोगों को टारगेट किया, इसमें विदेशी भी थे. लेकिन यहां हम आपको बताना चाहते हैं, हमास ने लोगों को केवल मारा नहीं है, बल्कि कई देशों को लोगों का अपहरण भी किया हुआ है. अमेरिका के 4 लोगों को मार दिया गया, यूक्रेन के 2 लोगों को अगवा कर लिया गया, फ्रांस के एक शख्स को अगवा किया गया है, जर्मनी के कई नागरिक अगवा कर लिए गए हैं. नेपाल के 10 नागरिकों को पहले अगवा किया गया, फिर मार दिया गया. क्या हमास को ये नहीं पता चला होगा कि कौन इजरायली है, और कौन विदेशी?

अब हम आपको ये बताते हैं कि हमास ने अचानक से हमला क्यों किया. और हमले के लिए उसने एक विशेष तारीख ही क्यों चुनी. इस्लामिक आतंकी संगठन हमास के बर्बर हमले की 3 मुख्य वजह हैं.

पहला- धार्मिक वजह
दूसरा- रणनीतिक वजह
तीसरा- कूटनीतिक वजह

हमास ने इजरायल पर किए हमले को एक औपचारिक नाम दिया था. इस हमला को नाम दिया गया है- Operation Al-Aqsa Flood. हमास का कहना है कि इजरायल की सेना ने अल अक्सा मस्जिद, जिसे इस्लाम का तीसरा सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण स्थान माना जाता है, उसे अपवित्र कर दिया है. हमास के इस हमले की सबसे महत्वपूर्ण वजह यही बताई गई है. यानी एक तरह से देखा जाए तो ये जंग, हक की लड़ाई से ज्यादा मस्जिद की पवित्रता और अपवित्रता से जुड़ी हुई है. हमास ने ऐसा करके अपने इस बर्बर हमले को धार्मिक लड़ाई का चोला पहना दिया है. ताकि पूरा मुस्लिम जगत, उसके तथाकथित Good Cause का समर्थन करे. 

इसी तरह हमास ने अपने हमले के लिए एक खास दिन चुना था- 7 अक्टूबर. 7 अक्टूबर पूरी दुनिया के यहूदी समुदाय का एक पवित्र धार्मिक त्योहार माना जाता है. इस त्योहार को Simchat Torah कहा जाता है. हमास ने यहूदियों के पवित्र त्योहार, धार्मिक वजहों से चुना था. ताकि ये हमला यहूदी समुदाय को कई वर्षोँ तक याद रहे. इजरायल के राष्ट्रीय त्योहार पर हमला करना, एक रणनीतिक चाल भी थी. दरअसल Simchat Torah(सिमहत तोरा) त्योहार के दिन इजरायल के ज्यादातर सैनिक अपने परिवार के पास होते हैं, छुट्टियां मना रहे होते हैं. इसीलिए हमास ने इस दिन हमला करने की योजना बनाई.

यही नहीं 7 अक्टूबर 2023 वो दिन भी है, जब वर्ष 1973 के युद्ध को 50 साल पूरे हो रहे थे. इस विशेष दिन को चुनकर हमास ने पूरे दुनिया को ये संदेश दिया है, कि वर्ष 1973 का युद्ध जिन वजहों से लड़ा गया था, आज भी वो मुद्दे बने हुए हैं. वर्ष 1973 में यहूदियों के सबसे बड़े त्योहार Yom kippur (यौम किप्पुर) के मौके पर हमला किया गया था. उस दिन मिस्र और सीरिया ने इजरायल पर एक साथ हमला किया था. वर्ष 1973 में किया गया ये हमला, वर्ष उन्नीस सौ सड़सठ में हुए युद्ध के बाद, जमीन के कब्जे की लड़ाई थी. 

वर्ष 1967 में इजरायल ने अरब देशों के समूह को युद्ध में हरा दिया था. उसने मिस्र के शिनाई पेनिन्सुला, सीरिया के गोलान हाइट्स और जॉर्डन द्वारा नियंत्रित वेस्ट बैंक को जीत लिया था. इस जमीन को छुड़वाने के लिए ही, मिस्र और सीरिया ने इजरायल पर हमला किया था. मिस्र और जॉर्डन भी इस्लामिक देश हैं, उन्होंने भी हमले के लिए यहूदी त्योहार को चुना था. हमास इस बात से भी परेशान था, कि पिछले कुछ समय से कई अरब देशों ने इजरायल के साथ ऐतिहासिक समझौते किए हैं. यानी इजरायल के अरब देशों के साथ संबंध, पिछले कुछ समय में मजबूत होते जा रहे थे.

वर्ष 2020 के Abraham Accord  में UAE, Behrin, Morroco और Sudan जैसे मुस्लिम बहुल देशों ने इजरायल को मान्यता दी है. हाल ही में नई दिल्ली में हुई G-20 बैठक के दौरान भारत, यूरोप और मिडिल ईस्ट कॉरिडोर की घोषणा की गई थी. ये कॉरिडोर भारत से चलकर UAE,SAUDI ARAB और JORDON से होते हुए, इजरायल के जरिए यूरोप तक जाना तय हुआ था. यही नहीं बहुत जल्दी Saudi arab और इजरायल के बीच एक औपचारिक समझौता भी होना था, जिसके तहत, Saudi arab भी इजरायल को मान्यता दे देता.

इस हमले के जरिए, हमास ने शांति प्रक्रिया को पीछे धकेल दिया है. हमास ने जिस स्तर पर हमला किया है. और जिस तरह की बर्बरता दिखाई है. उसने पूरी दुनिया को उसकी असलियत दिखा दी है. हमास के हमले के बाद दुनिया वैचारिक रूप से दो हिस्सों में बंटी हुई नजर आ रही है. 

पहला- फिलिस्तीन और आतंकी संगठन हमास के समर्थन में खड़े लोग
दूसरा- इजरायल के समर्थन और आतंकी हमले के विरोध में खड़े लोग

आतंकी हमले में धमाके करना, गोलियां चलाना, अघोषित युद्ध जैसी स्थिति बन जाना, लोगों ने देखा है. हमास ने किसी मध्यकालीन युग के कबीलों की तरह हमला किया था. उन्होंने हर किसी को निशाना बनाया. वो इजरायल के सैनिकों से युद्ध करने नहीं आए थे. वो इजरायल के आम लोगों को मारने आए थे. उन्होंने केवल आदमियों को ही नहीं, बच्चों और महिलाओं को भी नहीं छोड़ा. बर्बरता की जो तस्वीरें आप पिछले दो दिनों से देख रहे हैं, इजरायल के लोगों के प्रति घृणा को दर्शाता है. इन बर्बर तस्वीरों से ये साफ हो रहा था कि हमास के आतंकियों की नज़र में इजरायल में रहने वाले लोग, जिंदा रहने के काबिल नहीं थे. हमास के आतंकियों ने इजरायल के लोगों का अपहरण किया, उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया, फिर उन्हें मार दिया. आपने, हमने औऱ जिसने भी हमास के हमले से जुड़ी तस्वीरें देखीं. वो दहशत से भर गया.

लेकिन इस्लामिक आतंकी संगठन हमास के इस हमले के बाद, कुछ इस्लामिक देशों में जश्न मनाया गया. हालांकि जश्न मनाने वाले केवल इस्लामिक देशों में नहीं थे, बल्कि अमेरिका, यूके, भारत जैसे देशों में रहने वाले विशेष वर्ग के लोग भी इसमें शामिल थे. हम आपको अपनी एक रिपोर्ट दिखाना चाहते हैं. इसमें वो लोग हैं, जो आतंकी संगठन हमास के समर्थन में खड़े होकर नारेबाजी कर रहे हैं.

एक वक्त था कि जब भारत आतंकी हमलों से दहल जाता था. पिछले कुछ वर्षों से देश में शांति है. एक भारतीय होने की वजह से हम आतंकी हमलों का दर्द समझ सकते हैं. हम इजरायल पर हुए हमास के आतंकी हमले का दर्द भी महसूस कर सकते हैं. लेकिन अफसोस, हमारे देश में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो आतंकी संगठन हमास के पक्ष में खड़े हैं.

आतंकी संगठन हमास के समर्थन को न्यायसंगत ठहराने की कोशिश कर रहे हैं. इन लोगों का कहना है कि हमास ने जो किया वो इसलिए सही है, क्योंकि इजरायल, फिलिस्तीनियों पर जुल्म करता है. वो 70 सालों के इतिहास का हवाला भी देते हैं. ये वही लोग हैं जो हमास के आतंकियों की हिंसा का भी समर्थन कर रहे हैं. ये लोग आतंकी हमले में मरने वाले लोगों की गिनती का तुलनात्मक अध्ययन कर रहे हैं. वो फिलिस्तीन और इजरायल में कितने लोग मारे गए,इसकी गिनती करके फिलिस्तीन की पक्ष में खड़े हैं.

देखा जाए तो किसी भी रूप में किसी आंतकी हमले का समर्थन नहीं होना चाहिए. लेकिन हमारे देश के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय के छात्रों ने फिलिस्तीन के समर्थन में एक रैली निकाली. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के करीब 400 छात्रों ने हाथों में Pla Card लेकर फिलिस्तीन के समर्थन में नारेबाजी की. उन्होंने इसके लिए इस्लामिक नारे भी लगाए. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इन छात्रों ने जो इस्लामिक नारे लगाए, ठीक वैसे ही नारे हमास के आतंकियों ने बर्बरता के दौरान लगाए थे. 

ये समझना जरूरी है कि फिलहाल फिलिस्तीन का समर्थन करने का मतलब, हमास के हमले का समर्थन करना है. हालांकि इस मामले में पुलिस ने 4 छात्रों पर FIR दर्ज कर ली है. केवल यही नहीं, हमारे देश के नेता भी, हमास के समर्थन के लिए फिलिस्तीन के समर्थन वाला Route अपना रहे हैं. किसी ने भी इस्लामिक आतंकी संगठन हमास, के बर्बर हमले का विरोध नहीं किया. किसी ने भी महिलाओं पर हुए जुल्म की जिक्र नहीं किया. हालांकि वो जानते हैं कि इस जुल्म के पीछे आतंकी संगठन हमास ही था.

हमास के आतंकी हमले को न्यायसंगत बताने के लिए, इजरायल और फिलिस्तीन के इतिहास का जिक्र किया जा रहा है. जो लोग भारत के ऐतिहासिक तथ्यों को नकारते हुए, मुगल काल में मंदिरों को ध्वस्त किए जाने की घटनाएं नकारते हैं, वही लोग आज फिलिस्तीन-इजरायल के मामले में 70 साल के इतिहास की बात करते हैं. ऐसे लोगों को हम इजरायल और यहूदियों से जुड़ा असली इतिहास बताना चाहते हैं.

इस्लाम, ईसाई और यहूदी इन तीनों ही धर्मों के लिए यरुशलम एक पवित्र शहर है. जिस जमीन को अरब देश फिलिस्तीन कहते हैं, उसे ही यहूदी समुदाय इजरायल कहता है. हालांकि सबसे पहले इस ज़मीन पर यहूदी समुदाय रहता था. यहूदी मान्यता के अनुसार आज से 3 हजार वर्ष पहले यहूदियों ने Jerusalem में अपना पहला मंदिर SOLOMAN TEMPLE बनाया था. ये वही जगह जहां आज के वक्त में ‘अल-अक्सा मस्जिद’ मौजूद है. लगभग 2 हजार वर्ष पहले ईसाई धर्म अस्तित्व में आया, धीरे-धीरे पूरा इजरायल रोमन साम्राज्य के अधीन हो गया.

वर्ष 135 में रोमन शासक Hadrian ने इजरायल पर हमला किया, उसने यहूदियों को वहां से निकाल दिया. इसके लगभग 500 वर्ष बाद अरब में इस्लाम अस्तित्व में आ गया था. इसके अगले 50 वर्षों के अंदर पूरे इजरायल पर ‘उमय्यद ख़िलाफ़त’ का शासन आ गया. फिर 16वीं से 20वीं शताब्दी तक ये क्षेत्र ओस्मानिया सल्तनत के अधीन रहा. वर्ष 1914 में पहले विश्वयुद्ध में Turkey हार गया था, जिसके बाद ये पूरा इलाका, ब्रिटेन के प्रभाव में आ गया था.

वर्ष 1930 के दशक में जब जर्मनी में हिटलर और नाजी पार्टी सत्ता में आई, तो जर्मनी और यूरोप के दूसरे देशों में यहूदियों का दमन चरम पर पहुंच गया था. इस दमन से बचने के लिए यूरोप के हजारों यहूदियों ने वापस इजरायल का रुख किया. यहूदियों को लगा कि जब तक उनका खुद का देश नहीं होगा, तब तक उनका दमन चलता रहेगा. इसीलिए उन्होंने अपनी ऐतिहासिक धरती इजरायल आ गए. यहूदियों की इस वापसी को Zionist (ज़ायनिस्ट) Movement कहा जाता है.

दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान नाजियों ने यूरोप में 6 लाख यहूदियों का कल्तेआम किया. जिससे पूरी दुनिया में यहूदियों के लिए सहानुभूति पैदा हुई. दुनिया के कई देश यहूदियों को अलग देश का समर्थन करने लगे. दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी की हार के बाद ब्रिटेन और फ्रांस ने संयुक्त राष्ट्र में एक नया प्रस्ताव रखा, जिसके तहत, मिडिल ईस्ट की इस धरती को दो अलग देशों में बांटने की बात कही. इसमें मुस्लिमों के लिए फिलिस्तीन और यहूदियों के लिए इजरायल बनाए जाने का प्रस्ताव रखा गया. ये प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र में पारित भी हो गया, जिसके साथ ही वर्ष 1947 में इजरायल अस्तित्व में आ गया. 

यहूदियों ने ये प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, लेकिन अरब देशों ने इसे मानने से इनकार कर दिया. उन्होंने इजरायल के बनने के कुछ महीने बाद ही उस पर हमला कर दिया था. वर्ष 1948 से 1949 तक चले इस युद्ध में इजरायल ने सभी अरब देशों को हरा दिया, इसके बाद इजरायल ने कुछ और जमीन पर कब्जा कर लिया. इसके बाद 1967 और 1973 में अरब देशों ने दो हमले और किए थे. लेकिन इन युद्धों में भी जीत इजरायल की ही हुई.

इससे ये भी पता चलता है कि इजरायल ने कभी किसी अरब देश पर हमला नहीं किया, बल्कि इन देशों ने ही उस पर पहला हमला किया, जिस पर जवाबी कार्रवाई करते हुए, इजरायल ने बड़े हमले किए. फिलिस्तीन के आतंकी संगठन हमास ने भी इजरायल पर पहले हमला किया है, अब इजरायल इस हमले का घातक जवाब दे रहा है.

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