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पूर्व सीएम कमलनाथ और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान
– फोटो : Social Media
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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भाजपा का मजबूत गढ़ माने जाने वाले मध्यप्रदेश में इस बार सियासी समीकरण बदले-बदले नजर आ रहे हैं। खासतौर से भाजपा के सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ने के फैसले से राज्य के सियासत की तस्वीर दिलचस्प हो गई है। सत्ता बचाने के लिए पार्टी ने इस बार राज्य के अलग-अलग क्षत्रपों को अपना अपना क्षेत्र बचाने की जिम्मेदारी दी है। दूसरी ओर, कांग्रेस की कोशिश ऑपरेशन लोटस के जरिये गंवाई सत्ता को फिर से हासिल करने की है।
दिलचस्प यह है कि इस बार चुनावी जंग में भाजपा व कांग्रेस ने चेहरे के सवाल पर चुप्पी साध ली है। भाजपा ने सामूहिक नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा कर सीएम शिवराज सिंह चौहान के भविष्य पर असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। दूसरी ओर, कांग्रेस ने भी बीते चुनाव के बाद मुख्यमंत्री बनाए गए कमलनाथ को चेहरा बनाने की घोषणा नहीं की है।
भाजपा ने अपने सबसे बड़े ब्रांड पीएम मोदी को आगे किया है, वहीं कांग्रेस ने राहुल गांधी, प्रियंका गांधी समेत दूसरे नेताओं की अलग-अलग भूमिका तय की है। खोई सत्ता हासिल करने के लिए कांग्रेस राज्य सरकार के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाने में जुटी है। पार्टी ओबीसी से जुड़े सवालों को केंद्र में लाने के साथ दलित-आदिवासियों में पैठ बनाने की कोशिश में है। शहरी वोट को साधने के लिए प्रियंका को तो आदिवासी-दलितों के बीच राहुल को भेजने का फैसला किया है।
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