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Tsar Bomba: आसमान में आग का गुबार, चारों तरफ धुआं…जब दुनिया ने देखा बमों का किंग

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Tsar Bomba: आसमान में आग का गुबार, चारों तरफ धुआं…जब दुनिया ने देखा बमों का किंग

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Soviet Union Weapons: दुनिया को विश्व युद्ध के दौर से बाहर आए हुए 16 साल बीत चुके थे. लेकिन अमेरिका और सोवियत संघ के बीच कोल्ड वॉर की खाई और गहरी हो गई थी. हथियारों की रेस दुनिया की इन दो महाशक्तियों के बीच बदस्तूर जारी थी. झुकने का सवाल तो दोनों के सामने था ही नहीं. फिर आया तारीख 30 अक्टूबर 1961 का दिन. सोवियत संघ में अंदरखाने हलचल चल रही थी. कुछ ही लोगों को मालूम था कि क्या होने वाला है. 

सोवियत संघ ने आज के दिन यानी 60 बरस पहले दुनिया का सबसे ताकतवर एटम बम का परीक्षण कर सबको हिलाकर रख दिया. यह अकेला बम इतना ताकतवर था कि पूरे शहर को मलबे में तब्दील कर सकता है. यह कितना खतरनाक है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हिरोशिमा पर जो बम गिराया गया था, उसकी तुलना में इससे 3300 गुना ज्यादा ऊर्जा पैदा हुई थी. इस बम का नाम था जाप बॉम्बा (Tsar Bomba). इसका कोड नेम इवान है और आधिकारिक तौर पर इसको प्रोडक्ट 602 कहा जाता है. 

…तो खत्म हो जाता यूक्रेन

आर्कटिक क्षेत्र के एक दूरस्थ द्वीप पर सोवियत संघ के वैज्ञानिकों ने जब इस बम का परीक्षण किया तो टेस्टिंग में पूरा द्वीप ही तबाह हो गया.  यूक्रेन और रूस की जंग के दौरान कई बार इस सबसे शक्तिशाली बम का जिक्र आया है. अगर पुतिन इसको यूक्रेन के खिलाफ इस्तेमाल करते तो पूरा देश चुटकियों में मौत के आगोश में सो जाता. 

इससे खतरनाक बम कोई नहीं

60 के दशक में सोवियत संघ के एटमी वैज्ञानिक आंद्रेई सखारेव ने इसको तैयार किया था. दरअसल अमेरिका को जवाब देने के लिए इसे बनाया गया था. इसको रूस के बमों का किंग कहा जाता है. 27 टन वजनी, 8 मीटर लंबा और 2.6 मीटर चौड़े इस हायड्रोजन बम (थर्मोन्यूक्लियर हथियार) की टेस्टिंग के बाद 5 मील चौड़ा आग का गोला उठा था. इसके गोले इतने भयानक थे, जो 1000 किमी दूर से भी देखे जा सकते थे. जबकि धुएं का गुबार 40 मीटर की ऊंचाई तक उठा था. 

इसका प्रभाव 100 किलोमीटर के इलाके पर हुआ था. इस बम की टेस्टिंग से नोवाया जेमलिया आइलैंड तबाह हो गया. हायड्रोजन बम एटम बम की तुलना में ज्यादा एडवांस और पावरफुल होते हैं. एटम बम में या तो यूरेनियम का इस्तेमाल होता है या फिर प्लूटोनियम का . जबकि हायड्रोजन बमों में हायड्रोजन के कुछ अतिरिक्त आइसोटोप की जरूरत पड़ती है, जिनको ड्यूटेरियम और ट्रिटियम कहा जाता है. 

ऐसे गिराया गया था बम
 
यह बम इतना बड़ा था कि रूस के किसी भी बमवर्षक विमान में फिट नहीं हो पाया था. इसके लिए टीयू-95 बमवर्षक में खास बदलाव किए गए थे. चालकों का जो दल इसको गिराने वाला था, उसे बता दिया गया था कि उनकी जान भी जा सकती है. उनके बचने की संभावना भी 50 परसेंट ही आंकी गई थी.  

30 अक्टूबर 1961 को टीयू-95 के क्रू ने जार बॉम्बा को आइलैंड पर काफी ऊंचाई से छोड़ा. एक पैराशूट के जरिए जमीन से करीब 2.4 मील ऊपर फटने से पहले इसकी रफ्तार धीमी कर दी गई. जब यह फटा तो 1000 मील से ज्यादा दूर फिनलैंड और नॉर्वे में कई मकानों की खिड़कियों के कांच टूट गए थे. जब यह बम फटा तो विमान करीब 24 मील दूर चला गया था. लेकिन बम इतनी जोर से फटा कि विमान आधा मील नीचे चला गया था. लेकिन फिर भी जमीन पर सुरक्षित लैंड कर गया था. 

 

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