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अगर आप बीते तीन साल से लगातार सफर में यात्रियों के मोबाइल पर नजर रखे हुए हैं, तो एक दिलचस्प तथ्य आपने ये देखा होगा कि अब लोग मोबाइल पर फिल्में और वेब सीरीज डाउनलोड करके देखना कम कर चुके हैं। लोग अब सफर में अपना समय अपनी नींद पूरी करके बिता रहे हैं और साथ ही ओटीटी पर फिल्में देखने की बजाय सिनेमाघरों का रुख कर रहे हैं। कारोबारी भाषा में इसे डिजिटल फैटीग यानी डिजिटल थकान का नाम मिला है। और, इसी के चलते न सिर्फ भारत में ओटीटी की बढ़ोत्तरी इस साल काफी घटने की आशंका जताई जा रही है बल्कि इसका असर ओटीटी पर प्रसारित होने वाली सामग्री पर भी दिखने लगा है।
मुंबई स्थित एक मीडिया रिसर्च एजेंसी ने सोमवार को जो आंकड़े जारी किए हैं, उनके मुताबिक देश में ओटीटी के दर्शकों की दुनिया करीब 48.11 करोड़ की है। ये देश में मौजूद इंटरनेट ग्राहकों की करीब 34 फीसदी है। इसमें पैसे देकर ओटीटी देखने वालों की संख्या सिर्फ 10 करोड़ के करीब ही है। इस साल ओटीटी ग्राहकों की संख्या में बढ़ोत्तरी भी काफी कम रहने वाली है। रिपोर्ट के अनुसार साल 2021 और 2022 में देश में ओटीटी दर्शकों की संख्या करीब 20 फीसदी की दर से बढ़ती रही है। लेकिन डिजिटल फैटीग के चलते अब लोगों का मोह ओटीटी से भंग रहा है। इस साल सितंबर माह तक के अनुमानों के मुताबिक ये तरक्की इस साल 13.50 तक गिर सकती है।
देश में पैसे देकर सबसे ज्यादा ओटीटी देखने वालों की संख्या मुंबई, दिल्ली और बेंगलुरु जैसे मेट्रो शहरों में हैं। इन तीन शहरों में करीब 60 लाख लोग ओटीटी के नियमित भुगतान करने वाले ग्राहक हैं। ओटीटी ग्राहकों की संख्या में ताबड़तोड़ होती रही बढ़ोत्तरी पर इस साल लगाम लगने की आशंका साल के शुरू से ही जताई जा रही थी। इसका पहला संकेत उन पुस्तक मेलों से मिलना शुरू हुआ जिनमें पाठकों की संख्या इस साल नए रिकॉर्ड बनाती रही है। इस साल पुस्तकों और अखबारों की बिक्री में हुआ इजाफा भी डिजिटल मनोरंजन में दर्शकों की होती रुचि को दर्शाता है।
सोमवार को जारी रिपोर्ट जिस एजेंसी ऑरमैक्स ने देश के करीब 12 हजार लोगों से बातचीत करके जुलाई और सितंबर के बीच किए गए अपने सर्वे के बूते जारी की है, लेकिन ओटीटी संचालन पर करीब से नजर रखने वाले शुरू से बताते रहे हैं कि ओटीटी फिलहाल भारत में मुनाफे का सौदा कम ही हो पा रहा है। इसी के चलते इस साल सारे ओटीटी ने पहले से बनी फिल्मों को खरीदने पर तब तक रोक लगा रखी है जब तक कि ये फिल्में सिनेमाघरों में रिलीज नहीं हो जातीं। यही वजह रही कि बीते शुक्रवार को एक साथ आधा दर्जन के करीब हिंदी फिल्में सिनेमाघरों में पहुंच गईं। इनमें से तमाम फिल्मों का तो सिनेमाघरों में प्रदर्शन पर लगा खर्च भी नहीं निकल सका है।
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