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Maldives: जानें पराए मुल्क में क्यों हीरो बने देश के ये 77 जवान, लोगों के साथ पूर्व राष्ट्रपति भी कर रहे तारीफ

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Maldives: जानें पराए मुल्क में क्यों हीरो बने देश के ये 77 जवान, लोगों के साथ पूर्व राष्ट्रपति भी कर रहे तारीफ

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Maldives: President Mohamed Muizzu again appealed to India to let the Indian soldiers go back to their country

Maldives
– फोटो : Amar Ujala/Sonu Kumar

विस्तार


भारत की सीमा से हजारों मील दूर पूरब के एक पराए मुल्क में भारतीय सेना के 77 जवानों को हीरो के तौर पर पेश किया जा रहा है। उस देश के आम लोग ही नहीं बल्कि पूर्व राष्ट्रपति तक इन सेना के जवानों की तारीफों में कसीदे पढ़ रहे हैं। दरअसल यह स्थितियां तब बनीं, जब इस पराए मुल्क में सत्ता परिवर्तन हुआ और चीन तथा पाकिस्तान से प्रभावित नए राष्ट्रपति के पदभार ग्रहण करने के साथ भारत के 77 जवानों को देश से वापिस बुलाने की सरकार से गुजारिश की गई। दरअसल भारतीय सेना के 77 जवान बीते कई सालों से हिंद महासागर के महत्वपूर्ण देश मालदीव में दोनों देशों की आपसी मदद और करार के चलते वहां पर तैनात हैं। विदेशी मामलों के जानकारों का कहना है कि भारत कई सालों से मालदीव में आपसी करार के चलते बड़े स्तर की मदद उपलब्ध करा रहा है। लेकिन अब इस पूरे मामले में चीन और पाकिस्तान में दखल देकर मालदीव को अस्थिर करने की साजिश रचनी शुरू कर दी है।

मालदीव में हुए राष्ट्रपति के चुनाव के बाद बदली सत्ता के चलते चीन और पाकिस्तान अब इस देश में अपना दखल देने लगे हैं। इसी दखल के चलते नए राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जु ने एक बार फिर भारत के सैनिकों को अब वापस अपने देश जाने की केंद्र सरकार से अपील की है। रक्षा मामलों के जानकारों का मानना है कि जिस तरीके से मालदीव लगातार चीन और पाकिस्तान के दबाव में आकर भारतीय सेना को हटाने की बात कर रहा है, दरअसल उससे एक गलत संदेश जा रहा है। जो कि मालदीव की जनता में बड़े स्तर पर रिएक्ट करने लगा है। उनका कहना है कि नए राष्ट्रपति ने अपना चुनाव भारतीय सेना के जवानों की मालदीव में उपस्थिति को बड़ा मुद्दा बना कर लड़ा था। भारतीय सेना की मौजूदगी के जिक्र के साथ ऐसा लगता था कि वहां पर कई बड़ी टुकड़ियां मालदीव में मौजूद है। जब हकीकत में ऐसा बिल्कुल नहीं है। जानकारी के मुताबिक भारत के महज 77 सैनिक मालदीव में मौजूद हैं। वह भी बगैर किसी हथियार के वहां पर मालदीव के लोगों की मदद कर रहे हैं।

मालदीव में यह भारतीय सैनिक न सिर्फ वहां के अस्पतालों में मरीजों की मदद के लिए हर वक्त मौजूद रहते हैं, बल्कि उन्हें अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ-साथ नई जिंदगियां भी दे रहे हैं। जानकारी के मुताबिक मालदीव के मिलिट्री बेस हॉस्पिटल में भारत के 6 चिकित्सा सेवा के जवान हर वक्त मौजूद रहते हैं। इसके अलावा पूर्ववर्ती सरकारों के साथ हुए करार के माध्यम से भारतीय सेना लगातार वहां के प्रशासनिक भवन, आवास और प्रशिक्षण संवेदन सुविधाओं में मदद करती आई है। मालदीव के समुद्री तट पर भारत के 10 तटीय निगरानी रडारों के माध्यम से संबंध बेहद मजबूत भी हुए हैं और समुद्री आवागमन के साथ-साथ व्यापारिक नजरिए से भी इसे मजबूती मिली है। इन सबके साथ-साथ भारत में मालदीव के कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर सेटअप खासतौर से रक्षा मंत्रालय के भवन के निर्माण में न सिर्फ महत्वपूर्ण भागीदारी निभाई है, बल्कि मालदीव की पूर्ववर्ती सरकारों के साथ मिलकर वहां के लोगों के जीवन यापन को बेहतर करने के लिए हर वक्त मदद को आगे रहे हैं।

रक्षा मामलों के जानकार रिटायर्ड कैप्टन अर्जुन भदौरिया कहते हैं कि भारत की ओर से मालदीव में की जाने वाली लगातार मदद का ही नतीजा है कि नए राष्ट्रपति के भारत विरोधी अभियान का अब बड़ा रिएक्शन होने लगा है। वह कहते हैं कि बीते कुछ दिनों में मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नसीद के समर्थन में देश की जनता भी सामने आने लगी है। दरअसल मोहम्मद नशीद ने आरोप लगाते हुए कहा था कि वर्तमान नए राष्ट्रपति चीन और पाकिस्तान के दबाव में आकर भारत की ओर से हुए करार को न सिर्फ खत्म करने की साजिश रच रहे हैं, बल्कि वर्षों से मिल रही एक महत्वपूर्ण मदद को भी नए राष्ट्रपति खत्म करना चाहते हैं। पूर्व राष्ट्रपति ने कहा कि मालदीव का भारत के साथ बेहतर और सकारात्मक रिश्ता रखना देश के लिए बेहद जरूरी भी है। देश के पूर्व राष्ट्रपति और स्थानीय जनता लगातार भारत के उन 77 सैनिकों के देश से न जाने के लिए अपनी बात भी रख रही है। पूर्व राष्ट्रपति ने यह तक कहा कि भारत के सभी जवान यहां पर सरकार की ओर से उपलब्ध करवाई गई सेवाओं में मजबूती के साथ हमारे देश की मदद में लगे रहते हैं। इसलिए इन सैनिकों को यहां से भेजा जाना मालदीव के लिए बड़ा नुकसानदेह साबित हो सकता है।

विदेशी मामलों के जानकार और इंडो एशियन पैसिफिक सेंटर एंड स्ट्रेटजी फॉर फॉरेन अफेयर्स के निदेशक कृष्णकांत तुली कहते हैं कि भारत ने मालदीव को न सिर्फ स्थिर करने में मदद की, बल्कि उसके देश के विकास के लिए भी बड़े महत्वपूर्ण साझेदार के तौर पर भूमिका अदा की है। वह कहते हैं कि दोनों देशों के बीच में हुए करार के चलते भारत ने मालदीव के समुद्री तटों समेत सेना को मजबूत और बेहतर करने के लिए कई बड़े स्तर पर मदद की है। वह कहते हैं कि 1992 में भारत ने चार बख्तरबंद लड़ाकू विमान मालदीव को दिए। उसके बाद 2010 और 2013 में एक-एक ध्रुव हेलीकॉप्टर मालदीव को दिया गया। इसके अलावा 2019 में इंटरसेप्टर नाव भी मालदीव को दी गई। इसी साल डोनियर विमान भी यहां दिया गया। जबकि इसी साल जून में एक महत्वपूर्ण समुद्री एंबुलेंस भी स्थानीय लोगों और मछुआरों समेत यहां के जरूरतमंदों की मदद के लिए दी गई। इस मदद के अलावा स्पीड बोट और लैंडिंग क्राफ्टशिप भी दी गई।

कृष्णकांत तुली कहते हैं कि अब नए राष्ट्रपति चीन और पाकिस्तान के दबाव में ज्यादा हैं। खासतौर से वह चीन के न सिर्फ प्रभाव में है बल्कि दबाव में भी लगातार बने हुए हैं। यही वजह है कि उन्होंने चीन के दबाव में आकर मालदीव के इंफ्रास्ट्रक्चर समेत विकास में योगदान देने वाली भारतीय सेना के उन जवानों को हटाने के लिए कहा है, जिसका अब वहां विरोध शुरू हो गया है। विदेशी मामलों के जानकार और हिंद महासागर क्षेत्र के देशों पर पैनी नजर रखने वाले रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल विजय दहिया कहते हैं कि चीन से प्रभावित होकर नए राष्ट्रपति अब अपने देश की रणनीतियां बना रहे हैं। उनका मानना है कि चीन ने बहुत ही शातिर तरीके से मालदीव के नए राष्ट्रपति और इस देश में अपने मजबूत कदम को रखने की बड़ी तैयारी कर ली है।

वह बताते हैं कि चीन ने मालदीव में 2013 से लेकर 2018 की सरकार के दौरान जिस तरीके से अरबों डॉलर का कर्जा देकर निवेश किया, उससे पूरा मालदीव पाकिस्तान बनने की राह पर आगे बढ़ गया है। जानकारों का कहना है कि इस दौरान तत्कालीन राष्ट्रपति रहे अब्दुल्ला यामीन ने चीन के प्रभुत्व को न सिर्फ वहां पर बढ़ने दिया, बल्कि कई ऐसे समझौते भी किए, जिसकी वहां के संसद तक को जानकारी नहीं हुई। इसमें सबसे प्रमुख मामला मछली उद्योग को बढ़ावा देने के लिए चीन की ओर से पाकिस्तान की तर्ज पर किए गए व्यापार समझौते का लागू होना था। इस दौरान चीन ने मालदीव पर अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए 95 फ़ीसदी से अधिक वस्तुओं पर टैरिफ शून्य कर दिया था।

रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल विजय दहिया कहते हैं कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 2014 में जब मालदीव में दौरा किया, उसके बाद से मालदीव की पूरी अर्थव्यवस्था एक तरह से चीन के कब्जे में आ गई। वह बताते हैं कि चीन ने इस दौरान मालदीव के भीतर जिस तरह से अपना नेटवर्क फैलाने की कोशिश की, वह 2018 तक आते-आते तकरीबन दो बिलियन डॉलर के कर्ज के रूप में मालदीव पर थोपी जा चुकी थी। मालदीव के वित्त मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि इस देश पर जितना कर्ज समूची दुनिया का है, उसमें से अकेले 78 फ़ीसदी का कर्जदार तो मालदीव चीन का है। विदेशी मामलों के जानकारो का मानना है कि मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने चीन की ओर से दिए गए 78 फ़ीसदी के कर्ज के हिस्सेदारी पर जब हंगामा करना शुरू किया, तो तत्कालीन सरकार ने न सिर्फ उनकी आवाज को दबाया, बल्कि कई अन्य मामलों में दी जाने वाली जानकारियां भी साझा नहीं कीं। जानकारी के मुताबिक 2014 में चीन के राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान चीन मालदीव का एक मैत्री पुल बनना शुरू हुआ। जबकि यहीं के तकरीबन 17 आईलैंड को पर्यटन के तौर पर विकसित करने के लिए करीब करीब 400 अरब डॉलर का कर्ज भी चीन ने मालदीव को दिया और इन द्वीपों का अगले 50 साल के लिए पट्टा करवा लिया।

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