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कैप्टन शुभम गुप्ता की मां
– फोटो : अमर उजाला
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जो शुभम बचपन में पर्दे की आड़ लेकर छिप जाता था, मां उसे इधर-उधर ढूंढते फिरती और फिर दिखावटी गुस्सा कर कहती चल अब बाहर आ ही जा। बहुत हो गई लुकाछिपी। वह शुभम आज चिरनिद्रा में है। पर, मां पुष्पा का दिल अब भी मान नहीं पा रहा कि बेटा इस दुनिया में नहीं रहा।
यही वजह है कि शनिवार को कई बार वह अपने लाल की वर्दी, कपड़े, तितर-बितर पड़े सामान को अचानक सहेजने लग रही थीं। बीच-बीच में जोर से चीख उठ रही थीं, बोलने लगती थीं, शुभम अब आ भी जा…दिल बैठा जा रहा है। परिजन और पड़ोस की महिलाएं बड़ी मुश्किल से उन्हें संभाल पाईं।
शुक्रवार की देर रात कैप्टन शुभम की पैतृक गांव कुआंखेड़ा में अंत्येष्टि हुई। वो कभी न जागने वाली नींद में सो गए। शहीद कैप्टन के घर प्रतीक एंक्लेव में शनिवार को भी गमगीन माहौल रहा। पूरे दिन सांत्वना देने वालों का तांता लगा रहा। सभी अपने-अपने तरीके से कैप्टन शुभम के बचपन से अब तक की यादों को साझा कर रहे थे।
परिजन ने बताया कि शुभम की मां पुष्पा देवी पूरी रात नहीं सोईं। बेटे की तस्वीर को सीने से लगाए रखा। वर्दी को भी निहारती रहीं। बार-बार इधर-उधर झांककर आवाज लगाने लगती हैं। मन नहीं मानता तो पहली मंजिल पर बने शुभम के कमरे में जा पहुंचतीं। उनकी वर्दी को संवारते हुए हैंगर पर टांगती। पियानो, हारमोनियम को स्पर्श कर शुभम को महसूस करतीं हैं। शुभम…शुभम की आवाज लगाकर फफकने लगती हैं।
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